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Indian Polity
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राजभाषा के संवैधानिक उपबंधों, राजनीतिक दलों की मान्यता से जुड़े प्रावधानों तथा संविधान की अनुसूचियों और भागों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के भाग XVII के अंतर्गत अनुच्छेद 348 में यह प्रावधान किया गया है कि जब तक संसद विधि द्वारा अन्यथा उपबंध न करे, तब तक उच्चतम न्यायालय और प्रत्येक उच्च न्यायालय में सभी कार्रवाइयां अंग्रेजी भाषा में होंगी, तथा संसद या राज्य विधानमंडल द्वारा पारित प्रत्येक अधिनियम या उसके द्वारा निकाले गए अध्यादेश का प्राधिकृत पाठ भी अंग्रेजी भाषा में ही होना अनिवार्य है।
  2. 2. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29A के तहत भारत निर्वाचन आयोग द्वारा राजनीतिक दलों का पंजीकरण किया जाता है, किंतु आयोग को किसी पंजीकृत राजनीतिक दल को उसकी आंतरिक लोकतांत्रिक विफलता या संविधान के प्रति निष्ठा के अभाव के आधार पर उसका पंजीकरण रद्द (De-register) करने की कोई वैधानिक शक्ति प्राप्त नहीं है।
  3. 3. भारतीय संविधान की नौवीं अनुसूची को प्रथम संविधान संशोधन अधिनियम, 1951 द्वारा जोड़ा गया था, और इस अनुसूची में शामिल विधियों को न्यायिक समीक्षा से पूर्ण और अंतिम संरक्षण प्राप्त है, जिसका अर्थ यह है कि वर्ष 1973 के केशवानंद भारती वाद के निर्णय के पश्चात भी इस अनुसूची के किसी भी विषय की न्यायिक समीक्षा किसी भी परिस्थिति में नहीं की जा सकती है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: संविधान के भाग XVII के अनुच्छेद 348 के अनुसार, जब तक संसद विधि द्वारा कोई अन्य व्यवस्था न करे, तब तक सुप्रीम कोर्ट और सभी हाई कोर्ट्स की कार्यवाही अंग्रेजी में होगी और संसद/विधानमंडलों द्वारा पारित अधिनियमों का प्राधिकृत पाठ भी अंग्रेजी में ही होगा। कथन 2 गलत है: सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों और कानूनी स्थिति के अनुसार, निर्वाचन आयोग को सीधे तौर पर किसी राजनीतिक दल का पंजीकरण रद्द (De-register) करने की शक्ति प्राप्त नहीं है, किंतु यदि कोई दल धोखाधड़ी या असंवैधानिक तरीकों से पंजीकृत हुआ है, तो न्यायालय या अन्य विधिक प्रक्रिया के तहत कार्रवाई हो सकती है, हालांकि आयोग के पास स्वप्रेरणा से डी-रजिस्टर करने की शक्ति नहीं है। कथन 3 गलत है: इंदिरा साहनी या केशवानंद भारती के बाद आए ऐतिहासिक 'आई.आर. कोएलो वाद (2007)' में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया कि 24 अप्रैल 1973 के बाद नौवीं अनुसूची में जोड़ी गई ऐसी कोई भी विधि जो संविधान के मूल ढाचे (Basic Structure) का उल्लंघन करती है, उसकी न्यायिक समीक्षा की जा सकती है। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल पर विजिट करें।
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→ भारतीय संविधान के भाग IV-A के अंतर्गत वर्णित 'मूल कर्तव्यों' (Fundamental Duties) और स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिशों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. मूल कर्तव्यों को 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा संविधान में जोड़ा गया था, किंतु सरदार स्वर्ण सिंह समिति ने करों का भुगतान (Payment of Taxes) करने को भी एक मूल कर्तव्य के रूप में शामिल करने की संस्तुति की थी, जिसे इंदिरा गांधी सरकार ने स्वीकार कर लिया था और मूल संविधान में इसे शामिल किया गया था। 2. मूल प्रकृति से ये कर्तव्य केवल भारतीय नागरिकों पर ही लागू होते हैं, विदेशी नागरिकों पर नहीं; तथा संविधान में इनका प्रवर्तन सीधे न्यायालयों के माध्यम से नहीं किया जा सकता है, किंतु संसद विधि द्वारा इनके क्रियान्वयन के लिए उपयुक्त दंड या शास्ति का प्रावधान कर सकती है। 3. 86वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 के माध्यम से छह से चौदह वर्ष की आयु के बीच के अपने बच्चे या प्रतिपाल्य को शिक्षा के अवसर प्रदान करने का कर्तव्य जोड़ा गया, जिससे मूल कर्तव्यों की कुल संख्या बढ़कर वर्तमान में ग्यारह हो गई है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → संविधान का कौन सा अनुच्छेद 'भारत के महान्यायवादी' (Attorney General) के बारे में है? → भारतीय संविधान के अंतर्गत उपराष्ट्रपति के निर्वाचन, उनकी शक्तियों तथा प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद के उत्तरदायित्व एवं कामकाज के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 66 के अनुसार, उपराष्ट्रपति का निर्वाचन संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) के सभी सदस्यों से मिलकर बनने वाले निर्वाचकगण द्वारा होता है, जिसमें संसद के मनोनीत सदस्य भी भाग लेते हैं, किंतु राज्य विधानमंडलों के सदस्य इसमें कोई भाग नहीं लेते हैं। 2. उपराष्ट्रपति राज्यसभा के पदेन सभापति के रूप में कार्य करते समय सदन में किसी भी विषय पर पक्ष और विपक्ष के मत बराबर होने की स्थिति में अपना निर्णायक मत (casting vote) का प्रयोग कर सकता है, और यह अधिकार उसे तब भी प्राप्त रहता है जब वह राष्ट्रपति के रूप में कार्य कर रहा होता है या राष्ट्रपति के कृत्यों का निर्वहन कर रहा होता है। 3. संविधान के अनुच्छेद 75(3) के अनुसार मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है, जिसका तात्पर्य यह है कि लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पारित होने पर संपूर्ण मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र देना होता है, और प्रधानमंत्री की मृत्यु या पदत्याग की स्थिति में मंत्रिपरिषद स्वतः विघटित (dissolved) हो जाती है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय संविधान के भाग-II (अनुच्छेद 5-11) के अंतर्गत नागरिकता के प्रावधानों और संसद की विधायी शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 5 के अनुसार, संविधान के प्रारंभ पर प्रत्येक वह व्यक्ति भारत का नागरिक था जिसका अधिवास भारत के राज्यक्षेत्र में था और जो भारत के राज्यक्षेत्र में जन्मा था या जिसके माता-पिता में से कोई एक भारत के राज्यक्षेत्र में जन्मा था, अथवा जो ऐसे प्रारंभ से ठीक पहले कम से कम पाँच वर्ष तक भारत के राज्यक्षेत्र में साधारणतया निवासी रहा था। 2. अनुच्छेद 8 के अनुसार, भारत से बाहर रहने वाले कुछ व्यक्तियों के नागरिकता के अधिकारों का प्रावधान किया गया है, जिसके तहत यदि कोई व्यक्ति या उसके माता-पिता में से कोई एक अथवा दादा-दादी या नाना-दादी में से कोई एक अविभाजित भारत में जन्मा था और वह भारत से बाहर किसी देश में निवास कर रहा हो, तो वह भारत का नागरिक बन सकता है, बशर्ते उसने भारत के डोमिनियन की सरकार द्वारा निर्धारित फॉर्म और प्रक्रिया के अनुसार भारत के राजनयिक या कौंसलिया प्रतिनिधि के पास नागरिकता के लिए पंजीकरण करा लिया हो, चाहे वह स्वतंत्रता से पहले हो या बाद में। 3. अनुच्छेद 7 के तहत पाकिस्तान को प्रव्रजन करने वाले कुछ व्यक्तियों के नागरिकता के अधिकारों का नियमन किया गया है, जिसके अनुसार 1 मार्च 1947 के बाद भारत से पाकिस्तान के राज्यक्षेत्र को प्रव्रजन करने वाला कोई भी व्यक्ति भारत का नागरिक नहीं समझा जाएगा, भले ही वह बाद में पुनर्वास के परमिट के आधार पर भारत लौट आया हो। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय संसद की विधाई प्रक्रिया और वित्तीय विधेयकों (Financial Bills) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 117(1) के अंतर्गत उल्लिखित 'वित्तीय विधेयक (श्रेणी-I)' को लोकसभा में ही पुनःस्थापित किया जा सकता है, और इसे पुनःस्थापित करने के लिए राष्ट्रपति की पूर्व संस्तुति आवश्यक होती है, किंतु राज्यसभा इस विधेयक को पारित करने, अस्वीकृत करने या इसमें संशोधन करने (धन विधेयकों की तरह प्रतिबंधों के अधीन रहते हुए) की सामान्य विधायी शक्तियों का प्रयोग कर सकती है। 2. अनुच्छेद 117(3) के अंतर्गत उल्लिखित 'वित्तीय विधेयक (श्रेणी-II)' (जिसमें ऐसा उपबंध है जिससे भारत की संचित निधि से व्यय करना पड़े) को संसद के किसी भी सदन में पुनःस्थापित किया जा सकता है, और इसे संसद के किसी भी सदन द्वारा तब तक पारित नहीं किया जा सकता जब तक राष्ट्रपति ने उस सदन को उस विधेयक पर विचार करने की संस्तुति न कर दी हो। 3. लोकसभा और राज्यसभा के बीच विधाई गतिरोध को समाप्त करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 108 के तहत संयुक्त बैठक (Joint Sitting) का प्रावधान धन विधेयकों और संविधान संशोधन विधेयकों के अतिरिक्त 'वित्तीय विधेयक (श्रेणी-I)' के मामलों में लागू होता है, किंतु 'वित्तीय विधेयक (श्रेणी-II)' के मामलों में संयुक्त बैठक बुलाई जा सकती है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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