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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के अंतर्गत 'अध्या Ordinance' (अध्यादेश - अनुच्छेद 123) तथा 'न्यायिक समीक्षा' के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 123 के तहत राष्ट्रपति को अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति संसद के सत्रावसान के दौरान प्राप्त होती है, और इस शक्ति का विस्तार उन्हीं विषयों पर होता है जिन पर कानून बनाने की शक्ति भारतीय संसद को प्राप्त है, किंतु राष्ट्रपति द्वारा जारी अध्यादेश की संवैधानिक वैधता अनिश्चित काल तक नहीं बनी रह सकती क्योंकि संसद के पुनः समवेत होने पर इसे 6 सप्ताह के भीतर दोनों सदनों द्वारा अनुमोदित किया जाना अनिवार्य होता है।
  2. 2. 'डी.सी. वाधवा बनाम बिहार राज्य (1987)' मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया था कि कार्यपालिका द्वारा किसी एक ही अध्यादेश को बार-बार पुनः प्रख्यापित (re-promulgation) करके विधायी कार्यों को अपने हाथ में लेना संविधान की मूल संरचना (Basic Structure) और संसद के प्रति कार्यपालिका के उत्तरदायित्व के सिद्धांत का उल्लंघन है, तथा ऐसा करना असंवैधानिक है।
  3. 3. 'कृष्णा कुमार सिंह बनाम बिहार राज्य (2017)' मामले में उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ ने यह स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 123 या 213 के तहत प्रख्यापित अध्यादेशों को विधानमंडल के समक्ष रखना एक अनिवार्य संवैधानिक कर्तव्य है, और यदि किसी अध्यादेश को सदन के पटल पर रखे बिना ही उसकी समय-सीमा समाप्त होने दी जाती है, तो उसके द्वारा किए गए सभी कार्यकारी और विधिक कार्यों का प्रभाव स्वतः समाप्त हो जाता है और वे शून्य हो जाते हैं।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: संविधान के अनुच्छेद 123 के तहत राष्ट्रपति संसद के सत्रावसान की स्थिति में अध्यादेश जारी कर सकते हैं। संसद के पुनः सत्र में आने पर इसे दोनों सदनों द्वारा छह सप्ताह के भीतर स्वीकृत करना अनिवार्य होता है। अधिकतम अवधि 6 महीने और 6 सप्ताह हो सकती है। कथन 2 सही है: 'डी.सी. वाधवा बनाम बिहार राज्य (1987)' मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अध्यादेशों का बार-बार पुनरप्रख्यापन (re-promulgation) करना विधायी शक्ति का अतिक्रमण है और यह असंवैधानिक है। कथन 3 गलत है: 'कृष्णा कुमार सिंह बनाम बिहार राज्य (2017)' मामले में 7-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने बहुमत से यह निर्णय दिया था कि अध्यादेश को विधायिका के पटल पर रखना एक संवैधानिक कर्तव्य है, किंतु यह जरूरी नहीं कि अध्यादेश के लैप्स होने पर उसके तहत पहले किए गए सभी पिछले संविदात्मक या विधिक अधिकारों/कार्यों का प्रभाव स्वतः शून्य हो जाए; अदालत ने मामलों की प्रकृति के आधार पर इसके प्रभावों का निर्धारण किया था।
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