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Indian Polity
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भारतीय संविधान की अनुसूचियों, राजभाषा और राजनीतिक दलों से संबंधित संवैधानिक उपबंधों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान की दसवीं अनुसूची, जिसे 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 द्वारा जोड़ा गया था, राजनीतिक दलों के दलबदल के आधार पर संसद और राज्य विधानमंडलों के सदस्यों की निर्योग्यता के बारे में उपबंध करती है, और इसके अंतर्गत पीठासीन अधिकारी द्वारा लिया गया निर्णय अंतिम होता है तथा उसकी न्यायिक समीक्षा पूर्णतः वर्जित है।
- 2. संविधान के भाग XVII के अनुच्छेद 348 के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय और प्रत्येक उच्च न्यायालय में सभी कार्रवाइयाँ अंग्रेजी भाषा में होंगी, जब तक कि संसद विधि द्वारा अन्यथा उपबंध न करे, तथा किसी राज्य का राज्यपाल राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से उस राज्य के उच्च न्यायालय की कार्यवाही में हिंदी या अन्य राजभाषा के प्रयोग को अधिकृत कर सकता है।
- 3. संविधान की आठवीं अनुसूची में मूल रूप से 14 भाषाएँ थीं, जिन्हें विभिन्न संशोधनों के माध्यम से बढ़ाकर वर्तमान में 22 कर दिया गया है, और इस अनुसूची में कोंकणी, मणिपुरी और नेपाली भाषाओं को 71वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा जोड़ा गया था।
- 4. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के प्रावधानों के तहत किसी राजनीतिक दल को भारत निर्वाचन आयोग द्वारा 'राष्ट्रीय दल' (National Party) के रूप में मान्यता प्राप्त करने के लिए यह अनिवार्य है कि वह कम से कम चार राज्यों में लोकसभा या विधानसभा चुनावों में कुल वैध मतों का कम से कम 6 प्रतिशत मत प्राप्त करे और साथ ही कम से कम चार राज्यों से लोकसभा में कुल 11 सीटें जीते।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 गलत है क्योंकि यद्यपि दसवीं अनुसूची दलबदल के आधार पर अयोग्यता से संबंधित है और सदन के अध्यक्ष/सभापति का निर्णय अंतिम होता है, किंतु 'कीहोतो होलोथन वाद (1992)' में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि पीठासीन अधिकारी का निर्णय न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर नहीं है, बल्कि उस पर न्यायिक समीक्षा लागू होती है। कथन 2 बिल्कुल सही है क्योंकि अनुच्छेद 348 उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय की भाषा से संबंधित है और राज्यपाल राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से उच्च न्यायालय में हिंदी या अन्य राजभाषा का प्रयोग अधिकृत कर सकता है। कथन 3 सही है क्योंकि 71वें संविधान संशोधन, 1992 द्वारा कोंकणी, मणिपुरी और नेपाली को आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया था। कथन 4 गलत है क्योंकि राष्ट्रीय दल बनने के लिए चार राज्यों में 6% वोट के अलावा लोकसभा में कम से कम 2% सीटें (यानी 3 अलग-अलग राज्यों से कुल 11 सीटें) जीतना आवश्यक होता है, न कि सीधे 11 सीटें। अधिक विस्तृत अध्ययन के लिए आप भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पर जा सकते हैं।
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भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 263' के अंतर्गत स्थापित 'अंतर-राज्य परिषद' (Inter-State Council) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अंतर-राज्य परिषद की स्थापना का अधिकार राष्ट्रपति के पास है, और राष्ट्रपति लोक हित में जब भी ऐसा आवश्यक समझे, इस परिषद की स्थापना कर सकता है तथा इसके सदस्यों की अर्हताएँ और चयन प्रक्रिया निर्धारित कर सकता है।
2. यह परिषद एक स्थायी संवैधानिक निकाय (Permanent Constitutional Body) है जिसकी बैठकें नियमित रूप से प्रत्येक वर्ष कम से कम तीन बार आयोजित होना अनिवार्य रूप से संविधान में ही उपबंधित किया गया है।
3. अंतर-राज्य परिषद का मुख्य कार्य राज्यों के बीच उत्पन्न विवादों की जाँच करना और उन पर सलाह देना है, तथा इसके द्वारा दिए गए सभी निर्णय और संस्तुतियाँ संबंधित राज्य सरकारों और केंद्र सरकार पर पूर्णतः बाध्यकारी (Binding) होती हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था के तीन स्तर कौन-कौन से हैं?
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भारतीय संसद की विधाई प्रक्रिया, सदनों की विशेषाधिकारिता और वित्तीय नियंत्रण के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 117(1) के तहत ऐसा कोई भी वित्तीय विधेयक (Financial Bill Category-I), जिसमें अनुच्छेद 110 के उपबंधों के अलावा अन्य मामले भी शामिल हैं, लोकसभा में राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश के बिना पुनः स्थापित नहीं किया जा सकता है, किंतु राज्यसभा इस प्रकार के विधेयक को संशोधित करने या अस्वीकृत करने का पूर्ण अधिकार रखती है।
2. अनुच्छेद 122 के अनुसार संसद की किसी भी कार्यवाही की वैधता को इस आधार पर किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है कि प्रक्रिया का कोई अनियमित पालन हुआ है, तथा संसद का कोई भी सदन या उसका सदस्य अपनी आंतरिक कार्यवाहियों के नियमन के संबंध में किसी न्यायालय के अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत आता है।
3. लोकसभा के विघटन के पश्चात राष्ट्रपति द्वारा बुलाई गई संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक (अनुच्छेद 108) के संदर्भ में यदि कोई साधारण विधेयक लोकसभा में लंबित था और लोकसभा विघटित हो चुकी है, तो ऐसा विधेयक व्यपगत (Lapse) नहीं होता है यदि राष्ट्रपति ने संयुक्त बैठक बुलाने की अपनी मंशा पहले ही अधिसूचित कर दी हो।
4. संसद के किसी सदन में विशेषाधिकार हनन (Breach of Privilege) या सदन की अवमानना से संबंधित किसी मामले में यदि कोई प्रस्ताव पारित किया जाता है, तो सदन को अपने सदस्यों या बाहरी व्यक्तियों को दंडित करने का अधिकार प्राप्त है, किंतु इस प्रकार के दंडात्मक आदेशों की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) उच्चतम न्यायालय द्वारा किसी भी परिस्थिति में नहीं की जा सकती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और राज्य लोक सेवा आयोग (SPSC) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 315 के तहत प्रत्येक राज्य के लिए एक लोक सेवा आयोग का प्रावधान किया गया है, तथा दो या अधिक राज्यों के लिए संयुक्त राज्य लोक सेवा आयोग (JSPSC) का गठन संबंधित राज्यों के अनुरोध पर संसद द्वारा कानून बनाकर किया जाता है, न कि राष्ट्रपति के अध्यादेश द्वारा।
2. संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष या सदस्य को उसके पद से केवल राष्ट्रपति द्वारा उसी रीति और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जिस रीति और आधारों पर उच्चतम न्यायालय के किसी न्यायाधीश को हटाया जाता है, जबकि राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष या सदस्य को हटाने की शक्ति राज्यपाल के पास होती है, भले ही जाँच उच्चतम न्यायालय द्वारा की जाती हो।
3. संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष या अन्य सदस्य अपने पद की अवधि समाप्त होने पर भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी अन्य रोजगार के पात्र नहीं होते हैं, जबकि राज्य लोक सेवा आयोग का अध्यक्ष अपने कार्यकाल की समाप्ति के पश्चात संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष या सदस्य के रूप में अथवा किसी अन्य राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष के रूप में नियुक्ति का पात्र होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत नागरिकता के प्रावधानों (अनुच्छेद 5-11) और नागरिकता अधिनियम, 1955 के संशोधनों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 9 के अनुसार, यदि कोई भारतीय नागरिक स्वेच्छा से किसी विदेशी राज्य की नागरिकता अर्जित कर लेता है, तो उसकी भारतीय नागरिकता स्वतः समाप्त हो जाएगी, और इस संबंध में संसद द्वारा कोई पृथक् कानून बनाने की आवश्यकता नहीं होती है।
2. नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 (CAA) द्वारा पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदायों के प्रवासियों को नागरिकता प्रदान करने के लिए एक विशेष प्रावधान जोड़ा गया है, जिसके तहत उन पर विदेशी अधिनियम, 1946 (Foreigners Act, 1946) और पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) अधिनियम, 1920 के उपबंध लागू नहीं होंगे, बशर्ते उन्होंने 31 दिसंबर 2014 से पहले भारत में प्रवेश किया हो।
3. संविधान के अनुच्छेद 11 के तहत संसद को यह पूर्ण शक्ति प्रदान की गई है कि वह नागरिकता के अर्जन और समाप्ति तथा नागरिकता से संबंधित अन्य सभी विषयों के संबंध में कोई भी उपबंध कर सकेगी, और संसद द्वारा पारित इसी शक्ति का प्रयोग करते हुए नागरिकता अधिनियम, 1955 अधिनियमित किया गया था।
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