कोहलबर्ग के 'नैतिक विकास' सिद्धांत का मुख्य आधार क्या है?
Detailed Explanation
📌 मुख्य संकल्पना / सिद्धांत:
लॉरेंस कोहलबर्ग (Lawrence Kohlberg) का नैतिक विकास का सिद्धांत मुख्य रूप से इस बात पर केंद्रित है कि व्यक्ति अपने जीवन में नैतिक दुविधाओं (Moral Dilemmas) का सामना करते समय किस प्रकार तर्क (Reasoning) करता है। कोहलबर्ग ने अपने प्रसिद्ध अध्ययन में बच्चों और वयस्कों को नैतिक कहानियाँ (जैसे-हाइन्ज़ डिलेमा) सुनाईं और उनके तर्कों का विश्लेषण किया। उनके अनुसार, नैतिक विकास का आधार किसी कार्य का परिणाम (जैसे दंड या पुरस्कार) नहीं, बल्कि उस निर्णय तक पहुँचने में शामिल 'न्याय और तर्क की प्रक्रिया' (Process of justice and reasoning) है। व्यक्ति जैसे-जैसे संज्ञानात्मक रूप से परिपक्व होता है, उसके नैतिक तर्क का स्तर भी अधिक सार्वभौमिक और न्याय-प्रधान होता जाता है। अतः विकल्प (b) इस सिद्धांत का सबसे सटीक दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक आधार प्रस्तुत करता है।
📊 परीक्षा उपयोगी मुख्य बिंदु:
- कोहलबर्ग ने अपने सिद्धांत को तीन मुख्य स्तरों (पूर्व-पारंपरिक, पारंपरिक, और उत्तर-पारंपरिक) और प्रत्येक में दो-दो अवस्थाओं यानी कुल छह चरणों में विभाजित किया है।
- विकल्प (a) गलत है क्योंकि सामाजिक रीतियाँ केवल पारंपरिक स्तर के एक छोटे हिस्से को प्रभावित करती हैं, संपूर्ण नैतिक विकास का मूल आधार नहीं।
- विकल्प (c) और (d) ('दंड का भय' और 'पुरस्कार') पूर्व-पारंपरिक स्तर (Pre-conventional level) की केवल पहली और दूसरी अवस्था के संकीर्ण प्रेरक हैं, जो संपूर्ण सिद्धांत का केंद्रीय आधार नहीं हैं।
- कोहलबर्ग का यह सिद्धांत जीन पियाजे के संज्ञानात्मक विकास और नैतिक निर्णय के विचारों से अत्यधिक प्रभावित था।
📖 सैद्धांतिक संदर्भ: लॉरेंस कोहलबर्ग ने हार्वर्ड विश्वविद्यालय में अपने शोध के दौरान यह सिद्ध किया कि नैतिकता केवल व्यवहार नहीं बल्कि एक आंतरिक संज्ञानात्मक प्रक्रिया है जो न्याय के सिद्धांतों के इर्द-गिर्द घूमती है। अधिक जानकारी के लिए कोहलबर्ग का सिद्धांत पढ़ें।
🎯 परीक्षा दृष्टिकोण: CTET / UPTET / BPSC TRE हेतु महत्वपूर्ण विस्तृत हल ➔
गहन विश्लेषण एवं परीक्षा उपयोगी रणनीतियाँ:
शिक्षक पात्रता परीक्षाओं (जैसे CTET, UPTET, DSSSB और BPSC TRE) में कोहलबर्ग के सिद्धांत से अक्सर 'हाइन्ज़ डिलेमा' (Heinz Dilemma) या विभिन्न स्तरों की विशेषताओं पर प्रश्न पूछे जाते हैं। परीक्षार्थियों को यह समझना आवश्यक है कि कोहलबर्ग ने बच्चों के 'व्यवहार' का अध्ययन नहीं किया, बल्कि उनके 'तर्क' (Reasoning) का अध्ययन किया कि वे किसी कार्य को सही या गलत क्यों मानते हैं। 'न्याय और तर्क' ही वह धुरी है जिस पर संपूर्ण सिद्धांत टिका है। कक्षा-कक्ष में शिक्षकों को चाहिए कि वे विद्यार्थियों में रटने की प्रवृत्ति के बजाय नैतिक तार्किकता, समस्या-समाधान और न्यायपूर्ण दृष्टिकोण विकसित करने के लिए परिचर्चा और लोकतान्त्रिक वातावरण का निर्माण करें।