प्याजे के संज्ञानात्मक सिद्धान्त के अनुसार, विकास की दूसरी अवस्था क्या है?
Detailed Explanation
📌 मुख्य संकल्पना / सिद्धांत:
जीन पियाजे (Jean Piaget) के संज्ञानात्मक विकास के सिद्धांत (Theory of Cognitive Development) के अनुसार, बाल विकास की कुल चार अवस्थाएँ होती हैं। इस क्रम में दूसरी अवस्था 'पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था' (Preoperational Stage) है, जो सामान्यतः 2 वर्ष से 7 वर्ष की आयु तक चलती है। इस अवस्था की मुख्य विशेषता भाषा का तेजी से विकास, प्रतीकात्मक विचार (Symbolic Thought), अहंकेंद्रिता (Egocentrism) और संरक्षण (Conservation) की कमी है। बालक इस चरण में वस्तुओं को प्रतीकों के रूप में देखना और समझना शुरू कर देता है, लेकिन वह मानसिक संक्रियाओं को उलट नहीं सकता (Reversibility का अभाव होता है)।
📊 परीक्षा उपयोगी मुख्य बिंदु:
- प्रथम अवस्था: संवेदिक पेशीय अवस्था (Sensorimotor Stage - जन्म से 2 वर्ष), जिसमें बच्चा अपनी ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से सीखता है।
- द्वितीय अवस्था: पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था (Preoperational Stage - 2 से 7 वर्ष), जहाँ प्रतीकात्मक खेल और भाषा का विकास प्रमुख होता है।
- तृतीय अवस्था: मूर्त संक्रियात्मक अवस्था (Concrete Operational Stage - 7 से 11 वर्ष), जिसमें तार्किक चिंतन का आरंभ और संरक्षण की क्षमता विकसित होती है।
- चतुर्थ अवस्था: अमूर्त या औपचारिक संक्रियात्मक अवस्था (Formal Operational Stage - 11 वर्ष से आगे), जिसमें अमूर्त चिंतन और निगमनात्मक तर्क की क्षमता आती है।
- विकल्प विश्लेषण: विकल्प (a) तीसरी अवस्था है, विकल्प (c) पहली अवस्था है, और विकल्प (d) चौथी अवस्था है। अतः सही उत्तर विकल्प (b) है।
📖 सैद्धांतिक संदर्भ: जीन पियाजे स्विट्जरलैंड के एक प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक थे जिन्होंने बच्चों में ज्ञान के निर्माण की प्रक्रिया का गहन अध्ययन किया। उनके संज्ञानात्मक विकास के चरणों से संबंधित प्रश्न केंद्रीय शिक्षक पात्रता परीक्षा (CTET) और विभिन्न राज्यों की TET परीक्षाओं में बार-बार पूछे जाते हैं। अधिक जानकारी के लिए जीन पियाजे का सिद्धांत पढ़ें।
🎯 परीक्षा दृष्टिकोण: CTET / UPTET / BPSC TRE हेतु महत्वपूर्ण विस्तृत हल ➔
गहन विश्लेषण एवं परीक्षा उपयोगी रणनीतियाँ:
शिक्षक पात्रता परीक्षाओं में पियाजे के चरणों, उनकी आयु सीमा और विशिष्ट विशेषताओं (जैसे सेंट्रेशन, अहंकेंद्रिता, एनिमवाद) पर आधारित प्रश्न अनिवार्य रूप से आते हैं। पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था में बच्चे जीववाद (Animism - निर्जीव वस्तुओं में भी सजीव होने का भाव रखना) का प्रदर्शन करते हैं। शिक्षकों को इस आयु वर्ग के बालकों को पढ़ाने के लिए मूर्त अनुभवों, चित्रों और कहानी कहने की विधियों का प्रयोग करना चाहिए क्योंकि इस समय तार्किक संक्रियाओं का पूरी तरह विकास नहीं हुआ होता है।