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Indian Polity
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संविधान के भाग 4A में क्या है?
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Detailed Explanation
भाग 4A मौलिक कर्तव्य हैं।
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किस फसल का विकास पुष्पक्रम में होता है?
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भारत के राष्ट्रपति की विधाई, कूटनीतिक और आपातकालीन शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 85 के अंतर्गत राष्ट्रपति को लोकसभा को विघटित करने की शक्ति प्राप्त है, और यह शक्ति उसकी ऐसी कार्यपालिका शक्ति है जिसके प्रयोग के लिए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली मंत्रिपरिषद की सलाह मानना राष्ट्रपति के लिए पूर्ण रूप से बाध्यकारी होता है, भले ही मंत्रिपरिषद ने लोकसभा में बहुमत खो दिया हो या न खोया हो।
2. भारत का राष्ट्रपति किसी भी देश के साथ अंतरराष्ट्रीय संधियों और समझौतों पर हस्ताक्षर करने और उन्हें स्वीकार करने के लिए पूर्णतः अधिकृत होता है, किंतु ऐसी सभी अंतरराष्ट्रीय संधियाँ और समझौते स्वतः ही भारत के घरेलू कानून बन जाते हैं और उनके क्रियान्वयन के लिए संसद द्वारा किसी भी विधि का निर्माण करना आवश्यक नहीं होता है।
3. राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 352) की उद्घोषणा के समय राष्ट्रपति को यह शक्ति प्राप्त है कि वह मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन को निलंबित करने के लिए आदेश जारी कर सकता है, किंतु अनुच्छेद 20 और अनुच्छेद 21 द्वारा प्रदत्त अधिकारों के प्रवर्तन को निलंबित करने का ऐसा कोई भी आदेश राष्ट्रपति द्वारा कभी भी जारी नहीं किया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के प्रथम भाग के अंतर्गत 'संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र' (अनुच्छेद 1-4) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 2 के तहत संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह विधि द्वारा 'संघ में नए राज्यों का प्रवेश' या उनकी स्थापना ऐसे निबंधनों और शर्तों पर कर सके जो वह ठीक समझे, और यह शक्ति केवल उन राज्यों के लिए है जो पहले से विद्यमान भारतीय संघ का हिस्सा नहीं हैं (अर्थात बाहरी क्षेत्रों के लिए)।
2. अनुच्छेद 3 के अंतर्गत संसद को किसी राज्य के क्षेत्र को बढ़ाने, घटाने, उसके नाम या सीमा में परिवर्तन करने की शक्ति प्राप्त है, किंतु इस प्रयोजन के लिए कोई भी विधेयक राष्ट्रपति की पूर्व संस्तुति के बिना संसद के किसी भी सदन में पुनःस्थापित नहीं किया जा सकता है, और राष्ट्रपति के लिए यह अनिवार्य है कि वह विधेयक को संबंधित राज्य के विधानमंडल के पास उसके विचार जानने के लिए भेजे, तथा राज्य विधानमंडल द्वारा व्यक्त किया गया विचार राष्ट्रपति या संसद पर संवैधानिक रूप से बाध्यकारी होता है।
3. अनुच्छेद 4 के अनुसार अनुच्छेद 2 और अनुच्छेद 3 के अधीन नए राज्यों के प्रवेश या गठन तथा सीमाओं, क्षेत्रों या नामों में परिवर्तन के लिए बनाए गए विधियों को संविधान के अनुच्छेद 368 के प्रयोजन के लिए 'संविधान संशोधन' नहीं माना जाएगा, जिसका अर्थ है कि ऐसे विधियों को संसद के साधारण बहुमत (Simple Majority) द्वारा पारित किया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के भाग-IVक के अंतर्गत उल्लिखित 'मूल कर्तव्यों' (Fundamental Duties) के प्रावधानों और उनके ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मूल कर्तव्यों को सरदार स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिश पर 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा संविधान में जोड़ा गया था, जिसमें समिति ने नागरिकों द्वारा करों का भुगतान (Payment of Taxes) करने को भी एक मूल कर्तव्य के रूप में शामिल करने की संस्तुति की थी, जिसे इंदिरा गांधी सरकार ने स्वीकार नहीं किया था।
2. अनुच्छेद 51क के तहत प्रदत्त मूल कर्तव्य केवल भारतीय नागरिकों पर ही लागू होते हैं, विदेशी नागरिकों पर नहीं, और इनकी प्रकृति न्यायोचित (Justiciable) है, जिसका अर्थ यह है कि यदि कोई नागरिक किसी मूल कर्तव्य का उल्लंघन करता है, तो उसे सीधे उच्चतम न्यायालय द्वारा दंडित किया जा सकता है।
3. न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा समिति (1999) ने मूल कर्तव्यों के शिक्षण और उनके प्रभावी क्रियान्वयन से संबंधित संस्तुतियाँ दी थीं, और इस समिति ने यह स्पष्ट किया था कि संविधान के कई मूल कर्तव्यों का सार भारतीय सांस्कृतिक और पारंपरिक मूल्यों जैसे पर्यावरण संरक्षण और भाईचारे में पहले से ही निहित है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के भाग-IV के अंतर्गत वर्णित राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (DPSP - अनुच्छेद 36-51) की प्रकृति, संशोधनों और उनके विधिक प्रभावों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 31ग (Article 31C), जिसे 25वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1971 द्वारा अंतःस्थापित किया गया था, के अनुसार यदि राज्य अनुच्छेद 39(ख) और 39(ग) में वर्णित सामाजिक-आर्थिक न्याय संबंधी नीति निर्देशक तत्वों को प्रभावी करने के लिए कोई कानून बनाता है, तो इस आधार पर उसे इस न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती कि वह अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों का उल्लंघन करता है।
2. 'मिनर्वा मिल्स वाद' (1980) में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट रूप से निर्धारित किया कि भाग-III (मूल अधिकार) और भाग-IV (नीति निर्देशक तत्व) एक-दूसरे के पूरक हैं, और यदि नीति निर्देशक तत्वों को लागू करने के लिए मूल अधिकारों (विशेषकर अनुच्छेद 14 और 19) में संशोधन किया जाता है, तो ऐसा कोई भी कानून संविधान के मूल ढांचा (Basic Structure) का उल्लंघन नहीं माना जाएगा।
3. यद्यपि नीति निर्देशक तत्व देश के शासन में मूलभूत हैं और न्यायपालिका द्वारा प्रवर्तनीय (Non-justiciable) नहीं हैं, तथापि उच्चतम न्यायालय ने अपने विभिन्न ऐतिहासिक निर्णयों में यह प्रतिपादित किया है कि संविधान के अनुच्छेद 21 (प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार) की व्यापक व्याख्या करते समय नीति निर्देशक तत्वों में निहित कल्याणकारी संकल्पनाओं को इसके अंतर्गत शामिल किया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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