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अम्ल-क्षार सिद्धांतों (Acid-Base Theories) और लवणों के जल-अपघटन (Salt Hydrolysis) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. ब्रॉन्स्टेड-लॉरी संकल्पना (Bronsted-Lowry concept) के अनुसार, एक अम्ल वह स्पीशीज है जो प्रोटॉन ($H^+$) दान करती है और उसका संयुग्मी क्षार (Conjugate base) उस अम्ल की तुलना में हमेशा एक प्रबल क्षार होता है।
- 2. 'लुईस अम्ल' (Lewis acid) वे रासायनिक स्पीशीज (अणु या आयन) हैं जो इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण कर सकते हैं, जैसे कि $BF_3$, $AlCl_3$ और संक्रमण धातुओं के धनायन ($Fe^{3+}, Co^{2+}$ आदि)।
- 3. जब दुर्बल अम्ल और प्रबल क्षार से बने लवण (जैसे सोडियम एसीटेट, $CH_3COONa$) का जल-अपघटन किया जाता है, तो विलयन की प्रकृति क्षारीय हो जाती है क्योंकि एसीटेट आयन जल के साथ अभिक्रिया करके हाइड्रॉक्साइड आयन ($OH^-$) उत्पन्न करता है।
उपर्युक्त में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 गलत है क्योंकि ब्रॉन्स्टेड-लॉरी सिद्धांत के अनुसार, यदि कोई अम्ल प्रबल है, तो उसका संयुग्मी क्षार दुर्बल होता है और इसके विपरीत, दुर्बल अम्ल का संयुग्मी क्षार प्रबल होता है। कथन 2 सही है क्योंकि लुईस संकल्पना के अनुसार इलेक्ट्रॉन युग्म ग्रहण करने वाले अभिकर्मक लुईस अम्ल कहलाते हैं, और $BF_3$, $AlCl_3$ जैसे यौगिकों में अष्टक अधूरा होने के कारण ये लुईस अम्ल की तरह कार्य करते हैं। कथन 3 सही है क्योंकि दुर्बल अम्ल ($CH_3COOH$) और प्रबल क्षार ($NaOH$) के लवण का जल-अपघटन होने पर परिणामी विलयन क्षारीय हो जाता है। इस विषय की विस्तृत जानकारी के लिए आप विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
Related Questions
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विद्युत परिपथों और चालकों के प्रतिरोध के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. किसी चालक का विद्युत प्रतिरोध उसके पदार्थ की प्रकृति, उसकी लंबाई के सीधे आनुपातिक और उसके अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल के व्युत्क्रमानुपाती होता है, जबकि विशिष्ट प्रतिरोध (प्रतिरोधकता) केवल पदार्थ की प्रकृति और तापमान पर निर्भर करता है।
2. जब कई प्रतिरोधकों को श्रेणीक्रम (Series combination) में जोड़ा जाता है, तो परिपथ का कुल समतुल्य प्रतिरोध प्रत्येक व्यक्तिगत प्रतिरोध के योग से कम होता है, और सभी प्रतिरोधकों से प्रवाहित होने वाली विद्युत धारा का मान भिन्न-भिन्न होता है।
3. अतिचालकता (Superconductivity) की स्थिति में, कुछ विशेष पदार्थों का प्रतिरोध अति-निम्न तापमान (क्रांतिक तापमान) पर घटकर शून्य हो जाता है, जिससे वे बिना किसी ऊर्जा ह्रास के विद्युत धारा प्रवाहित करने लगते हैं।
4. किर्चॉफ का प्रथम नियम (धारा नियम या KCL) आवेश संरक्षण के नियम पर आधारित है, जिसके अनुसार किसी संधि पर मिलने वाली समस्त विद्युत धाराओं का बीजगणितीय योग शून्य होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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परमाणु भौतिकी और नाभिकीय अभिक्रियाओं के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. किसी रेडियोएक्टिव नाभिक के क्षय नियतांक (Decay constant, $\lambda$) और उसकी अर्ध-आयु ($T_{1/2}$) के बीच का संबंध $T_{1/2} = \frac{\ln 2}{\lambda}$ द्वारा व्यक्त किया जाता है, जिसका अर्थ है कि क्षय नियतांक जितना अधिक होगा, नाभिक की अर्ध-आयु उतनी ही कम होगी।
2. नाभिकीय विखंडन (Nuclear Fission) के दौरान 'द्रव्यमान क्षति' (Mass defect) ही ऊर्जा में रूपांतरित होती है, जिसे आइंस्टीन के समीकरण $E = \mc^2$ द्वारा समझाया जाता है, और यूरेनियम-235 के एक विखंडन से औसतन लगभग 200 MeV ऊर्जा मुक्त होती है।
3. नियंत्रित नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) प्रतिक्रियाओं को पृथ्वी पर संचालित करने के लिए 'टोकामक' (Tokamak) जैसी युक्तियों में अत्यधिक उच्च तापमान और चुंबकीय परिरक्षण (Magnetic confinement) का उपयोग किया जाता है, क्योंकि संलयन के लिए आवश्यक कूलामी प्रतिकर्षक बल को पार करने हेतु उच्च गतिज ऊर्जा की आवश्यकता होती है।
4. बीटा-क्षय (Beta decay) के दौरान उत्सर्जित होने वाले 'न्यूट्रिनो' और 'एंटी-न्यूट्रिनो' कणों का द्रव्यमान शून्य और आवेश इकाई धनात्मक होता है, जो दुर्बल नाभिकीय बल (Weak nuclear force) के अंतर्गत ऊर्जा और कोणीय संवेग के संरक्षण को सुनिश्चित करते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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आवर्त सारणी और तत्वों के रासायनिक गुणों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. किसी परमाणु की इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी (Electron Gain Enthalpy) का ऋणात्मक मान हमेशा ऊष्मक्षेपी (Exothermic) प्रक्रिया को दर्शाता है, किंतु आवर्त सारणी के द्वितीय आवर्त के तत्वों (जैसे ऑक्सीजन और फ्लोरीन) की इलेक्ट्रॉन लब्धि एन्थैल्पी का ऋणात्मक मान उनके ठीक नीचे तृतीय आवर्त के तत्वों (जैसे सल्फर और क्लोरीन) की तुलना में कम होता है, जिसका मुख्य कारण उनके छोटे आकार के कारण होने वाला अंतःइलेक्ट्रॉनिक प्रतिकर्षक बल है।
2. आवर्त सारणी में किसी आवर्त में बाएं से दाएं जाने पर ऑक्साइडों की अम्लीय प्रकृति बढ़ती है और क्षारीय प्रकृति घटती है, उदाहरण के लिए सोडियम ऑक्साइड ($Na_2O$) अत्यधिक क्षारीय है, एल्युमिनियम ऑक्साइड ($Al_2O_3$) उभयधर्मी (Amphoteric) है, और क्लोरीन का ऑक्साइड ($Cl_2O_7$) प्रबल अम्लीय प्रकृति का होता है।
3. संक्रमण तत्वों (d-ब्लॉक) के संबंध में, लैंथेनाइड आकुंचन के कारण पाँचवें और छठे आवर्त के संक्रमण तत्वों (जैसे ज़िरकोनियम और हाफ्नियम) की आयनिक और परमाणु त्रिज्याएँ लगभग समान हो जाती हैं, जिससे उनके रासायनिक गुणों में अत्यधिक भिन्नता उत्पन्न हो जाती है और उन्हें एक-दूसरे से पृथक् करना बहुत आसान हो जाता है।
4. किसी तत्व की 'विद्युत ऋणात्मकता' (Electronegativity) एक आवर्ती गुण है जो बंधित इलेक्ट्रॉनों को अपनी ओर आकर्षित करने की क्षमता को मापता है, और पौलिंग पैमाने पर सबसे अधिक विद्युत ऋणात्मक तत्व फ्लोरीन है, जबकि सबसे कम विद्युत ऋणात्मकता सीसियम (Cs) की होती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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धातुओं, अधातुओं और उनके यौगिकों के रासायनिक गुणों तथा संरचना के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 'थर्मिट प्रक्रम' (Thermite Process) के दौरान फेरिक ऑक्साइड ($Fe_2O_3$) को एल्युमिनियम चूर्ण के साथ अपचयित किया जाता है, जिसमें एल्युमिनियम एक प्रबल अपचायक के रूप में कार्य करते हुए अत्यधिक ऊष्मा उत्पन्न करता है, और इस ऊष्मा का उपयोग रेल की पटरियों या टूटे हुए मशीनरी भागों को जोड़ने (वेल्डिंग) के लिए किया जाता है।
2. जब सफेद फॉस्फोरस ($P_4$) को सांद्र सोडियम हाइड्रोक्साइड (NaOH) विलयन के साथ अक्रिय वातावरण में गर्म किया जाता है, तो यह असमानुपातन (Disproportionation) अभिक्रिया के माध्यम से फॉस्फीन गैस ($PH_3$) और सोडियम हाइपोफॉस्फाइट ($NaH_2PO_2$) का निर्माण करता है।
3. 'एक्वा रीजिया' (Aqua Regia), जो कि सांद्र हाइड्रोक्लोरिक एसिड ($HCl$) और सांद्र नाइट्रिक एसिड ($HNO_3$) का $3:1$ के आयतन अनुपात में ताजा मिश्रण होता है, सोने और प्लैटिनम जैसी उत्कृष्ट धातुओं को घोलने में सक्षम होता है क्योंकि इसमें उत्पन्न होने वाला 'क्लोरीन मुक्त मूलक' और 'नाइट्रोसिल क्लोराइड' इन धातुओं के साथ क्लोराइड संकुल बनाते हैं।
4. सोडियम कार्बोनेट के निर्माण के लिए प्रयुक्त 'सॉल्वे प्रक्रम' (Solvay Process) में मध्यवर्ती उत्पाद के रूप में अमोनियम कार्बोनेट और अमोनियम बाइकार्बोनेट बनते हैं, तथा इस प्रक्रम की मुख्य विशेषता यह है कि इसमें अमोनिया का पुनर्चक्रण (Recycling) कैल्शियम हाइड्रोक्साइड के साथ अमोनियम क्लोराइड की प्रतिक्रिया द्वारा सफलतापूर्वक किया जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?
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मानव रक्त परिसंचरण तंत्र और रक्त समूहीकरण (Blood Groups) के विशेष संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. बॉम्बे रक्त समूह (Bombay Blood Group) सबसे पहले 1952 में मुंबई में खोजा गया था, और इस फेनोटाइप वाले व्यक्तियों की लाल रक्त कोशिकाओं (RBC) पर 'H' एंटीजन का पूर्ण अभाव होता है, क्योंकि उनके पास 'H' जीन का कार्यात्मक रूप (Fut1) नहीं होता है।
2. 'AB' रक्त समूह को सार्वभौमिक प्राप्तकर्ता (Universal Recipient) इसलिए माना जाता है क्योंकि इनकी प्लाज्मा में एंटी-A और एंटी-B दोनों प्राकृतिक एंटीबॉडी अनुपस्थित होते हैं, जिससे किसी भी अन्य रक्त समूह (A, B, AB, O) का रक्त चढ़ाने पर लाल रक्त कोशिकाओं का संपिंडन (Agglutination) नहीं होता है।
3. रुधिर स्कंदन (Blood Coagulation) की आंतरिक मार्ग (Intrinsic Pathway) की शुरुआत क्षतिग्रस्त ऊतकों द्वारा 'थ्रॉम्बोप्लास्टिन' (ऊतक कारक या फैक्टर III) के मुक्त होने से होती है, जो त्वरित रूप से कैल्शियम आयनों की उपस्थिति में फैक्टर VII को सक्रिय करता है।
4. हीमोग्लोबिन के एक अणु में चार पॉलीपेप्टाइड श्रृंखलाएं (दो अल्फा और दो बीटा) होती हैं, और प्रत्येक श्रृंखला के हीम समूह के केंद्र में स्थित फेरस आयन ($Fe^{2+}$) ऑक्सीजन के एक अणु के साथ reversibly (उत्क्रमणीय रूप से) बंध बनाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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