लॉरेंस कोहलबर्ग के नैतिक विकास के सिद्धांत के अंतर्गत, 'उत्तर-रूढ़िगत नैतिकता' (Post-conventional Morality) के अंतिम चरण यानी 'विवेक और सार्वभौमिक नीति की अवस्था' (Stage 6: Universal Ethical Principles) का गहन विश्लेषण करने पर, निम्नलिखित में से कौन-सा कथन इस चरण की तात्विक और दार्शनिक विशेषता को सर्वाधिक प्रामाणिक रूप से स्पष्ट करता है?
Detailed Explanation
📌 मुख्य संकल्पना / सिद्धांत:
लॉरेंस कोहलबर्ग के नैतिक विकास के सिद्धांत में 'उत्तर-रूढ़िगत नैतिकता' (Post-conventional Morality) का छठा और अंतिम चरण 'विवेक और सार्वभौमिक नीति की अवस्था' (Stage 6: Universal Ethical Principles) कहलाता है। इस चरण की तात्विक विशेषता यह है कि व्यक्ति बाहरी सामाजिक अनुबंधों या कानूनों से परे जाकर अपने व्यक्तिगत, आंतरिक विवेक और न्याय के सार्वभौमिक सिद्धांतों द्वारा निर्देशित होता है। यहाँ नैतिक निर्णय सार्वभौमिक मानवाधिकारों, समानता और मानवीय गरिमा पर आधारित होते हैं, भले ही वे कानून के साथ संघर्ष में क्यों न हों। विकल्प (b) इस अवस्था की सबसे सटीक व्याख्या करता है, क्योंकि इस स्तर पर महात्मा गांधी या मार्टिन लूथर किंग जैसे महान व्यक्तित्वों की तरह व्यक्ति अन्यायपूर्ण कानूनों का अहिंसक विरोध करने से भी पीछे नहीं हटते हैं।
📊 परीक्षा उपयोगी मुख्य बिंदु:
- कोहलबर्ग के सिद्धांत में कुल 3 स्तर और प्रत्येक में 2 चरण (कुल 6 चरण) हैं, जिनमें उत्तर-रूढ़िगत स्तर अंतिम स्तर है।
- विकल्प (a) चौथे चरण (सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने की अवस्था) से संबंधित है, जहाँ कानून और व्यवस्था सर्वोच्च होते हैं।
- विकल्प (c) तीसरे चरण (अच्छा लड़का/अच्छी लड़की अभिन्यास) को दर्शाता है जो पारंपरिक नैतिकता का हिस्सा है।
- विकल्प (d) पहले चरण (सज़ा और आज्ञाकारिता अभिविन्यास) से संबंधित है जो पूर्व-रूढ़िगत स्तर का है।
📖 सैद्धांतिक संदर्भ: लॉरेंस कोहलबर्ग ने जीन पियाजे के संज्ञानात्मक विकास के विचारों से प्रेरणा लेकर नैतिक विकास का संज्ञानात्मक-विकासवादी सिद्धांत प्रतिपादित किया। इस विषय पर विस्तृत अध्ययन के लिए कोहलबर्ग का नैतिक विकास का सिद्धांत की समीक्षा करें।
🎯 परीक्षा दृष्टिकोण: CTET / UPTET / BPSC TRE हेतु महत्वपूर्ण विस्तृत हल ➔
गहन विश्लेषण एवं परीक्षा उपयोगी रणनीतियाँ:
शिक्षक पात्रता परीक्षाओं (जैसे CTET, UPTET, DSSSB, BPSC TRE) में कोहलबर्ग के चरणों से विश्लेषणात्मक प्रश्न पूछे जाते हैं। छठे चरण की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें व्यक्ति का विवेक ही उसका सर्वोच्च नैतिक न्यायाधीश बन जाता है। इस चरण तक पहुँचने वाले व्यक्ति बहुत कम होते हैं क्योंकि इसमें व्यक्तिगत लाभ की कोई गुंजाइश नहीं होती बल्कि संपूर्ण मानवता के कल्याण और न्याय की सर्वोपरि भावना होती है। शिक्षकों को कक्षा में ऐसे बाल-केंद्रित परिवेश का निर्माण करना चाहिए जहाँ विद्यार्थी केवल नियमों के पालक न बनें, बल्कि तार्किक रूप से न्याय, समानता और मानवता के मूल्यों को समझें।