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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग III' के अंतर्गत 'मौलिक अधिकार' (Fundamental Rights) तथा 'अनुच्छेद 19' और 'अनुच्छेद 21' के प्रावधानों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत भारत के प्रत्येक नागरिक को कोई भी वृत्ति, व्यापार या कारोबार करने का अधिकार प्राप्त है, किंतु राज्य इस अधिकार के प्रयोग पर 'व्यापक जनहित' में कोई भी प्रतिबंध लगा सकता है और इसके लिए यह आवश्यक नहीं है कि राज्य द्वारा लगाया गया प्रतिबंध केवल 'युक्तियुक्त' (Reasonable) ही हो।
- 2. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विभिन्न ऐतिहासिक निर्णयों (जैसे के. एस. पुट्टुस्वामी वाद) में यह प्रतिपादित किया गया है कि 'निजता का अधिकार' (Right to Privacy) अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का एक अनिवार्य अंग है, और इस पर केवल विध द्वारा स्थापित प्रक्रिया के तहत आनुपातिकता (Proportionality) और वैधता के आधार पर ही युक्तियुक्त प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
- 3. अनुच्छेद 20 और अनुच्छेद 21 द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों को राष्ट्रीय आपातकाल (National Emergency) के दौरान भी किसी भी परिस्थिति में निलंबित नहीं किया जा सकता है, जिसका स्पष्ट उल्लेख 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 के पश्चात संविधान के अनुच्छेद 359 में किया गया है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 गलत है: संविधान के अनुच्छेद 19(6) के अनुसार, अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत प्रदत्त व्यापार या कारोबार करने के अधिकार पर राज्य 'युक्तियुक्त प्रतिबंध' (Reasonable Restrictions) ही लगा सकता है। राज्य अपनी मर्जी से कोई भी अनुचित या मनमाना प्रतिबंध नहीं लगा सकता, बल्कि प्रतिबंध जनहित में और विधिक रूप से युक्तियुक्त होने चाहिए।
कथन 2 सही है: सर्वोच्च न्यायालय ने 'के. एस. पुट्टुस्वामी बनाम भारत संघ' (2017) मामले में सर्वसम्मति से यह निर्णय दिया था कि निजता का अधिकार (Right to Privacy) संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का एक अंतर्निहित और अभिन्न अंग है। इस पर लगाए जाने वाले प्रतिबंध वैध, कानूनी रूप से समर्थित और आनुपातिक (Proportional) होने चाहिए।
कथन 3 गलत है: 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा अनुच्छेद 359 में संशोधन करके यह प्रावधान किया गया कि राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान भी 'अनुच्छेद 20' (अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण) और 'अनुच्छेद 21' (प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण) द्वारा प्रदत्त अधिकारों को निलंबित नहीं किया जा सकता। किंतु केवल अनुच्छेद 21 और 20 ही अप्रभावी नहीं होते हैं, अन्य अनुच्छेद 19 आदि निलंबित हो सकते हैं; लेकिन कथन में यह कहना कि अनुच्छेद 20 और 21 के अलावा किसी अन्य आपातकालीन प्रावधान में त्रुटि नहीं है, सही है, परन्तु कथन 3 की भाषा में यदि केवल 20 और 21 की बात की जाए तो वे निलंबित नहीं होते, तथापि 44वें संशोधन के बाद से ये दोनों सुरक्षित हैं। तथापि, कथन 1 के गलत होने और कथन 2 के पूर्णतः सही होने के कारण विकल्प 'b' सही उत्तर है।
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 359' के अंतर्गत राष्ट्रीय आपातकाल (National Emergency) के दौरान मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के निलंबन के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 359 के तहत राष्ट्रपति को यह अधिकार प्राप्त है कि वह राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा के दौरान आदेश द्वारा भाग III द्वाराप्रदत्त किसी भी मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 20 और 21 को छोड़कर) के प्रवर्तन के लिए उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालयों में जाने के अधिकार को निलंबित कर सकता है।
2. अनुच्छेद 359 के अधीन राष्ट्रपति द्वारा जारी किया गया ऐसा कोई भी आदेश संपूर्ण भारत या उसके किसी भाग तक सीमित हो सकता है, तथा इस आदेश को संसद के दोनों सदनों के समक्ष अनुमोदन के लिए रखना अनिवार्य होता है।
3. वर्ष 1978 के 44वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा यह प्रावधान किया गया कि राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान भी अनुच्छेद 20 (अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण) और अनुच्छेद 21 (प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण) के प्रवर्तन को निलंबित नहीं किया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 72' के अंतर्गत भारत के राष्ट्रपति की 'क्षमादान की शक्ति' तथा इसके न्यायिक दायरे के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति को उन सभी मामलों में, जिनमें दंड या दंडादेश ऐसे विषय के विरुद्ध किसी विधि के तहत दिया गया है जिस पर संघ की कार्यकारी शक्ति का विस्तार होता है, किसी भी अपराध के लिए दोषी ठहराए गए व्यक्ति के दंडादेश को क्षमा, प्रविलंबन, विराम या परिहार प्रदान करने या दंडादेश को निलंबित, परिहरित या लघुकरण करने की शक्ति प्राप्त है, जिसमें सेना न्यायालय (Court Martial) द्वारा दिए गए सभी दंड भी शामिल हैं।
2. 'मार्-नंदन बनाम भारत संघ (1980)' और 'एकीकृत मानवीय बनाम भारत संघ' मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि राष्ट्रपति अपनी क्षमादान शक्ति का प्रयोग अपनी व्यक्तिगत या स्वविवेकपूर्ण निर्णय (Discretionary Power) के आधार पर करते हैं, और इसके लिए केंद्रीय मंत्रिपरिषद की 'सहायता और सलाह' (Aid and Advice) लेना संवैधानिक रूप से अनिवार्य नहीं है।
3. 'इरम खातून बनाम भारत संघ' तथा अन्य संबंधित न्यायिक निर्णयों में सर्वोच्च न्यायालय ने यह व्यवस्था दी है कि राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति (अनुच्छेद 72) की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) पूरी तरह से वर्जित है, और यदि राष्ट्रपति किसी दया याचिका पर निर्णय लेने में अत्यधिक देरी भी करते हैं, तो न्यायालय उस निर्णय के विरुद्ध कोई भी रिट या निर्देश जारी नहीं कर सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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