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History of India
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भक्ति और सूफी आंदोलन के दार्शनिक स्वरूप तथा उनके प्रमुख संतों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. रामानुजचार्य द्वारा प्रतिपादित 'विशिष्टाद्वैतवाद' के अनुसार ब्रह्म (ईश्वर) ही एकमात्र सत्य है, किंतु जगत और जीवात्मा उससे पूरी तरह स्वतंत्र और असत्य नहीं हैं, बल्कि वे ब्रह्म के ही अंग हैं और मोक्ष की प्राप्ति केवल 'प्रपत्ति' (पूर्ण आत्मसमर्पण) तथा भक्ति मार्ग से संभव है।
- 2. भारत में चिश्ती सूफी सिलसिले की स्थापना ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती ने की थी, और इस सिलसिले के संतों ने राज्य की राजनीतिक सत्ता, शाही दरबारों और धन-दौलत से कठोर दूरी बनाए रखने के साथ-साथ संगीत और नृत्य आधारित 'समां' को ईश्वर-आराधना का प्रमुख माध्यम माना।
- 3. शंकराचार्य के 'अद्वैत वेदांत' के खंडन में मध्वाचार्य ने 'शुद्धद्वैतवाद' (Pure Non-Dualism) के सिद्धांत का प्रतिपादन किया, जिसके अनुसार ईश्वर और जीव में कोई भेद नहीं है और जगत पूरी तरह वास्तविक है।
- 4. कबीर, रैदास और नानक जैसे निर्गुण संतों ने मूर्तिपूजा, बाह्य कर्मकांडों, जाति व्यवस्था और संप्रदायवाद का कड़ा विरोध करते हुए एक निराकार, सर्वव्यापी और अनाम ईश्वर की उपासना पर बल दिया, तथा उन्होंने अपने उपदेशों के प्रसार के लिए क्षेत्रीय भाषाओं (लोकभाषाओं) का प्रयोग किया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
भक्ति और सूफी आंदोलन भारतीय सांस्कृतिक और धार्मिक इतिहास के महत्वपूर्ण चरण हैं। कथन 1 सही है क्योंकि रामानुजचार्य ने 'विशिष्टाद्वैतवाद' का प्रतिपादन किया, जिसके अनुसार जीवात्मा और जगत ब्रह्म के ही अंश हैं और प्रपत्ति (भक्ति) द्वारा मोक्ष मिलता है। कथन 2 सही है क्योंकि ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती ने भारत में चिश्ती सिलसिले की नींव रखी और इन संतों ने राज दरबार से दूरी रखते हुए 'समां' को अपनाया। कथन 3 गलत है क्योंकि मध्वाचार्य ने 'द्वैतवाद' (Dualism) का प्रतिपादन किया था, जबकि 'शुद्धद्वैतवाद' के प्रणेता वल्लभाचार्य थे। कथन 4 सही है क्योंकि निर्गुण संतों ने मूर्तिपूजा और जाति व्यवस्था का विरोध कर लोकभाषाओं (जैसे सधुक्कड़ी) में उपदेश दिए। इस विषय की विस्तृत जानकारी के लिए आप विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
Related Questions
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वर्ष 1857 के महान विद्रोह की प्रकृति और उसके वैचारिक स्वरूप के संदर्भ में विभिन्न ब्रिटिश और भारतीय इतिहासकारों के प्रसिद्ध मतों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. सर जॉन सीले (Sir John Seeley) ने वर्ष 1857 के विद्रोह को 'पूरी तरह से देशभक्तिहीन और स्वार्थी सिपाही विद्रोह' करार दिया था, जिसका समर्थन करते हुए सर जेम्स आउट्राम ने इसे मुस्लिम षड्यंत्र का परिणाम बताया जिसमें हिन्दू पिछलग्गू की भूमिका में थे।
2. बेंजामिन डिजरायली (Benjamin Disraeli) ने ब्रिटिश संसद में इस घटना को केवल एक साधारण सिपाही विद्रोह न मानकर इसे सुनियोजित 'राष्ट्रीय विद्रोह' (National Revolt) की संज्ञा दी थी।
3. वी.डी. सावरकर (V.D. Savarkar) ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस 1857' में इस घटना को सुनियोजित राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम के रूप में चित्रित किया, जबकि अशोक मेहता ने अपनी पुस्तक '1857: महान विद्रोह' में इसे विशुद्ध रूप से एक राष्ट्रीय विद्रोह माना।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
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भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के संदर्भ में 'ग़दर पार्टी' और उसके कार्यक्रमों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. ग़दर पार्टी की स्थापना वर्ष 1913 में अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को शहर में लाला हरदयाल, सोहन सिंह भकना और कांशीराम जैसे क्रूर क्रांतिकारियों के प्रयासों से हुई थी, जिसका मुख्य उद्देश्य सशस्त्र क्रांति के माध्यम से भारत से ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकना था।
2. इस पार्टी द्वारा 'ग़दर' नामक साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन मुख्य रूप से उर्दू और गुरुमुखी लिपि में किया जाता था, जिसके प्रत्येक अंक के पहले पृष्ठ पर 'अंग्रेज़ी राज का कच्चा चिट्ठा' शीर्षक से ब्रिटिश नीतियों की आलोचना छपती थी।
3. प्रथम विश्व युद्ध के आरंभ होने पर ग़दर पार्टी के नेताओं ने जर्मनी और बर्लिन में सक्रिय भारतीय क्रांतिकारियों (जैसे वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय) के साथ मिलकर 'बर्लिन समिति' की सहायता से ब्रिटिश सेना में कार्यरत भारतीय सैनिकों को बगावत के लिए प्रेरित करने की एक व्यापक योजना बनाई थी।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
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मुगल चित्रकला में "छवि चित्र" (Portraits) और "प्राकृतिक दृश्यों" की शुरुआत किसके काल में हुई?
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वर्धन राजवंश एवं दक्षिण भारत के राजवंशों (चोल, पल्लव, चालुक्य) की प्रशासनिक और सांस्कृतिक प्रणालियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. पल्लव शासक महेंद्रवर्मन प्रथम ने अपने शासनकाल में 'मत्तविलासं प्रहसन' नामक प्रसिद्ध नाटक की रचना की, और पाशुपत शैव धर्म अपनाने से पूर्व वे जैन धर्म के अनुयायी थे।
2. बादामी के चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय की 'ऐहोल प्रशस्ति' के अनुसार, उसने नर्मदा नदी के तट पर हर्षवर्धन को पराजित किया था, तथा इस प्रशस्ति की भाषा प्राकृत और लिपि खरोष्ठी है।
3. चोल प्रशासन के दौरान ग्रामीण स्वशासन के अंतर्गत 'वरियम' (समितियों) के सदस्यों के चयन के लिए 'कुडवोलाई' (Kudavolai) नामक पर्ची-डालकर चुनाव पद्धति का विस्तृत वर्णन उत्तरमेरूर शिलालेखों में मिलता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
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वर्ष 1857 के महान विद्रोह की असफलता के पीछे निहित संरचनात्मक और नेतृत्व संबंधी कमियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. विद्रोहियों के पास ब्रिटिश साम्राज्य की विशाल सैन्य क्षमता और संगठित प्रशासनिक तंत्र के विकल्प के रूप में कोई सुसंगत राजनीतिक दृष्टिकोण, एक केंद्रीय एकीकृत कमान और भविष्य के भारतीय प्रशासनिक स्वरूप की स्पष्ट रूपरेखा का पूर्ण अभाव था।
2. देश के विभिन्न हिस्सों में नेतृत्व संभाल रहे प्रमुख क्षेत्रीय नेताओं (जैसे नाना साहब, बेगम हजरत महल और कुंवर सिंह) ने अखिल भारतीय स्तर पर एक मजबूत राष्ट्रीय दृष्टिकोण अपनाने के बजाय मुख्य रूप से अपने स्थानीय हितों, खोई हुई रियासतों और पारंपरिक विशेषाधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष किया।
3. शिक्षित मध्यम वर्ग, आधुनिक बुद्धिजीवियों और अधिकांश भारतीय रियाسतों के शासकों ने इस विद्रोह का खुलकर समर्थन किया था, जिसके कारण ब्रिटिश सेना को भारी जनविरोध का सामना करना पड़ा और अंग्रेजों को सामरिक रूप से पीछे हटना पड़ा था।
4. विद्रोहियों के पास न तो पर्याप्त वित्तीय संसाधन थे और न ही आधुनिक संचार और रसद (Logistics) की कोई कुशल प्रणाली, जिससे देश के विभिन्न केंद्रों के बीच किसी प्रकार का प्रभावी सैन्य समन्वय स्थापित नहीं हो सका।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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