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Indian Polity
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भारतीय संविधान के अंतर्गत उच्च न्यायालयों (High Courts) की अधिकारिता, अभिलेख न्यायालय के रूप में उनकी स्थिति तथा अधीनस्थ न्यायालयों (Subordinate Courts) पर नियंत्रण के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 215 के अनुसार प्रत्येक उच्च न्यायालय एक अभिलेख न्यायालय होगा और उसे अपने अवमान (Contempt) के लिए दंड देने की शक्ति सहित ऐसे न्यायालय की सभी शक्तियाँ प्राप्त होंगी, तथा उच्च न्यायालय के निर्णय और आदेश राज्य के भीतर स्थित केवल जिला न्यायालयों के लिए ही अभिलेखीय मूल्य (Precedential value) रखते हैं, उच्चतम न्यायालय की भाँति वे अधीनस्थ न्यायाधिकरणों पर बाध्यकारी नहीं होते।
- 2. संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत प्रत्येक उच्च न्यायालय को अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर सभी न्यायालयों और न्यायाधिकरणों (Tribunals) पर अधीक्षण (Superintendence) की व्यापक शक्ति प्राप्त होती है, और यह अधीक्षण शक्ति केवल प्रशासनिक नियंत्रण तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें न्यायिक अधीक्षण (Judicial Superintendence) का अधिकार भी शामिल है।
- 3. संविधान के अनुच्छेद 233 के अंतर्गत राज्य में जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पोस्टिंग और पदोन्नति राज्यपाल द्वारा संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय से परामर्श करने के पश्चात की जाती है, तथा जिला न्यायाधीश के रूप में नियुक्त होने वाले व्यक्ति के लिए यह संवैधानिक रूप से अनिवार्य है कि वह कम से कम सात वर्ष का अधिवक्ता या प्लीडर रहा हो और वह पहले से संघ या राज्य की न्यायिक सेवा में सेवारत न हो।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 असत्य है क्योंकि अनुच्छेद 215 के तहत उच्च न्यायालय एक अभिलेख न्यायालय है और उसके निर्णय उसके अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले सभी अधीनस्थ न्यायालयों और न्यायाधिकरणों (Tribunals) के लिए बाध्यकारी होते हैं, न कि केवल जिला न्यायालयों के लिए। कथन 2 सत्य है क्योंकि अनुच्छेद 227 उच्च न्यायालय को अपने प्रादेशिक क्षेत्राधिकार के सभी न्यायालयों और न्यायाधिकरणों पर व्यापक अधीक्षण की शक्ति देता है, जिसमें प्रशासनिक और न्यायिक दोनों प्रकार का अधीक्षण शामिल है। कथन 3 सत्य है क्योंकि अनुच्छेद 233 के प्रावधानों के अनुसार जिला न्यायाधीश की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा उच्च न्यायालय के परामर्श से होती है तथा इसके लिए न्यूनतम सात वर्ष का वकालत का अनुभव आवश्यक है और वह पहले से सरकारी सेवा में नहीं होना चाहिए। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पढ़ें।
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भारत के उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद के संवैधानिक प्रावधानों, शक्तियों और उनकी कार्यप्रणाली के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 63 के अनुसार भारत का एक उपराष्ट्रपति होगा, जो राज्य सभा का पदेन सभापति होता है, और जब वह राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है या उसके कृत्यों का निर्वहन करता है, तब उसे राज्य सभा के सभापति के रूप में मिलने वाले वेतन और भत्ते प्राप्त नहीं होते बल्कि उसे राष्ट्रपति के वेतन और भत्ते प्राप्त होते हैं।
2. अनुच्छेद 75(1) के अंतर्गत प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री की सलाह पर की जाती है, किंतु मंत्रिपरिषद में कुल मंत्रियों की संख्या (प्रधानमंत्री सहित) लोकसभा के सदस्यों की कुल संख्या के 15 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती, और यह प्रावधान मूल संविधान में ही निहित था जिसे बाद में संशोधित किया गया।
3. सामूहिक उत्तरदायित्व के सिद्धांत के तहत अनुच्छेद 75(3) में यह स्पष्ट किया गया है कि मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है, जिसका अर्थ यह है कि यदि लोकसभा द्वारा मंत्रिपरिषद के विरुद्ध कोई अविश्वास प्रस्ताव पारित कर दिया जाता है, तो केवल संबंधित विभाग के मंत्री को ही त्यागपत्र देना पड़ता है, पूरी मंत्रिपरिषद को नहीं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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लोक लेखा समिति में कितने सदस्य होते हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत नागरिकता के प्रावधानों (अनुच्छेद 5-11) और संसद की विधाई शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 11 के अंतर्गत संसद को नागरिकता के अर्जन और समाप्ति तथा नागरिकता से संबंधित अन्य सभी विषयों के संबंध में उपबंध करने की संपूर्ण शक्ति प्रदान की गई है, और इस शक्ति का प्रयोग करते हुए संसद ने नागरिकता अधिनियम, 1957 (Citizenship Act, 1957) को अधिनियमित किया था।
2. संविधान के प्रारंभ में (26 जनवरी 1950 को) अनुच्छेद 6 के प्रावधानों के तहत पाकिस्तान से भारत प्र्रव्रजन करने वाले व्यक्तियों के लिए नागरिकता के अर्जन की व्यवस्था की गई थी, जिसके अनुसार यदि वह व्यक्ति या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी में से कोई भी भारत शासन अधिनियम, 1935 में परिभाषित भारत में पैदा हुआ था, तो वह भारत का नागरिक बन सकता था, बशर्ते उसने 19 जुलाई 1948 से पहले प्र्रव्रजन किया हो और वह अपने प्र्रव्रजन की तिथि से सामान्यतः भारत में निवासी रहा हो।
3. जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम या अन्य क्षेत्रों के अधिग्रहण के संदर्भ में यह प्रावधान है कि यदि भारत सरकार किसी विदेशी भू-भाग का अर्जन करती है, तो उस भू-भाग के निवासी स्वतः (ipso facto) भारत के नागरिक नहीं बन जाते हैं, बल्कि इसके लिए संसद द्वारा नागरिकता अधिनियम, 1955 के अंतर्गत विशेष नियम बनाए जाने अनिवार्य होते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राजभाषा के प्रावधानों, राजनीतिक दलों की मान्यता और संविधान की अनुसूचियों व भागों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के भाग XVII के अनुच्छेद 343 से 351 तक संघ की राजभाषा का उपबंध किया गया है, जिसके तहत अनुच्छेद 343(1) यह स्पष्ट करता है कि संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी, तथा इसके साथ ही संसद को यह अधिकार दिया गया है कि वह विधि द्वारा 15 वर्ष की अवधि (वर्ष 1965) के पश्चात भी शासकीय कार्यों के लिए अंग्रेजी भाषा के निरंतर प्रयोग को अधिकृत कर सकती है।
2. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (Representation of the People Act, 1951) के प्रावधानों और निर्वाचन आयोग के नियमों के तहत किसी राजनीतिक दल को 'राष्ट्रीय दल' (National Party) के रूप में मान्यता प्राप्त करने के लिए यह अनिवार्य है कि वह कम से कम चार राज्यों में लोकसभा या विधानसभा चुनावों में कुल वैध मतों का कम से कम 6 प्रतिशत मत प्राप्त करे और इसके साथ ही लोकसभा में कम से कम चार सीटें जीते।
3. भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में मूल रूप से 14 भाषाएँ थीं, जिन्हें समय-समय पर संशोधनों द्वारा बढ़ाया गया; जैसे- 21वें संशोधन द्वारा सिंधी को, 71वें संशोधन द्वारा कोंकणी, मणिपुरी और नेपाली को, तथा 92वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 द्वारा बोडो, डोगरी, मैथिली और संथाली भाषाओं को शामिल किया गया, जिससे वर्तमान में इस अनुसूची में कुल 22 भाषाएँ दर्ज हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारत के निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) की स्वतंत्रता, संरचना और चुनाव सुधारों से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति संसद द्वारा बनाए गए विधि के अधीन राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, और मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उसके पद से हटाने की प्रक्रिया तथा आधार वही होते हैं जो सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के होते हैं, जबकि अन्य निर्वाचन आयुक्तों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की लिखित अनुशंसा के बिना किसी भी परिस्थिति में पद से नहीं हटाया जा सकता है।
2. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29A के तहत भारत निर्वाचन आयोग द्वारा राजनीतिक दलों का पंजीकरण किया जाता है, किंतु वर्ष 1998 में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के उपरांत निर्वाचन आयोग को यह वैधानिक अधिकार प्राप्त हो गया है कि वह किसी पंजीकृत राजनीतिक दल द्वारा आंतरिक लोकतंत्र के हनन या संविधान के प्रति निष्ठा के अभाव पर उसका पंजीकरण रद्द (De-register) कर सकता है।
3. भारत में electoral funding (चुناवी वित्तपोषण) में पारदर्शिता लाने और चुनावी सुधारों के क्रम में, सुप्रीम कोर्ट द्वारा 'एस.डी. एसोसिएशन बनाम भारत संघ (2024)' के ऐतिहासिक निर्णय में 'चुनावी बॉन्ड योजना' (Electoral Bonds Scheme) को असंवैधानिक घोषित कर दिया गया, क्योंकि यह नागरिकों के सूचना के अधिकार (अनुच्छेद 19(1)(a)) का उल्लंघन करती थी।
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