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भारतीय पर्यावरण, पारिस्थितिकी और जैव विविधता के संदर्भ में, 'राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण' (NBA) और 'जैविक विविधता अधिनियम, 2002' से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. जैविक विविधता अधिनियम, 2002 के तहत स्थापित 'राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण' (NBA) एक सांविधिक निकाय है, जिसका मुख्यालय चेन्नई में स्थित है, और यह अधिनियम विदेशी नागरिकों, कंपनियों या अनिवासी भारतीयों (NRIs) के लिए देश के जैविक संसाधनों तक पहुँच प्राप्त करने से पहले NBA की पूर्व-अनुमति लेना अनिवार्य बनाता है।
- 2. इस अधिनियम के प्रावधानों के तहत स्थापित त्रि-स्तरीय संस्थागत तंत्र में राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA), राज्य स्तर पर राज्य जैव विविधता बोर्ड (SBB), और स्थानीय स्तर पर जैव विविधता प्रबंधन समितियां (BMC) शामिल हैं, जिनका मुख्य कार्य स्थानीय स्तर पर 'जन जैव विविधता रजिस्टर' (PBR) तैयार करना है।
- 3. जैविक विविधता (संशोधन) अधिनियम, 2023 के माध्यम से पारंपरिक ज्ञान धारकों (Traditional Knowledge Holders) को जैव संसाधनों के उपयोग के पूर्व समझौते (Prior Informed Consent) और लाभ-साझाकरण (Benefit Sharing) के प्रावधानों से पूरी तरह और स्थायी रूप से छूट दे दी गई है, ताकि अनुसंधान को बढ़ावा दिया जा सके।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: जैविक विविधता अधिनियम, 2002 के तहत स्थापित 'राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण' (NBA) एक सांविधिक निकाय है जिसका मुख्यालय चेन्नई में स्थित है। यह अधिनियम विदेशी व्यक्तियों, निगमों या अनिवासी भारतीयों को देश के जैविक संसाधनों या उससे जुड़े पारंपरिक ज्ञान तक पहुँच प्राप्त करने के लिए NBA की पूर्व अनुमति लेने का प्रावधान करता है।
कथन 2 सही है: इस अधिनियम के तहत एक त्रि-स्तरीय संस्थागत संरचना का प्रावधान किया गया है—राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA), राज्य स्तर पर राज्य जैव विविधता बोर्ड (SBB), और स्थानीय स्वशासन स्तर पर जैव विविधता प्रबंधन समितियां (BMC)। इन BMC का मुख्य कार्य स्थानीय स्तर पर 'जन जैव विविधता रजिस्टर' (PBR) तैयार करना होता है, जिसमें स्थानीय जैविक संसाधनों और पारंपरिक ज्ञान का विवरण होता है।
कथन 3 गलत है: जैविक विविधता (संशोधन) अधिनियम, 2023 ने पारंपरिक ज्ञान धारकों को कुछ राहत अवश्य दी है और आयुष चिकित्सकों (Ayush practitioners) को लाभ-साझाकरण से छूट दी है, किंतु पारंपरिक ज्ञान धारकों को पूर्व समझौते (Prior Informed Consent) और लाभ-साझाकरण के दायरे से पूरी तरह और स्थायी रूप से समाप्त या मुक्त नहीं किया गया है, बल्कि अधिनियम का उद्देश्य अनुपालन के बोझ को कम करना और सुगमता (Ease of Doing Business) को बढ़ावा देना था।
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 32' (संवैधानिक उपचारों का अधिकार) और 'अनुच्छेद 226' (उच्च न्यायालयों की रिट अधिकारिता) के बीच तुलनात्मक शक्तियों तथा इनकी प्रकृति के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय को केवल 'मूल अधिकारों' के प्रवर्तन के लिए ही रिट जारी करने की शक्ति प्राप्त है, जबकि अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालयों को मूल अधिकारों के साथ-साथ 'किसी अन्य उद्देश्य' (जैसे सामान्य कानूनी अधिकारों के प्रवर्तन के लिए) के वास्ते भी रिट जारी करने की विस्तृत शक्ति प्राप्त है।
2. भौगोलिक क्षेत्राधिकार के मामले में, अनुच्छेद 32 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता पूरे भारत के राज्यक्षेत्र तक विस्तारित है और यह किसी ऐसे व्यक्ति या प्राधिकारी के खिलाफ भी रिट जारी कर सकता है जो सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्रीय क्षेत्राधिकार से बाहर स्थित हो, बशर्ते उसका कारण भारत के भीतर उत्पन्न हुआ हो।
3. अनुच्छेद 32 स्वयं में संविधान का एक मूल अधिकार है, इसलिए सर्वोच्च न्यायालय मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए अपनी रिट अधिकारिता का प्रयोग करने से इनकार नहीं कर सकता क्योंकि यह उसके मूल क्षेत्राधिकार (Original Jurisdiction) का हिस्सा है, जबकि अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता उसका एक विवेकसाध्य (Discretionary) अधिकार है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 32' और 'अनुच्छेद 226' के अंतर्गत रिट अधिकारिता (Writ Jurisdiction) तथा जनहित याचिका (PIL) की अवधारणा के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. जनहित याचिका (Public Interest Litigation - PIL) की अवधारणा भारतीय कानूनी प्रणाली में मूल रूप से अमेरिकी न्यायशास्त्र से प्रेरित है, और इसके तहत सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय में याचिका केवल उसी व्यक्ति द्वारा दायर की जा सकती है जिसके मौलिक अधिकारों का प्रत्यक्ष उल्लंघन हुआ हो।
2. अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता का दायरा अनुच्छेद 32 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता की तुलना में अधिक व्यापक है, क्योंकि उच्च न्यायालय मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के साथ-साथ 'अन्य किसी प्रयोजन' (अर्थात सांविधिक अधिकारों के उल्लंघन पर) के लिए भी रिट जारी कर सकता है।
3. ऐतिहासिक 'एस.पी. गुप्ता बनाम भारत संघ (1982)' वाद में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट किया था कि यदि समाज का कोई पीड़ित वर्ग या जनहितैषी व्यक्ति किसी लोक-हित में न्यायालय का दरवाजा खटखटाता है, तो 'लोकस स्टैंडी' (Locus Standi - वाद दायर करने का अधिकार) के पारंपरिक नियम को शिथिल किया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XVIII' के अंतर्गत 'आपात उपबंध' (Emergency Provisions - अनुच्छेद 352 से 360) से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 352 के अनुसार, राष्ट्रीय आपातकाल (National Emergency) की उद्घोषणा राष्ट्रपति द्वारा केवल तभी की जा सकती है जब मंत्रिमंडल (Cabinet) द्वारा लिखित रूप में ऐसा निर्णय राष्ट्रपति को संसूचित किया जाए, तथा मूल संविधान में 'सशस्त्र विद्रोह' (Armed Rebellion) शब्द के स्थान पर 'आंतरिक अशांति' (Internal Disturbance) शब्द का प्रयोग किया गया था, जिसे बाद में 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा बदला गया था।
2. राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा करने वाले संसद के प्रत्येक सदन द्वारा संकल्प को उद्घोषणा की तिथि से एक महीने के भीतर विशेष बहुमत (Special Majority) द्वारा अनुमोदित किया जाना आवश्यक होता है, तथा एक बार अनुमोदित होने के बाद राष्ट्रीय आपातकाल अनिश्चित काल तक जारी रह सकता है, बशर्ते इसे हर छह महीने में संसद के अनुमोदन से आगे बढ़ाया जाए।
3. संविधान के अनुच्छेद 359 के प्रावधानों के तहत राष्ट्रपति को यह शक्ति प्राप्त है कि वह राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान अनुच्छेद 20 और अनुच्छेद 21 द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन को छोड़कर अन्य सभी मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन को निलंबित करने के लिए आदेश जारी कर सकता है, तथा ऐसे आदेश संपूर्ण भारत या उसके किसी भाग पर लागू हो सकते हैं।
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