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History of India
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19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भारतीय सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा स्थापित 'आर्य समाज' ने पाश्चात्य शिक्षा और आधुनिक विज्ञान का पूर्ण बहिष्कार करते हुए केवल प्राचीन वैदिक ज्ञान को ही एकमात्र सत्य माना और वेदों की अचूकता का प्रतिपादन किया।
  2. 2. ज्योतिराव फुले ने वर्ष 1873 में 'सत्यशोधक समाज' की स्थापना की, जिसका मुख्य उद्देश्य शूद्रों और अति-शूद्रों को ब्राह्मणवादी वर्चस्व और धार्मिक पाखंडों से मुक्त कराना तथा समाज के वंचित वर्गों के अधिकारों के लिए संघर्ष करना था।
  3. 3. मद्रास प्रेसीडेंसी में समाज सुधार के कार्यों को आगे बढ़ाते हुए वीरेशलिंगम पंतुलु ने विधवा पुनर्विवाह, स्त्री शिक्षा और बाल विवाह के उन्मूलन के लिए अथक प्रयास किए तथा तेलुगु भाषी क्षेत्र में ब्रह्म समाज के विचारों का प्रचार-प्रसार किया।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 असत्य है क्योंकि स्वामी दयानंद सरस्वती और आर्य समाज ने पाश्चात्य शिक्षा या आधुनिक विज्ञान का पूर्ण बहिष्कार नहीं किया था। यद्यपि वे वेदों को सर्वोपरि मानते थे, फिर भी उन्होंने अंग्रेजी शिक्षा, तकनीकी विकास और विज्ञान के प्रसार का समर्थन किया तथा वैदिक शिक्षा के साथ-साथ आधुनिक वैज्ञानिक शिक्षा प्रदान करने के लिए 'दयानंद Anglo-Vedic' (DAV) विद्यालयों की स्थापना की नींव रखी। कथन 2 सत्य है; ज्योतिराव फुले ने 1873 में सत्यशोधक समाज की स्थापना की थी ताकि दलितों और पिछड़ी जातियों को ब्राह्मणवादी वर्चस्व से मुक्त कराया जा सके। कथन 3 भी सत्य है; वीरेशलिंगम पंतुलु ने दक्षिण भारत (विशेषकर आंध्र प्रदेश) में समाज सुधार के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभाई और विधवा पुनर्विवाह आंदोलन को मजबूत किया। अतः विकल्प (b) सही है।
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