शिक्षण प्रक्रिया में 'अभिप्रेरणा' (Motivation) का चक्र (Cycle) किससे शुरू होता है?
Detailed Explanation
📌 मुख्य संकल्पना / सिद्धांत:
शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया में अभिप्रेरणा (Motivation) एक अत्यंत महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक संप्रत्यय है। अभिप्रेरणा का चक्र हमेशा 'आवश्यकता' (Need) से शुरू होता है। जब किसी व्यक्ति को किसी चीज की शारीरिक या मानसिक कमी महसूस होती है, तो उसे आवश्यकता कहा जाता है। यह आवश्यकता व्यक्ति के भीतर एक तनाव या प्रणोद (Drive) उत्पन्न करती है, जो उसे एक निश्चित दिशा में व्यवहार करने के लिए प्रेरित करती है। इसके पश्चात चालक, प्रोत्साहन और अंत में लक्ष्य प्राप्ति होती है, जिससे आवश्यकता की संतुष्टि होती है और चक्र पूरा होता है। इसलिए, संपूर्ण अभिप्रेरणा प्रक्रिया की नींव 'आवश्यकता' ही है।
📊 परीक्षा उपयोगी मुख्य बिंदु:
- अभिप्रेरणा चक्र के चरण: आवश्यकता (Need) ➔ प्रणोद/चालक (Drive) ➔ अंतर्निहित उत्तेजना (Arousal) ➔ लक्ष्य-निर्देशित व्यवहार (Goal-directed behavior) ➔ उपलब्धि/प्रोत्साहन (Incentive) ➔ आवश्यकता का ह्रास/संतुष्टि।
- प्रोत्साहन (Incentive): यह चक्र के अंतिम चरणों में आता है जो लक्ष्य प्राप्ति पर मिलता है, न कि शुरुआत में।
- व्यवहार (Behavior): यह आवश्यकता और चालक के उत्पन्न होने के बाद का परिणाम है, जो लक्ष्य तक पहुँचने में मदद करता है।
- लक्ष्य (Goal): यह वह स्थिति है जिसे प्राप्त करके आवश्यकता समाप्त होती है, यह भी प्रारंभिक बिंदु नहीं है।
📖 सैद्धांतिक संदर्भ: मनोविज्ञान में अब्राहम मैस्लो (Abraham Maslow) का आवश्यकता पदानुक्रम सिद्धांत (Hierarchy of Needs) यह स्पष्ट करता है कि मानव व्यवहार हमेशा मूलभूत आवश्यकताओं से निर्देशित होता है। अधिगम में अभिप्रेरणा के अंतर्गत यह प्रश्न बाल विकास (CDP) की परीक्षाओं में बार-बार पूछा जाता है।
🎯 परीक्षा दृष्टिकोण: CTET / UPTET / BPSC TRE हेतु महत्वपूर्ण विस्तृत हल ➔
गहन विश्लेषण एवं परीक्षा उपयोगी रणनीतियाँ:
शिक्षक के रूप में कक्षा कक्ष में छात्रों को अभिप्रेरित करने के लिए उनकी बुनियादी और मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं (जैसे आत्म-सम्मान, अपनेपन की भावना, और जिज्ञासा) को समझना आवश्यक है। यदि शिक्षक छात्रों की 'आवश्यकता' को पहचान ले, तो उनके भीतर सीखने का 'ड्राइव' स्वतः उत्पन्न हो जाएगा। परीक्षा में अक्सर भ्रमित करने के लिए 'प्रोत्साहन' और 'लक्ष्य' विकल्प दिए जाते हैं, लेकिन याद रखें कि भूख (आवश्यकता) लगने पर ही भोजन की तलाश (व्यवहार) शुरू होती है। अतएव, मूल उत्पत्ति स्थल हमेशा 'आवश्यकता' ही होती है।