अभिप्रेरणा (Motivation) का 'द्वि-कारक सिद्धांत' (Two-Factor Theory) किसने दिया?
Detailed Explanation
📌 मुख्य संकल्पना / सिद्धांत:
अभिप्रेरणा का 'द्वि-कारक सिद्धांत' (Two-Factor Theory) प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक फ्रेडरिक हर्ज़बर्ग (Frederick Herzberg) द्वारा 1959 में प्रतिपादित किया गया था। इस सिद्धांत को 'प्रेरक-स्वच्छता सिद्धांत' (Motivator-Hygiene Theory) के रूप में भी जाना जाता है। हर्ज़बर्ग के अनुसार, कार्यस्थल या अधिगम वातावरण में दो प्रकार के कारक होते हैं जो मानव व्यवहार और प्रेरणा को प्रभावित करते हैं: पहला 'स्वच्छता या रखरखाव कारक' (Hygiene Factors) जैसे वेतन, कार्य दशाएं और कंपनी की नीतियां, जो असंतोष को रोकती हैं लेकिन सीधे तौर पर आंतरिक प्रेरणा नहीं बढ़ातीं; और दूसरा 'प्रेरक कारक' (Motivators) जैसे उपलब्धि, मान्यता, कार्य की प्रकृति और जिम्मेदारी, जो वास्तविक रूप से व्यक्ति को उच्च प्रदर्शन और आंतरिक संतुष्टि के लिए प्रेरित करते हैं। इसलिए विकल्प (a) पूरी तरह से सही है।
📊 परीक्षा उपयोगी मुख्य बिंदु:
- स्वच्छता कारक (Hygiene Factors): ये बाह्य कारक हैं जो भौतिक या मनोवैज्ञानिक असंतोष को दूर करते हैं लेकिन प्रेरणा का सृजन नहीं करते।
- प्रेरक कारक (Motivator Factors): ये आंतरिक कारक हैं जो आत्म-सिद्धि और कार्य संतुष्टि को बढ़ावा देते हैं।
- अन्य विकल्पों का विश्लेषण: अब्राहम मैस्लो ने आवश्यकता पदानुक्रम सिद्धांत (Hierarchy of Needs) दिया, स्किनर ने क्रियाप्रसूत अनुबंधन (Operant Conditioning) का सिद्धांत प्रतिपादित किया, और सिगमंड फ्रायड ने मनोविश्लेषणवाद (Psychoanalysis) दिया।
📖 सैद्धांतिक संदर्भ: शैक्षिक मनोविज्ञान में अभिप्रेरणा छात्रों के अधिगम का मार्ग प्रशस्त करती है। हर्ज़बर्ग का यह मॉडल कक्षा प्रबंधन और शिक्षक-छात्र संबंधों को बेहतर बनाने में अत्यंत उपयोगी माना जाता है। अधिक जानकारी के लिए अधिगम अभिप्रेरणा के सिद्धांत का अध्ययन करें।
🎯 परीक्षा दृष्टिकोण: CTET / UPTET / BPSC TRE हेतु महत्वपूर्ण विस्तृत हल ➔
गहन विश्लेषण एवं परीक्षा उपयोगी रणनीतियाँ:
शिक्षक पात्रता परीक्षाओं (जैसे CTET, UPTET, KVS, और DSSSB) में अभिप्रेरणा के सिद्धांतों से सीधे प्रश्न पूछे जाते हैं। हर्ज़बर्ग का द्वि-कारक सिद्धांत इस बात पर जोर देता है कि केवल बुनियादी सुविधाओं (जैसे अच्छी कक्षा, बैठने की व्यवस्था) से छात्र प्रेरित नहीं होंगे, बल्कि उन्हें प्रशंसा, चुनौतीपूर्ण कार्य और आत्म-सम्मान (प्रेरक कारक) की भी उतनी ही आवश्यकता होती है। अध्यापकों को चाहिए कि वे शिक्षण प्रक्रिया में इन दोनों पहलुओं का संतुलन बनाएं ताकि विद्यार्थियों का समग्र संज्ञानात्मक और भावनात्मक विकास सुनिश्चित हो सके।