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Indian Polity
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भारतीय निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) की स्वतंत्रता, इसकी संरचना तथा चुनावी वित्तपोषण (Electoral Funding) और सुधारों से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 324 के अनुसार निर्वाचन आयोग में मुख्य निर्वाचन आयुक्त और ऐसे अन्य निर्वाचन आयुक्तों, यदि कोई हों, की नियुक्ति का प्रावधान है, जिन्हें संसद द्वारा इस संबंध में बनाई गई किसी विधि के उपबंधों के अधीन राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया जाता है।
- 2. 'मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यालय की अवधि) अधिनियम, 2023' के प्रावधानों के अनुसार, चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता (या सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता) और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल होते हैं, तथा मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान होती है।
- 3. निर्वाचन आयोग को यह विधिक और संवैधानिक अधिकार प्राप्त है कि वह राजनीतिक दलों द्वारा आंतरिक चुनावों (Internal Party Elections) को समय पर न कराने की स्थिति में उन दलों की मान्यता को रद्द कर सके, क्योंकि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29A के तहत आयोग को राजनीतिक दलों के पंजीकरण और उनके आंतरिक लोकतंत्र की समीक्षा करने की पूर्ण शक्ति दी गई है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है क्योंकि अनुच्छेद 324(2) के अनुसार निर्वाचन आयोग मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों (यदि कोई हों) से मिलकर बनेगा, जिनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा संसद द्वारा बनाई गई विधि के अधीन की जाती है। कथन 2 सही है क्योंकि 'मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023' के तहत चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और एक कैबिनेट मंत्री होते हैं, और मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने की रीति उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश जैसी होती है। कथन 3 गलत है क्योंकि निर्वाचन आयोग को जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29A के तहत राजनीतिक दलों के पंजीकरण की शक्ति तो प्राप्त है, किंतु उसे किसी राजनीतिक दल की मान्यता रद्द करने या आंतरिक चुनाव न कराने पर सीधे दल को अमान्य घोषित करने की स्पष्ट वैधानिक शक्ति प्राप्त नहीं है। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल पर जाएं।
Related Questions
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मौलिक अधिकारों को कौन निलंबित कर सकता है?
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भारतीय उच्चतम न्यायालय की अधिकारिता, अवमानना और न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 137 के तहत उच्चतम न्यायालय को यह शक्ति प्राप्त है कि वह अपने द्वारा दिए गए किसी निर्णय या आदेश का पुनरावलोकन (Review) कर सके, और यह पुनरावलोकन शक्ति केवल संसद द्वारा बनाई गई विधि के अधीन ही प्रयोग की जा सकती है, इसके लिए न्यायालय अपनी स्वविवेक शक्ति का प्रयोग नहीं कर सकता।
2. अनुच्छेद 142 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय अपनी अधिकारिता का प्रयोग करते हुए ऐसा कोई भी 'डिग्री या आदेश' पारित कर सकता है जो किसी मामले में पूर्ण न्याय (Complete Justice) करने के लिए आवश्यक हो, और ऐसा प्रत्येक आदेश पूरे भारत में प्रवर्तनीय होता है।
3. न्यायालय की अवमानना (Contempt of Court) के संदर्भ में, संविधान के अनुच्छेद 129 के तहत उच्चतम न्यायालय एक 'अभिलेख न्यायालय' (Court of Record) है जिसे अपनी अवमानना के लिए दंडित करने की शक्ति प्राप्त है, जिसमें सिविल अवमानना के साथ-साथ आपराधिक अवमानना भी शामिल है, और संसद को इस शक्ति को सीमित करने या समाप्त करने का पूर्ण संवैधानिक अधिकार प्राप्त है।
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राज्य विधानमंडल के अंतर्गत 'विधान परिषद' के गठन, संरचना, और धन विधेयकों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 169 के अनुसार संसद किसी राज्य में विधान परिषद का सृजन या उत्सादन कर सकती है, बशर्ते संबंधित राज्य की विधानसभा इस आशय का संकल्प अपनी कुल सदस्य संख्या के बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से पारित कर दे।
2. विधान परिषद की कुल सदस्य संख्या उस राज्य की विधानसभा के कुल सदस्यों की संख्या के एक-तिहाई से अधिक नहीं हो सकती है, किंतु किसी भी स्थिति में इसकी कुल सदस्य संख्या 40 से कम नहीं हो सकती है।
3. विधान परिषद के पास किसी साधारण विधेयक को अधिकतम चार महीने तक रोकने की शक्ति होती है, जबकि धन विधेयक के मामले में विधान परिषद के पास केवल 14 दिनों की देरी करने की शक्ति होती है, जिसके बाद वह विधेयक दोनों सदनों द्वारा पारित मान लिया जाता है, भले ही विधान परिषद ने उसे अस्वीकार क्यों न कर दिया हो।
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भारतीय संविधान के भाग IV में वर्णित राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (DPSP - अनुच्छेद 36-51) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 39(b) और 39(c) के अंतर्गत निहित समाजवादी सिद्धांतों को प्रभावी बनाने के लिए यदि राज्य कोई ऐसी विधि बनाता है जो अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों को अल्पीकृत करती है, तो ऐसी विधि को केवल इस आधार पर अमान्य नहीं ठहराया जाएगा कि वह उक्त अनुच्छेदों का उल्लंघन करती है, बशर्ते उसे संसद द्वारा पारित किया गया हो और राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त हो।
2. अनुच्छेद 44 के तहत राज्य भारत के पूरे राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) को सुरक्षित रखने का प्रयास करेगा, और यह सिद्धांत प्रकृति से न्यायोचित (Justiciable) है, जिसका तात्पर्य है कि इसके क्रियान्वयन के लिए देश का कोई भी नागरिक सीधे उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है।
3. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा नीति निर्देशक तत्वों में कुछ नए निदेशक तत्व जोड़े गए, जिनमें बच्चों के स्वस्थ विकास के लिए अवसरों को सुरक्षित करना (अनुच्छेद 39), समान न्याय और निःशुल्क कानूनी सहायता (अनुच्छेद 39A), उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी (अनुच्छेद 43A) तथा पर्यावरण का संरक्षण और संवर्धन तथा वन एवं वन्य जीवों की रक्षा (अनुच्छेद 48A) शामिल हैं।
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भारतीय संविधान के भाग, अनुसूचियाँ और राजभाषा से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के भाग XVII के अंतर्गत अनुच्छेद 348 में यह उपबंध किया गया है कि उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों की सभी कार्रवाइयाँ तथा संसद और राज्य विधानमंडलों द्वारा पारित सभी अधिनियमों व विधेयकों के पाठ अनिवार्य रूप से केवल हिंदी भाषा में ही होंगे, और इसके लिए अंग्रेजी भाषा के प्रयोग की कोई अनुमति नहीं दी गई है।
2. संविधान की नौवीं अनुसूची को प्रथम संविधान संशोधन अधिनियम, 1951 द्वारा जोड़ा गया था, जिसका उद्देश्य जमींदारी प्रथा का उन्मूलन करना था, तथा इस अनुसूची में शामिल किए जाने वाले कानूनों की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) पर 'केशवानंद भारती वाद' (1973) के पश्चात से कोई न्यायिक प्रतिबंध नहीं है, अर्थात् उन्हें किसी भी आधार पर चुनौती दी जा सकती है।
3. संविधान की आठवीं अनुसूची में बोडो, डोगरी, मैथिली और संथाली भाषाओं को 92वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 के द्वारा शामिल किया गया था, जिससे इस अनुसूची में कुल भाषाओं की संख्या बढ़कर 22 हो गई।
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