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Indian Polity
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भारतीय संसद के गठन, लोकसभा और राज्यसभा की संरचना तथा विधाई प्रक्रिया के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 81 के अनुसार लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या 552 हो सकती है, जिसमें से राज्यों के क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों से निर्वाचित होने वाले सदस्यों की संख्या 530 से अधिक नहीं होगी और संघ राज्य क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले सदस्यों की संख्या 20 से अधिक नहीं हो सकती, तथा 104वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2019 द्वारा आंग्ल-भारतीय (Anglo-Indian) समुदाय के सदस्यों के लिए आरक्षित सीटों को समाप्त कर दिया गया है।
- 2. राज्यसभा एक स्थायी सदन है जो कभी विघटित नहीं होता, और इसके एक-तिहाई सदस्य प्रत्येक दो वर्ष की समाप्ति पर सेवानिवृत्त होते हैं, जिसके लिए संविधान के अनुच्छेद 80 में यह उपबंध है कि राज्यसभा में संघ राज्य क्षेत्रों के प्रतिनिधियों का चयन अप्रत्यक्ष निर्वाचन पद्धति द्वारा उस रीति से किया जाएगा जिसे संसद विधि द्वारा विहित करे, जैसा कि वर्तमान में दिल्ली और पुडुचेरी के अलावा जम्मू-कश्मीर संघ राज्य क्षेत्र को भी यह प्रतिनिधित्व प्राप्त है।
- 3. अनुच्छेद 109 के तहत धन विधेयक (Money Bill) केवल लोकसभा में ही पुनः स्थापित किया जा सकता है और राज्यसभा इस विधेयक को अस्वीकार या संशोधित नहीं कर सकती है, तथा यदि राज्यसभा चौदह दिन के भीतर विधेयक को लोकसभा को नहीं लौटाती है, तो उस अवधि की समाप्ति पर वह दोनों सदनों द्वारा उस रूप में पारित किया हुआ समझा जाएगा जिस रूप में वह लोकसभा द्वारा पारित किया गया था, भले ही राज्यसभा ने उस पर कोई विचार न किया हो।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: अनुच्छेद 81 के अंतर्गत लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या 552 निर्धारित की गई है (राज्यों से अधिकतम 530 और संघ राज्य क्षेत्रों से अधिकतम 20)। साथ ही, 104वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2019 के माध्यम से लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में आंग्ल-भारतीय समुदाय के दो मनोनीत सदस्यों के प्रावधान को समाप्त कर दिया गया है। कथन 2 सही है: राज्यसभा एक स्थायी निकाय है (अनुच्छेद 83)। अनुच्छेद 80(4) और (5) के तहत संघ राज्य क्षेत्रों के प्रतिनिधियों को चुनने की विधि संसद द्वारा तय की जाती है, और वर्तमान में पुडुचेरी, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के साथ-साथ जम्मू-कश्मीर संघ राज्य क्षेत्र से भी राज्यसभा में सदस्य निर्वाचित होकर आते हैं। कथन 3 सही है: धन विधेयक (Money Bill) केवल लोकसभा में पेश किया जाता है (अनुच्छेद 109)। राज्यसभा के पास इसकी सीमित शक्तियाँ हैं; वह न तो इसे अस्वीकार कर सकती है और न ही इसमें संशोधन कर सकती है, बल्कि केवल सिफारिशें दे सकती है जिन्हें मानना लोकसभा के लिए बाध्यकारी नहीं है। यदि राज्यसभा 14 दिनों के भीतर विधेयक नहीं लौटाती है, तो उसे दोनों सदनों द्वारा पारित मान लिया जाता है। अधिक विस्तृत अध्ययन के लिए आप भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल पर विजिट कर सकते हैं।
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राजभाषा के संवैधानिक उपबंधों, राजनीतिक दलों की मान्यता से जुड़े प्रावधानों तथा संविधान की अनुसूचियों और भागों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के भाग XVII के अंतर्गत अनुच्छेद 348 में यह प्रावधान किया गया है कि जब तक संसद विधि द्वारा अन्यथा उपबंध न करे, तब तक उच्चतम न्यायालय और प्रत्येक उच्च न्यायालय में सभी कार्रवाइयां अंग्रेजी भाषा में होंगी, तथा संसद या राज्य विधानमंडल द्वारा पारित प्रत्येक अधिनियम या उसके द्वारा निकाले गए अध्यादेश का प्राधिकृत पाठ भी अंग्रेजी भाषा में ही होना अनिवार्य है।
2. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29A के तहत भारत निर्वाचन आयोग द्वारा राजनीतिक दलों का पंजीकरण किया जाता है, किंतु आयोग को किसी पंजीकृत राजनीतिक दल को उसकी आंतरिक लोकतांत्रिक विफलता या संविधान के प्रति निष्ठा के अभाव के आधार पर उसका पंजीकरण रद्द (De-register) करने की कोई वैधानिक शक्ति प्राप्त नहीं है।
3. भारतीय संविधान की नौवीं अनुसूची को प्रथम संविधान संशोधन अधिनियम, 1951 द्वारा जोड़ा गया था, और इस अनुसूची में शामिल विधियों को न्यायिक समीक्षा से पूर्ण और अंतिम संरक्षण प्राप्त है, जिसका अर्थ यह है कि वर्ष 1973 के केशवानंद भारती वाद के निर्णय के पश्चात भी इस अनुसूची के किसी भी विषय की न्यायिक समीक्षा किसी भी परिस्थिति में नहीं की जा सकती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्य की कार्यपालिका, विशेष रूप से राज्यपाल की क्षमादान शक्तियों, अध्यादेश निर्माण अधिकार तथा मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद के दायित्वों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 161 के अनुसार राज्यपाल को उस विषय पर, जिससे संबंधित राज्य की कार्यकारी शक्ति का विस्तार होता है, किसी अपराध के लिए दोषी ठहराए गए किसी व्यक्ति के दंड को क्षमा करने, उसका प्रविलंबन, विराम या परिहार करने की शक्ति प्राप्त है, किंतु राज्यपाल किसी भी स्थिति में मृत्युदंड (Death Sentence) को पूरी तरह से क्षमा (Pardon) नहीं कर सकता है, भले ही वह मामला राज्य सूची के किसी कानून के उल्लंघन से ही संबंधित क्यों न हो, क्योंकि मृत्युदंड के मामले में क्षमादान की अनन्य शक्ति केवल भारत के राष्ट्रपति के पास होती है।
2. संविधान के अनुच्छेद 213 के तहत राज्यपाल द्वारा प्रख्यापित अध्यादेश को राज्य विधानमंडल के पुनरुद्धार होने पर छह सप्ताह के भीतर विधानमंडल द्वारा अनुमोदित होना अनिवार्य है, और यदि विधानमंडल के दोनों सदन (जहाँ द्विसदनीय व्यवस्था है) अलग-अलग तिथियों पर पुनः समवेत होते हैं, तो छह सप्ताह की यह अवधि उस तिथि से गिनी जाएगी जिस तिथि को बाद वाला सदन अपनी बैठक प्रारंभ करता है।
3. संविधान के अनुच्छेद 167 के अंतर्गत मुख्यमंत्री का यह संवैधानिक कर्तव्य है कि वह राज्य के प्रशासन से संबंधित मंत्रिपरिषद के सभी विनिश्चय राज्यपाल को संसूचित करे तथा राज्यपाल द्वारा माँगी गई राज्य के प्रशासन और विधान से संबंधित सभी जानकारी प्रदान करे, किंतु राज्यपाल अपनी इच्छा से मंत्रिपरिषद के किसी भी निर्णय को पुनर्विचार के लिए सीधे वापस नहीं भेज सकता जब तक कि मुख्यमंत्री स्वयं ऐसा अनुरोध न करे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत केंद्र-राज्य विधायी और प्रशासनिक संबंधों तथा अंतर-राज्यीय परिषद् (Inter-State Council) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 263 के अंतर्गत राष्ट्रपति को यह शक्ति प्रदान की गई है कि यदि किसी समय लोकहित में यह प्रतीत होता है कि एक ऐसी परिषद् की स्थापना की जानी चाहिए जो राज्यों के बीच उत्पन्न होने वाले विवादों की जाँच और सलाह दे तथा राज्यों और संघ के सामान्य हित के विषयों पर चर्चा करे, तो राष्ट्रपति ऐसी परिषद् की स्थापना कर सकता है।
2. अंतर-राज्यीय परिषद् एक स्थायी संवैधानिक निकाय (Permanent Constitutional Body) है जिसका उल्लेख मूल संविधान में स्पष्ट रूप से किया गया था, और इसकी स्थापना वर्ष 1950 में संविधान लागू होने के तुरंत बाद कर दी गई थी।
3. सरकारी आयोग (Sarkaria Commission) की संस्तुति के आधार पर वर्ष 1990 में राष्ट्रपति के आदेश द्वारा 'अंतर-राज्यीय परिषद्' का पहली बार औपचारिक रूप से गठन किया गया था, जिसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री द्वारा की जाती है और इसके सदस्यों में सभी राज्यों के मुख्यमंत्री तथा संघ राज्य क्षेत्रों के प्रशासक या मुख्यमंत्री शामिल होते हैं।
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