History of India
Asked 3 hours ago · Viewed 0 times
वर्ष 1857 के महान विद्रोह की प्रकृति और उसके स्वरूप को लेकर विभिन्न इतिहासकारों एवं विचारकों ने अपने भिन्न-भिन्न मत प्रस्तुत किए हैं। इस संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. आर.सी. मजुमदार (R.C. Majumdar) का यह सुविख्यात मत था कि 'तथाकथित प्रथम राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम न तो पहला, न ही राष्ट्रीय और न ही स्वतंत्रता संग्राम था।'
- 2. ब्रिटिश अधिकारी टी.आर. होम्स (T.R. Holmes) के अनुसार 1857 का यह विद्रोह 'सभ्यता और बर्बरता के बीच का संघर्ष' (Conflict between Civilization and Barbarism) था।
- 3. विनायक दामोदर सावरकर (V.D. Savarkar) ने अपनी पुस्तक 'द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस - 1857' में इस घटना को सुनियोजित रूप से भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम बताया था।
- 4. कार्ल मार्क्स (Karl Marx) ने इस विद्रोह को केवल एक 'सिपाही विद्रोह' (Sepoy Mutiny) माना था और कहा था कि यह सामंती ताकतों की प्रतिक्रिया मात्र था, जिसका आधुनिक राष्ट्रवाद से कोई संबंध नहीं था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
वर्ष 1857 के विद्रोह के स्वरूप और उसकी प्रकृति को लेकर इतिहासकार बंटे हुए हैं। जहाँ एक ओर वी.डी. सावरकर ने इसे सुनियोजित 'प्रथम स्वतंत्रता संग्राम' कहा, वहीं डॉ. आर.सी. मजुमदार ने इसके राष्ट्रीय स्वरूप और प्रथम होने पर आपत्ति जताई थी। ब्रिटिश इतिहासकारों जैसे टी.आर. होम्स ने इसे 'सभ्यता और बर्बरता का संघर्ष' करार दिया था। इसके विपरीत, कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंजेल ने इसे केवल सिपाही विद्रोह न मानकर इसे जनता की व्यापक प्रतिक्रिया और सामंती-जनसाधारण का मिला-जुला संघर्ष बताया था, जबकि कथन 4 में मार्क्स द्वारा इसे केवल सिपाही विद्रोह बताए जाने का दावा गलत है (कार्ल मार्क्स ने इसे राष्ट्रीय विद्रोह के रूप में रेखांकित किया था)। इस ऐतिहासिक घटना के बारे में अधिक जानने के लिए आप विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
अगला प्रश्न →
वर्ष 1857 के महान विद्रोह की असफलता के पीछे कई आंतरिक कमजोरियां और नेतृत्व से…
← पिछला प्रश्न
वर्ष 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन और नेताजी सुभाष चंद्र बोस…
Related Questions
→
गुप्त साम्राज्य और मौर्योत्तर काल के दौरान प्रशासनिक संरचना, आर्थिक प्रवृत्तियों तथा भूमि अनुदान व्यवस्था के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मौर्योत्तर काल में सातवाहन शासकों द्वारा ब्राह्मणों और बौद्ध भिक्षुओं को कर-मुक्त भूमि (अग्रहार) देने की प्रथा का जो व्यापक प्रसार हुआ, उससे गुप्त काल में सामंती व्यवस्था (Feudalism) की जड़े और अधिक मजबूत हुईं।
2. गुप्त सम्राटों के काल में सोने के सिक्कों (दिनार) की प्रचुरता यह दर्शाती है कि इस काल की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार लंबी दूरी का विदेशी व्यापार था, और गुप्त शासकों ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार से ही सर्वाधिक राजस्व प्राप्त किया था।
3. गुप्त प्रशासनिक व्यवस्था में प्रादेशिक इकाइयों को 'देश', 'भुक्ति' और 'विषय' कहा जाता था, जिनके प्रशासनिक प्रमुखों को क्रमशः 'गोप्ता', 'उपराज्क' या 'उपरिक' और 'विषयपति' के रूप में नियुक्त किया जाता था।
4. गुप्त काल में भूमि के क्रय-विक्रय के पंजीकरण और प्रशासनिक दस्तावेजों के रखरखाव का कार्य 'पुस्तपाल' नामक अधिकारी के अधीन होता था, जिसका उल्लेख बंगाल से प्राप्त दामोदरपुर ताम्रपत्र अभिलेखों में मिलता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
→
बौद्ध धर्म और जैन धर्म के संप्रदायों, दार्शनिक मान्यताओं तथा उनके ऐतिहासिक विकास के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. बौद्ध धर्म के भीतर हीनयान और महायान के विभाजन के अतिरिक्त, महायान परंपरा के भीतर शून्यवाद (माध्यमिक) के संस्थापक नागार्जुन थे, जबकि विज्ञानवाद (योगचार) के प्रवर्तक असंग और उनके भाई वासुबंधु थे।
2. जैन धर्म के श्वेतांबर और दिगंबर संप्रदायों के विभाजन के बाद, श्वेतांबर संप्रदाय के अंतर्गत मखलि गोशाल द्वारा 'आजीविका' संप्रदाय की स्थापना की गई, जो जैन दर्शन से पूर्णतः भिन्न नियतिवादी विचारधारा थी।
3. जैन दर्शन में कर्म के बंधन से मुक्ति और जीव की शुद्धि के लिए 'निर्जरा' (संचित कर्मों का क्षय करना) और 'संवर' (नए कर्मों के प्रवाह को रोकना) को अत्यंत महत्वपूर्ण प्रक्रिया माना गया है।
4. महात्मा बुद्ध ने अपने संघ में महिलाओं के प्रवेश को प्रारंभ से ही पूर्ण स्वीकृति दे दी थी, और उनके आग्रह पर ही उनकी माता महाप्रजापति गौतमी संघ में प्रवेश पाने वाली प्रथम भिक्षुणी बनी थीं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
→
ब्रिटिश भारत में लागू की गई विभिन्न भू-राजस्व प्रणालियों — स्थाई बंदोबस्त, रयतवारी और महालवारी — के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. बंगाल, बिहार और उड़ीसा में लॉर्ड कॉर्नवालिस द्वारा 1793 में लागू 'स्थाई बंदोबस्त' के तहत जमींदारों को भूमि का स्थायी स्वामी मान लिया गया, किंतु राजस्व की मांग इतनी कठोर थी कि यदि निर्धारित सूर्यास्त तक भू-राजस्व जमा नहीं किया जाता था, तो जमींदारी का एक हिस्सा नीलाम कर दिया जाता था, जिसे 'सूर्यास्त कानून' (Sunset Law) कहा जाता था।
2. थॉमस मुनरो और कैप्टन रीड द्वारा मद्रास और बंबई प्रेसीडेंसी के कुछ हिस्सों में विकसित 'रयतवारी व्यवस्था' में सरकार और किसान (रयत) के बीच सीधा समझौता होता था, जिसमें राजस्व निर्धारण भूमि की उर्वरता के आधार पर निश्चित किया जाता था, किंतु किसानों को भूमि के पूर्ण मालिकाना हक मिलने के बावजूद उन्हें कभी भी अपनी भूमि से बेदखल नहीं किया जा सकता था।
3. हॉल्ट मैकेंजी द्वारा प्रतिपादित और उत्तर-पश्चिम प्रांत, मध्य भारत तथा पंजाब में लागू 'महालवारी व्यवस्था' के अंतर्गत भू-राजस्व का निर्धारण व्यक्तिगत किसान के स्तर पर न करके संपूर्ण ग्राम (महाल) या ग्राम समुदाय के साथ सामूहिक रूप से किया जाता था, और लगान अदायगी की सामूहिक जिम्मेदारी पूरे ग्राम समुदाय की होती थी।
4. इन तीनों भू-राजस्व प्रणालियों के लागू होने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में मुद्रा अर्थव्यवस्था (Monetization) का विस्तार हुआ, जिसके फलस्वरूप कृषि का बड़े पैमाने पर व्यावसायीकरण हुआ और किसानों को खाद्यान्न फसलों के स्थान पर कपास, नील और जूट जैसी नकदी फसलों के उत्पादन के लिए बाध्य होना पड़ा।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
→
छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा स्थापित मराठा साम्राज्य और उसकी प्रशासनिक-सैन्य व्यवस्था के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. शिवाजी महाराज के केंद्रीय प्रशासन में 'अष्टप्रधान' नामक मंत्रिपरिषद थी, जिसमें प्रत्येक मंत्री सीधे छत्रपति के प्रति उत्तरदायी होता था और इनमें से अधिकांश मंत्रियों (पंडितराव और न्यायाधीश को छोड़कर) को समय-समय पर सैन्य अभियानों का नेतृत्व भी करना पड़ता था।
2. मराठा प्रशासन में 'चौथ' और 'सरदेशमुखी' केवल स्वराज्य (मराठा गृह प्रदेश) के भीतर किसानों से वसूले जाने वाले आंतरिक भू-राजस्व कर थे, जिनका मराठा साम्राज्य के बाहर के मुगल क्षेत्रों से कोई संबंध नहीं था।
3. शिवाजी ने अपनी सेना में वंशानुगत सरदारों (सिग्नेचर जागीरदारों) की प्रथा को पूरी तरह समाप्त कर दिया था और सैनिकों को लूट के माल के बजाय नियमित नकद वेतन देने की परंपरा के साथ-साथ 'दाग' एवं 'हुलिया' जैसी अनुशासनात्मक प्रथाओं को कड़ाई से लागू किया था।
4. शिवाजी के उत्तराधिकारियों के काल में पेशवाओं के उदय के दौरान, 'संगोला की संधि' (1750) के परिणामस्वरूप छत्रपति की स्थिति केवल एक नाममात्र का शासक बनकर रह गई और समस्त वास्तविक प्रशासनिक एवं राजनैतिक शक्ति पेशवा के हाथों में केंद्रित हो गई।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
→
मुगल काल में "खुलासत-उत-तवारीख" के लेखक कौन हैं?
→
महाभारत का फारसी अनुवाद "रज़्मनामा" किसके निर्देशन में किया गया था?
Log in
to add to quiz, bookmark, or report issues.