संज्ञानात्मक विकास की किस अवस्था में बच्चा रूढ़िवाद के नियम का पालन करने में असमर्थ होता है?
Detailed Explanation
📌 मुख्य संकल्पना / सिद्धांत:
जीन पियाजे के संज्ञानात्मक विकास के सिद्धांत के अनुसार, 'पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था' (Pre-operational Stage - लगभग 2 से 7 वर्ष) में बच्चा संरक्षण यानी 'रूढ़िवाद के नियम' (Law of Conservation) को समझने और उसका पालन करने में असमर्थ होता है। इस अवस्था के बच्चों में केंद्रीकरण (Centration) की प्रवृत्ति पाई जाती है, जिसके कारण वे किसी वस्तु या पदार्थ के केवल एक ही आयाम (जैसे लंबाई या ऊँचाई) पर ध्यान केंद्रित कर पाते हैं और उसके आकार या रूप बदलने पर उसके आयतन, द्रव्यमान या संख्या में कोई परिवर्तन नहीं होता, इस बात को समझ नहीं पाते। उदाहरण के लिए, यदि समान मात्रा के पानी को चौड़े गिलास से लंबे और पतले गिलास में डाला जाए, तो बच्चा लंबे गिलास में अधिक पानी होने का दावा करता है क्योंकि वह केवल ऊँचाई पर ध्यान देता है, न कि संपूर्ण मात्रा पर।
📊 परीक्षा उपयोगी मुख्य बिंदु:
- संरक्षण का अभाव: पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था में द्रव्यमान, आयतन और संख्या के संरक्षण की समझ विकसित नहीं होती है।
- मूर्त संक्रियात्मक अवस्था: लगभग 7 से 11 वर्ष की उम्र में बच्चों में संरक्षण (Conservation) का गुण आ जाता है, इसलिए विकल्प (b) सही नहीं है।
- अन्य विकल्प विश्लेषण: संवेदिक पेशीय अवस्था में बच्चा इंद्रियों के माध्यम से सीखता है, जबकि अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था में बच्चा तार्किक और अमूर्त चिंतन करने में सक्षम हो जाता है।
📖 सैद्धांतिक संदर्भ: जीन पियाजे ने बाल विकास को चार चरणों में विभाजित किया है जहाँ संज्ञानात्मक संरचनाओं का क्रमिक विकास होता है। अधिक जानकारी के लिए पढ़ें जीन पियाजे का संज्ञानात्मक विकास सिद्धांत।
🎯 परीक्षा दृष्टिकोण: CTET / UPTET / BPSC TRE हेतु महत्वपूर्ण विस्तृत हल ➔
गहन विश्लेषण एवं परीक्षा उपयोगी रणनीतियाँ:
शिक्षक पात्रता परीक्षाओं (जैसे CTET और विभिन्न राज्यों की TET परीक्षाओं) में पियाजे के चरणों से जुड़े प्रश्न बार-बार पूछे जाते हैं। पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था की मुख्य विशेषताएँ जैसे अहंकेंद्रिता (Egocentrism), जीववाद (Animism), और संरक्षण की कमी (Lack of Conservation) बाल मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। शिक्षकों को यह समझना आवश्यक है कि इस आयु वर्ग के बच्चों को अमूर्त तर्कों के बजाय मूर्त अनुभवों और दृश्य सामग्रियों के माध्यम से पढ़ाना चाहिए ताकि उनकी मानसिक संरचनाओं का सही विकास हो सके।