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भारतीय राजव्यवस्था और भारतीय संविधान के अंतर्गत 'अटॉर्नी जनरल ऑफ इंडिया' (Attorney General for India - Article 76) तथा 'महाधिवक्ता' (Advocate General - Article 165) के संवैधानिक प्रावधानों एवं उनकी कार्यप्रणाली के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. अटॉर्नी जनरल देश का सर्वोच्च विधि अधिकारी होता है, जिसकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा ऐसे व्यक्ति की जाती है जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने के लिए अर्ह हो, और संविधान ने इसके कार्यकाल को निश्चित नहीं किया है तथा यह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत (During the Pleasure of the President) पद धारण करता है।
  2. 2. भारत के महान्यायवादी (Attorney General) को देश के सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार प्राप्त है, और उसे संसद के किसी भी सदन या उसकी संयुक्त बैठक में बोलने तथा उसकी कार्यवाही में भाग लेने का पूर्ण संवैधानिक अधिकार है, किंतु उसे संसद की किसी भी समिति में मतदान करने का अधिकार प्राप्त नहीं है।
  3. 3. राज्य के महाधिवक्ता (Advocate General) की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है और उसके पास राज्य विधानमंडल के दोनों सदनों (जहाँ द्विसदनीय व्यवस्था हो) की बैठकों में भाग लेने का अधिकार होता है, किंतु मतदान के अधिकार के संबंध में उसे भी वही प्रतिबंध सहने पड़ते हैं जो महान्यायवादी को संसद के संदर्भ में सहने होते हैं।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: संविधान के अनुच्छेद 76 के अनुसार, राष्ट्रपति द्वारा भारत के महान्यायवादी (Attorney General for India) की नियुक्ति की जाती है। वह व्यक्ति इस पद के लिए योग्य होता है जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश बनने की अर्हता रखता हो। संविधान में महान्यायवादी का कार्यकाल निश्चित नहीं किया गया है और वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है तथा कभी भी अपना त्यागपत्र दे सकता है। कथन 2 सही है: महान्यायवादी को भारत के राज्यक्षेत्र के सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार है। अनुच्छेद 88 के अनुसार, उसे संसद के दोनों सदनों या उनकी किसी भी संयुक्त बैठक और संसद की किसी समिति (जिसका वह सदस्य नामित किया गया हो) में बोलने तथा कार्यवाही में भाग लेने का अधिकार है, किंतु उसे किसी भी स्थिति में मतदान करने का अधिकार (Right to Vote) प्राप्त नहीं है। कथन 3 सही है: संविधान के अनुच्छेद 165 के अंतर्गत राज्य के महाधिवक्ता की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है (योग्यता उच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनने की होनी चाहिए)। अनुच्छेद 177 के तहत उसे राज्य विधानमंडल के सदनों या उसकी समितियों में बोलने और भाग लेने का अधिकार है, लेकिन महान्यायवादी की तरह उसे भी मतदान का अधिकार प्राप्त नहीं होता है। अतः तीनों कथन पूर्णतः सही हैं।
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