जीन पियाजे (Jean Piaget) के 'संज्ञानात्मक विकास के सिद्धांत' (Cognitive Development Theory) के अंतर्गत प्रतिपादित एक अत्यंत महत्वपूर्ण और केंद्रीय संप्रत्यय—'संरक्षण या कंजर्वेशन' (Conservation)—जिसे उस तार्किक मानसिक क्षमता के रूप में परिभाषित किया जाता है जिसके अंतर्गत बच्चा यह समझ पाता है कि किसी वस्तु के भौतिक स्वरूप, आकार, रूप-रंग या दिखावे में परिवर्तन होने के बावजूद उसकी मात्रा, द्रव्यमान, आयतन या संख्या अपरिवर्तित (Constant) रहती है—के वास्तविक मनोवैज्ञानिक निहितार्थ एवं कक्षा-कक्षीय शिक्षण में विद्यार्थियों के मूर्त संक्रियात्मक चिंतन, विकेंद्रीकरण (Decentration) और तार्किक ज्ञान निर्माण के वैज्ञानिक संचालन के संबंध में निम्नलिखित में से कौन सा मनोवैज्ञानिक कथन सबसे अधिक प्रामाणिक और वैज्ञानिक रूप से मान्य है?
Detailed Explanation
📌 मुख्य संकल्पना / सिद्धांत:
जीन पियाजे के संज्ञानात्मक विकास के सिद्धांत में 'संरक्षण' (Conservation) मूर्त संक्रियात्मक अवस्था (7 से 11 वर्ष) की एक केंद्रीय और आधारभूत उपलब्धि है। संरक्षण का तात्पर्य इस तार्किक समझ से है कि किसी वस्तु के भौतिक रूप, आकार या दिखावे में परिवर्तन कर देने पर भी उसकी मूल मात्रा, द्रव्यमान, क्षेत्रफल, आयतन या संख्या अपरिवर्तित रहती है। विकल्प (b) पूरी तरह सही है क्योंकि यह स्पष्ट करता है कि संरक्षण की क्षमता बच्चे में 'विकेंद्रीकरण' (Decentration - एक ही समय में किसी वस्तु के कई पहलुओं पर ध्यान केंद्रित कर पाना) और 'उत्क्रमणीयता' (Reversibility - मानसिक रूप से क्रिया को उलट सकने की क्षमता) के विकास के साथ ही उत्पन्न होती है। पियाजे के प्रसिद्ध प्रयोगों में, जब एक ही मात्रा के पानी को चौड़े बर्तन से लंबे और पतले गिलास में डाला जाता है, तो पूर्व-संक्रियात्मक बच्चा ऊंचाई देखकर धोखे में आ जाता है और उसे लगता है कि लंबे गिलास में पानी बढ़ गया है (इसे केंद्रीकरण या Centration कहते हैं)। इसके विपरीत, मूर्त संक्रियात्मक अवस्था का बालक विकेंद्रीकरण और उत्क्रमणीयता के कारण यह समझ जाता है कि पानी की मात्रा वही है क्योंकि तरल पदार्थ को वापस पहले वाले बर्तन में पलटा जा सकता है और चौड़ाई में कमी तथा ऊंचाई में वृद्धि एक-दूसरे की क्षतिपूर्ति कर देते हैं।
📊 परीक्षा उपयोगी मुख्य बिंदु:
- विकल्प (a) गलत है क्योंकि संवेदी-गामक अवस्था (0-2 वर्ष) में शिशु केवल 'वस्तु स्थायित्व' सीखते हैं, द्रव्यमान या आयतन का संरक्षण नहीं।
- विकल्प (b) बिल्कुल सही है क्योंकि संरक्षण, विकेंद्रीकरण (Decentration) और उत्क्रमणीयता (Reversibility) मूर्त संक्रियात्मक अवस्था की मुख्य विशेषताएं हैं।
- विकल्प (c) गलत है क्योंकि औपचारिक संक्रियात्मक अवस्था (11 वर्ष के बाद) अमूर्त चिंतन से जुड़ी है, जबकि संरक्षण की शुरुआत मूर्त अवस्था में ही हो जाती है।
- विकल्प (d) गलत है क्योंकि दृश्यमान धारणा या 'केंद्रीकरण' (Centration) के कारण ही बच्चे दिखावे से भ्रमित होते हैं, जो संरक्षण के अभाव को दर्शाता है न कि उसकी उपस्थिति को।
📖 सैद्धांतिक संदर्भ: जीन पियाजे का संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत बाल विकास और शिक्षण शास्त्र (CDP) का एक अति महत्वपूर्ण स्तंभ है। इसके अंतर्गत चार अवस्थाएं—संवेदी-गामक, पूर्व-संक्रियात्मक, मूर्त संक्रियात्मक और औपचारिक संक्रियात्मक—आती हैं। अधिक जानकारी के लिए जीन पियाजे का सिद्धांत पढ़ें।
🎯 परीक्षा दृष्टिकोण: CTET / UPTET / BPSC TRE हेतु महत्वपूर्ण विस्तृत हल ➔
गहन विश्लेषण एवं परीक्षा उपयोगी रणनीतियाँ:
शिक्षक पात्रता परीक्षाओं (जैसे CTET, UPTET, KVS, DSSSB) में पियाजे के चरणों और उनसे जुड़े मानसिक संप्रत्ययों (जैसे कंजर्वेशन, सिरिएशन, क्लासिफिकेशन, सेंट्रेशन) पर बार-बार प्रश्न पूछे जाते हैं। कक्षा-कक्षीय शिक्षण में शिक्षकों को यह समझना आवश्यक है कि 7 वर्ष से कम उम्र के बच्चे (पूर्व-संक्रियात्मक स्तर) केवल दिखावे के आधार पर सोचते हैं, इसलिए उन्हें मूर्त अनुभव और व्यावहारिक शिक्षण सामग्री (Concrete Materials) प्रदान करना चाहिए। मूर्त संक्रियात्मक स्तर पर छात्र तार्किक रूप से सोचने लगते हैं लेकिन अमूर्त समस्याओं के लिए उन्हें अभी भी ठोस वस्तुओं की आवश्यकता होती है। अध्यापन के दौरान शिक्षकों को बच्चों को तार्किक रूप से सोचने के लिए ऐसे अवसर देने चाहिए जहाँ वे खुद वस्तुओं के गुणों का परीक्षण कर सकें।