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Indian Polity
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संवैधानिक उपचारों का अधिकार (Right to Constitutional Remedies) किस अनुच्छेद में है?

Detailed Explanation

अनुच्छेद 32 संवैधानिक उपचारों का अधिकार देता है, जिसे डॉ. अंबेडकर ने संविधान की 'आत्मा और हृदय' कहा था।
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→ भारतीय संविधान के भाग III (मूल अधिकार) के अंतर्गत प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकारों और उससे संबंधित न्यायिक दृष्टांतों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 25 के अंतर्गत प्रत्येक व्यक्ति को अंतःकरण की स्वतंत्रता और धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने का अधिकार प्राप्त है, किंतु यह अधिकार लोक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य के अधीन है तथा इसमें किसी भी आर्थिक, वित्तीय, राजनैतिक या अन्य लौकिक क्रियाकलाप का विनियमन या निर्बंधन करने वाली विधि बनाने से राज्य को नहीं रोका गया है। 2. अनुच्छेद 26 के तहत प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय या उसके किसी अनुभाग को धार्मिक और दान प्रयोजनों के लिए संस्थाओं की स्थापना और पोषण करने का अधिकार है, तथा इस अनुच्छेद के अंतर्गत किसी धार्मिक संप्रदाय को अपनी स्वयं की संपत्ति का स्वामित्व और अर्जन करने का पूर्ण अधिकार प्राप्त है, जिस पर राज्य किसी भी प्रकार का सामाजिक कल्याण या सुधारवादी कानून लागू नहीं कर सकता है। 3. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 'शिरूर मठ वाद (1954)' में यह निर्धारित किया गया था कि अनुच्छेद 25 और 26 के अंतर्गत किसी धर्म के 'essential practices' (आवश्यक प्रथाओं) को संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है, और कौन सी प्रथा किसी धर्म का अनिवार्य अंग है या नहीं, इसका निर्धारण न्यायपालिका द्वारा संबंधित धर्म के धार्मिक सिद्धांतों और परंपराओं के आधार पर किया जाता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय संविधान के भाग III के अंतर्गत वर्णित मूल अधिकारों (Fundamental Rights) और उनसे संबंधित संवैधानिक प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान का अनुच्छेद 15(5) राज्य को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हुए नागरिकों के वर्गों की उन्नति के लिए या अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए शिक्षण संस्थाओं (अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थाओं को छोड़कर) में प्रवेश से संबंधित विशेष उपबंध करने की शक्ति प्रदान करता है, जिसे 93वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2005 द्वारा जोड़ा गया था। 2. अनुच्छेद 21 के अंतर्गत 'जीवन का अधिकार' और 'निजता का अधिकार' (Right to Privacy) एक मौलिक अधिकार है, और 'के.एस. पुट्टुस्वामी बनाम भारत संघ' (2017) मामले में सर्वोच्च न्यायालय की नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने यह स्पष्ट किया कि निजता का अधिकार अनुच्छेद 21 का एक अभिन्न अंग है, जिसे केवल विध द्वारा स्थापित प्रक्रिया के आधार पर ही युक्तिसंगत प्रतिबंधों के अधीन प्रतिबंधित किया जा सकता है। 3. अनुच्छेद 34 संसद को यह शक्ति देता है कि वह भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर किसी भी क्षेत्र में सेना विधि (Martial Law) के प्रवृत्त होने के दौरान सरकार या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा उस क्षेत्र में शांति बनाए रखने या पुनः स्थापित करने के लिए किए गए किसी भी कार्य को वैध बनाने के लिए संसद द्वारा संसद की पूर्व अनुमति से संसद द्वारा कानून बनाकर क्षतिपूर्ति (Indemnity) का प्रावधान कर सकती है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → 'उद्देश्य प्रस्ताव' (Objectives Resolution) संविधान सभा में किसने प्रस्तुत किया था? → भारतीय संविधान के भाग-III (मूल अधिकार) के अंतर्गत प्रदत्त स्वतंत्रता के अधिकारों और विभिन्न न्यायिक दृष्टांतों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) के अंतर्गत कोई भी वृत्ति, व्यापार या कारोबार करने का मूल अधिकार प्रदत्त किया गया है, किंतु राज्य इस अधिकार के प्रयोग पर 'व्यापक लोक हित' (General Public Interest) में युक्तियुक्त निर्बंधन आरोपित कर सकता है, और इसके तहत राज्य किसी भी व्यापार या कारोबार पर पूर्ण एकाधिकार (Complete Monopoly) स्थापित करने के लिए भी कानून बना सकता है, जिसके लिए नागरिकों के अपने व्यवसाय के संवैधानिक अधिकार का पूर्णतः समाप्त होना असंवैधानिक नहीं माना जाएगा। 2. 'अनुच्छेद 21' के अंतर्गत दिए गए 'प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के संरक्षण' के अधिकार के दायरे में 'निजता का अधिकार' (Right to Privacy) को उच्चतम न्यायालय की नौ-सदस्यीय संविधान पीठ द्वारा 'के. एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017)' मामले में सर्वसम्मति से एक मौलिक अधिकार घोषित किया गया था, जो अनुच्छेद 21 के साथ-साथ भाग-III के अन्य अनुच्छेदों के अंतर्गत भी अंतर्निहित है। 3. संविधान के अनुच्छेद 22 के उपबंधों के अनुसार निवारक नजरबंदी (Preventive Detention) के अधीन किसी भी व्यक्ति को, चाहे वह विदेशी हो या भारत का नागरिक, किसी भी परिस्थिति में बिना सलाहकार बोर्ड (Advisory Board) की राय प्राप्त किए तीन महीने से अधिक की अवधि के लिए निरुद्ध नहीं रखा जा सकता, और संसद के पास यह शक्ति नहीं है कि वह इस तीन महीने की अवधि को बिना बोर्ड की संस्तुति के बढ़ा सके। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्यों के उच्च न्यायालयों (High Courts) और अधीनस्थ न्यायालयों की संरचना, उनकी अधिकारिता तथा शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 214 के अनुसार प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय होगा, किंतु संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह विधि द्वारा दो या अधिक राज्यों के लिए अथवा किसी संघ राज्यक्षेत्र को मिलाकर एक ही उच्च न्यायालय स्थापित कर सकती है। 2. किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को उसके पद से हटाने की प्रक्रिया वही है जो उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने की है, और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन और भत्ते संबंधित राज्य की संचित निधि (Consolidated Fund of the State) पर भारित होते हैं, जबकि उनकी पेंशन भारत की संचित निधि से दी जाती है। 3. संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत प्रत्येक उच्च न्यायालय को अपने प्रादेशिक क्षेत्राधिकार के भीतर सभी न्यायालयों और अधिकरणों (Tribunals) के अधीक्षण (Superintendence) की व्यापक शक्ति प्राप्त है, जिसमें प्रशासनिक और न्यायिक दोनों प्रकार के अधीक्षण शामिल हैं, और यह शक्ति सैन्य न्यायालयों या सशस्त्र बलों से संबंधित अधिकरणों पर भी लागू होती है। 4. संविधान के अनुच्छेद 233 के अंतर्गत किसी राज्य में जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पोस्टिंग और पदोन्नति उस राज्य के राज्यपाल द्वारा संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय से परामर्श करके की जाती है, और जिला न्यायाधीश के अलावा अन्य न्यायिक सेवा के व्यक्तियों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा राज्य लोक सेवा आयोग और उच्च न्यायालय से परामर्श करके की जाती है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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