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History of India
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प्राचीन भारतीय इतिहास में बौद्ध धर्म के महायान संप्रदाय और जैन धर्म के श्वेतांबर संप्रदाय के दार्शनिक तथा व्यावहारिक विकास के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. महायान बौद्ध धर्म के अंतर्गत बोधिसत्वों की संकल्पना को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई, जिसके अनुसार बोधिसत्व अपनी व्यक्तिगत मुक्ति (निर्वाण) से पूर्व संपूर्ण sentient beings (प्राणियों) के उद्धार और कल्याण के मार्ग पर कार्य करते हैं।
  2. 2. जैन धर्म के श्वेतांबर संप्रदाय के अनुयायी स्थूलभद्र के नेतृत्व में उत्तर भारत में रहे और उन्होंने जैन ग्रंथों के संकलन हेतु पाटलिपुत्र में आयोजित प्रथम जैन संगीति में सक्रिय रूप से भाग लिया, जबकि दिगंबर संप्रदाय के विपरीत इन्होंने मोक्ष प्राप्ति के लिए पूर्ण रूप से वस्त्र त्यागने (नग्न रहने) को अनिवार्य नहीं माना।
  3. 3. महायान संप्रदाय की तर्ज पर जैन धर्म में भी मूर्तिकला और भक्ति मार्ग का अत्यधिक विकास हुआ, जिसके परिणामस्वरूप श्वेतांबर और दिगंबर दोनों ही संप्रदायों ने महात्मा बुद्ध की भांति महावीर स्वामी की विशाल मूर्तियों का निर्माण करवाकर उनकी पूजा प्रारंभ की, जिसे बौद्ध धर्म के प्रभाव का प्रत्यक्ष परिणाम माना जाता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है क्योंकि महायान बौद्ध धर्म में बोधिसत्व की अवधारणा केंद्रीय है, जहाँ बोधिसत्व बुद्धत्व प्राप्त करने के मार्ग पर होते हैं किंतु अन्य जीवों के उद्धार के लिए अपनी मुक्ति को स्थगित रखते हैं। कथन 2 सही है क्योंकि स्थूलभद्र के नेतृत्व वाले श्वेतांबर संप्रदाय ने उत्तर भारत में श्वेत वस्त्र धारण करने की परंपरा को जारी रखा और पाटलिपुत्र की प्रथम जैन संगीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कथन 3 गलत है क्योंकि जैन धर्म में तीर्थंकरों की मूर्तिकला का विकास बहुत पहले से प्रारंभ हो चुका था और जैन धर्म में मूर्तिपूजा का आधार महायान बौद्ध धर्म का प्रत्यक्ष अनुकरण न होकर उनकी अपनी स्वतंत्र तार्किक एवं दार्शनिक परंपराओं पर आधारित था, हालाँकि दोनों धर्मों में आगे चलकर भक्ति परंपरा का विस्तार अवश्य हुआ। अधिक जानकारी के लिए विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
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