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Indian Polity
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भारत के महान्यायवादी (Attorney General) और नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. महान्यायवादी को भारत के सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार प्राप्त है तथा वह संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही में बोल सकता है और भाग ले सकता है, किंतु उसे संसद की संयुक्त बैठक में मत देने का पूर्ण संवैधानिक अधिकार प्राप्त होता है।
- 2. नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा अपने हस्ताक्षर और मुद्रा सहित अधिपत्र द्वारा की जाती है, और उसे उसके पद से उसी रीति और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जिस रीति और जिन आधारों पर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है।
- 3. CAG अपने पद पर न तो भारत सरकार के अधीन और न ही किसी राज्य सरकार के अधीन किसी अन्य कार्यालय या रोजगार का पात्र होता है, जबकि महान्यायवादी को निजी वकालत करने से संविधान द्वारा पूर्णतः प्रतिबंधित किया गया है और वह सरकार का पूर्णकालिक सेवक होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 असत्य है क्योंकि महान्यायवादी को संसद के सदनों या उसकी संयुक्त बैठक में बोलने और भाग लेने का अधिकार तो है, किंतु उसे किसी भी स्थिति में मत देने (Voting) का अधिकार नहीं है। कथन 2 सत्य है क्योंकि नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) को राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया जाता है और उसे उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के समान ही साबित कदाचार या असमर्थता के आधार पर संसद के दोनों सदनों के विशेष बहुमत द्वारा पारित प्रस्ताव के माध्यम से हटाया जाता है। कथन 3 असत्य है क्योंकि महान्यायवादी को निजी वकालत करने से संविधान द्वारा प्रतिबंधित नहीं किया गया है; वह सरकार का पूर्णकालिक विधिक सलाहकार नहीं होता है और वह निजी प्रैक्टिस कर सकता है, बशर्ते वह सरकार के विरुद्ध मामलों में पैरवी न करे। अधिक विस्तृत अध्ययन के लिए आप भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था के अध्यायों का संदर्भ ले सकते हैं।
Related Questions
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भारतीय संविधान की प्रस्तावना (उद्देशिका) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा प्रस्तुत और संविधान सभा द्वारा स्वीकृत 'उद्देश्य प्रस्ताव' (Objective Resolution) ही परिवर्धित होकर भारतीय संविधान की प्रस्तावना बना, जिसे 26 जनवरी 1950 को संविधान के लागू होने के साथ ही अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित किया गया था।
2. 'बेरूबारी यूनियन वाद' (1960) में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट निर्णय दिया था कि प्रस्तावना भारतीय संविधान का एक अभिन्न अंग (Integral Part) है और संसद इसमें अनुच्छेद 368 के तहत संशोधन कर सकती है।
3. 'केशवानंद भारती वाद' (1973) के ऐतिहासिक निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने अपने पूर्व के मत को बदलते हुए यह अभिनिर्धारित किया कि प्रस्तावना संविधान का अंग है, तथा इसमें निहित 'मूल ढांचा' (Basic Structure) को छोड़कर संसद द्वारा अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संशोधन किया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संसद की विधाई प्रक्रिया और वित्तीय विधेयकों (Financial Bills) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 117(1) के अंतर्गत उल्लिखित 'वित्तीय विधेयक (श्रेणी-I)' को लोकसभा में ही पुनःस्थापित किया जा सकता है, और इसे पुनःस्थापित करने के लिए राष्ट्रपति की पूर्व संस्तुति आवश्यक होती है, किंतु राज्यसभा इस विधेयक को पारित करने, अस्वीकृत करने या इसमें संशोधन करने (धन विधेयकों की तरह प्रतिबंधों के अधीन रहते हुए) की सामान्य विधायी शक्तियों का प्रयोग कर सकती है।
2. अनुच्छेद 117(3) के अंतर्गत उल्लिखित 'वित्तीय विधेयक (श्रेणी-II)' (जिसमें ऐसा उपबंध है जिससे भारत की संचित निधि से व्यय करना पड़े) को संसद के किसी भी सदन में पुनःस्थापित किया जा सकता है, और इसे संसद के किसी भी सदन द्वारा तब तक पारित नहीं किया जा सकता जब तक राष्ट्रपति ने उस सदन को उस विधेयक पर विचार करने की संस्तुति न कर दी हो।
3. लोकसभा और राज्यसभा के बीच विधाई गतिरोध को समाप्त करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 108 के तहत संयुक्त बैठक (Joint Sitting) का प्रावधान धन विधेयकों और संविधान संशोधन विधेयकों के अतिरिक्त 'वित्तीय विधेयक (श्रेणी-I)' के मामलों में लागू होता है, किंतु 'वित्तीय विधेयक (श्रेणी-II)' के मामलों में संयुक्त बैठक बुलाई जा सकती है।
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भारतीय संविधान के अंतर्गत अंतर-राज्यीय परिषद् (Inter-State Council) और केंद्र-राज्यीय प्रशासनिक संबंधों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 263 के तहत राष्ट्रपति को यह शक्ति प्राप्त है कि यदि किसी समय लोक हित में यह प्रतीत हो कि ऐसी परिषद् की स्थापना से राज्यों के बीच अथवा संघ और राज्यों के कुछ या सभी राज्यों के बीच उत्पन्न होने वाले विवादों की जाँच और उन पर विचार-विमर्श में सहायता मिलेगी, तो वह एक अंतर-राज्यीय परिषद् की स्थापना कर सकता है।
2. अंतर-राज्यीय परिषद् एक स्थायी संवैधानिक निकाय (Permanent Constitutional Body) है जिसका गठन संविधान के प्रारंभ के साथ ही वर्ष 1950 में कर दिया गया था, और प्रधानमंत्री इस परिषद् के पदेन अध्यक्ष होते हैं।
3. सरकारी आयोग (Sarkaria Commission, 1983-88) की संस्तुति के आधार पर वर्ष 1990 में राष्ट्रपति के आदेश द्वारा पहली बार अंतर-राज्यीय परिषद् की औपचारिक स्थापना की गई थी, और इसके सदस्यों में सभी राज्यों के मुख्यमंत्री तथा संघ राज्यक्षेत्रों के प्रशासक या मुख्यमंत्री शामिल होते हैं।
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भारतीय संविधान के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) की शक्तियों, अधिकारक्षेत्र और न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 141 के अनुसार उच्चतम न्यायालय द्वारा घोषित किया गया विधि (Law declared by Supreme Court) भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर सभी न्यायालयों पर आबद्धकर (Binding) होता है, किंतु स्वयं उच्चतम न्यायालय अपने पूर्ववर्ती निर्णयों या आदेशों से कानूनी रूप से पूरी तरह बंधा होता है और वह किसी भी स्थिति में अपने पुराने निर्णय को पलट नहीं सकता है।
2. संविधान के अनुच्छेद 142 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय को अपनी अधिकारिता का प्रयोग करते हुए ऐसा कोई भी डिक्री या आदेश पारित करने की पूर्ण शक्ति प्राप्त है जो उसके समक्ष लंबित किसी वाद या विषय में 'पूर्ण न्याय' (Complete Justice) करने के लिए आवश्यक हो, और संसद द्वारा बनाई गई किसी भी विधि के विपरीत भी ऐसा आदेश संपूर्ण भारत में प्रवृत्त होता है।
3. अनुच्छेद 145 के प्रावधानों के अनुसार उच्चतम न्यायालय को राष्ट्रपति के अनुमोदन से भारत के राज्यक्षेत्र के सभी न्यायालयों में प्रैक्टिस करने वाले वकीलों के नियमों सहित न्यायालय की प्रक्रिया और आचरण के विनियमन के लिए नियम बनाने की शक्ति प्राप्त है, और संवैधानिक मामलों की सुनवाई के लिए न्यूनतम पांच न्यायाधीशों की पीठ (Constitution Bench) का बैठना अनिवार्य किया गया है।
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भारतीय संविधान के भाग II (अनुच्छेद 5-11) के अंतर्गत नागरिकता के प्रावधानों और इससे संबंधित विधायी तथा संवैधानिक विकास के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 9 में यह स्पष्ट रूप से उपबंध किया गया है कि यदि कोई भारतीय नागरिक स्वेच्छा से किसी विदेशी राज्य की नागरिकता अर्जित कर लेता है, तो अनुच्छेद 5, 6 और 8 के उपबंधों के बावजूद उसका भारत का नागरिक होना स्वतः समाप्त हो जाएगा।
2. संविधान का अनुच्छेद 11 संसद को नागरिकता के अर्जन और समाप्ति तथा नागरिकता से संबंधित अन्य सभी विषयों के संबंध में उपबंध करने की पूर्ण शक्ति प्रदान करता है, और इसी शक्ति के तहत संसद ने 'भारतीय नागरिकता अधिनियम, 1955' पारित किया, जिसमें अब तक छह बार संशोधन किए जा चुके हैं।
3. जम्मू-कश्मीर राज्य के संबंध में संविधान के अनुच्छेद 35A (जिसे अब समाप्त कर दिया गया है) के अंतर्गत राज्य के 'स्थायी निवास' को परिभाषित करने और विशेष अधिकार देने की शक्ति राज्य विधानमंडल को दी गई थी, किंतु नागरिकता प्रदान करने या समाप्त करने की अनन्य शक्ति हमेशा से केवल भारतीय संसद के पास ही रही है, राज्य विधानमंडल के पास नहीं।
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