पदानुक्रमिक (Hierarchical) बुद्धि का सिद्धांत किसने दिया?
Detailed Explanation
📌 मुख्य संकल्पना / सिद्धांत:
पदानुक्रमिक (Hierarchical) बुद्धि का सिद्धांत मुख्य रूप से सिरिल बर्ट (Cyril Burt) और फिलिप वर्नन (Philip Vernon) द्वारा प्रतिपादित किया गया था। इस सिद्धांत के अनुसार, बुद्धि को एक पदानुक्रमित संरचना के रूप में व्यवस्थित किया जाता है, जहाँ सबसे ऊपर 'सामान्य कारक' (General Factor या 'g' factor) होता है, जिसके नीचे प्रमुख समूह कारक (Major Group Factors जैसे कि मौखिक-शैक्षणिक और व्यावहारिक-यांत्रिक) आते हैं। इसके बाद छोटे समूह कारक और अंत में विशिष्ट कारक (Specific Factors या 's' factors) आते हैं। यह सिद्धांत चार्ल्स स्पीयरमैन के द्वि-कारक सिद्धांत और थर्स्टन के बहु-कारक सिद्धांत के बीच एक समन्वय स्थापित करता है, जो यह दर्शाता है कि मानसिक योग्यताएं विभिन्न स्तरों पर पदानुक्रम में व्यवस्थित होती हैं।
📊 परीक्षा उपयोगी मुख्य बिंदु:
- बुद्धि के पदानुक्रमित मॉडल में फिलिप वर्नन का योगदान सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है, जिसमें उन्होंने 'g' कारक को वर्णात्मक रूप से उप-विभाजित किया।
- विकल्प (b) थर्स्टन और चेव ने प्राथमिक मानसिक योग्यताओं का समूह कारक सिद्धांत दिया था।
- विकल्प (c) स्टर्न और जॉनसन इस प्रमुख बुद्धि सिद्धांत से संबंधित नहीं हैं।
- विकल्प (d) चार्ल्स स्पीयरमैन ने बुद्धि का 'द्वि-कारक सिद्धांत' (Two-Factor Theory: g and s factor) प्रतिपादित किया था।
📖 सैद्धांतिक संदर्भ: शैक्षिक मनोविज्ञान में बुद्धि के विभिन्न स्वरूपों को समझने के लिए पदानुक्रमित दृष्टिकोण अत्यंत महत्वपूर्ण है। अधिक जानकारी के लिए बुद्धि के सिद्धांत को पढ़ें।
🎯 परीक्षा दृष्टिकोण: CTET / UPTET / BPSC TRE हेतु महत्वपूर्ण विस्तृत हल ➔
गहन विश्लेषण एवं परीक्षा उपयोगी रणनीतियाँ:
शिक्षक पात्रता परीक्षाओं (जैसे CTET, UPTET, HTET) में बुद्धि के सिद्धांतों से सीधे प्रश्न पूछे जाते हैं। पदानुक्रमित सिद्धांत यह समझाने में मदद करता है कि कैसे एक सामान्य बौद्धिक क्षमता (General Ability) विभिन्न उप-कौशलों और विशिष्ट योग्यताओं में विभाजित होती है। अध्यापन के दौरान शिक्षकों को यह समझना आवश्यक है कि विद्यार्थियों में सामान्य बौद्धिक क्षमता के साथ-साथ विभिन्न विशिष्ट क्षेत्रों (जैसे भाषा, स्थानिक, संख्यात्मक क्षमता) में भिन्नता पाई जाती है, जिसके आधार पर उपचारात्मक शिक्षण और विभेदित अनुदेशन (Differentiated Instruction) की योजना बनाई जानी चाहिए।