सामाजिक अध्ययन शिक्षण के अंतर्गत भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के 'सविनय अवज्ञा आंदोलन' (Civil Disobedience Movement) और वर्ष 1930-1931 के दौरान उत्तर प्रदेश (संयुक्त प्रांत) में चले 'कर-बंदी आंदोलन' (No-Tax Campaign) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. वर्ष 1930 में महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान उत्तर प्रदेश में कांग्रेस द्वारा लगान और मालगुजारी न देने के लिए 'कर-बंदी आंदोलन' चलाया गया था, जिसका नेतृत्व मुख्य रूप से जवाहरलाल नेहरू और गोविंद वल्लभ पंत जैसे नेताओं ने किया था।
- 2. उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद (प्रयागराज) और रायबरेली जैसे जिलों में किसानों ने जमींदारों और ब्रिटिश सरकार को भू-राजस्व (Land Revenue) देने से स्पष्ट मना कर दिया था।
- 3. प्रथम गोलमेज सम्मेलन (1930) में कांग्रेस की ओर से महात्मा गांधी ने भाग लिया था, जहाँ उत्तर प्रदेश के कर-बंदी आंदोलन को वापस लेने की शर्त पर गांधी-इरविन समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?
Detailed Explanation
📌 मुख्य संकल्पना / सिद्धांत:
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन और आधुनिक भारतीय इतिहास के शिक्षण के अंतर्गत 'सविनय अवज्ञा आंदोलन' (1930) और उससे जुड़े प्रांतीय आंदोलनों का अध्ययन अत्यंत महत्वपूर्ण है। वर्ष 1930 में जब महात्मा गांधी के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आंदोलन का प्रसार पूरे देश में हुआ, तब संयुक्त प्रांत (वर्तमान उत्तर प्रदेश) में किसानों की दयनीय आर्थिक स्थिति और महामंदी के प्रभाव के कारण प्रांतीय कांग्रेस कमेटी ने 'कर-बंदी आंदोलन' (No-Tax Campaign) का आह्वान किया। इस आंदोलन के तहत किसानों से सरकारी लगान और मालगुजारी का भुगतान न करने का आग्रह किया गया। इस क्षेत्रीय आंदोलन का नेतृत्व प्रमुख राष्ट्रीय व प्रांतीय नेताओं यथा पंडित जवाहरलाल नेहरू और गोविंद वल्लभ पंत ने तत्परता से किया था। इलाहाबाद, रायबरेली और प्रतापगढ़ जैसे जिलों में किसानों ने ब्रिटिश सरकार और जमींदारों को कर देने से इनकार कर दिया था। अतः कथन 1 और 2 पूर्णतः सत्य हैं।
📊 परीक्षा उपयोगी मुख्य बिंदु:
- कथन 1 सत्य है क्योंकि उत्तर प्रदेश में लगान अदायगी रोकने का अभियान जवाहरलाल नेहरू एवं गोविंद वल्लभ पंत जैसे दिग्गजों के मार्गदर्शन में संचालित हुआ था।
- कथन 2 सत्य है क्योंकि इलाहाबाद और रायबरेली के किसानों ने भू-राजस्व चुकाने से साफ मना कर दिया था, जिससे प्रशासनिक व्यवस्था हिल गई थी।
- कथन 3 असत्य है क्योंकि महात्मा गांधी ने प्रथम गोलमेज सम्मेलन (1930) में भाग नहीं लिया था; उन्होंने कांग्रेस की ओर से केवल द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (1931) में भाग लिया था। गांधी-इरविन समझौता मार्च 1931 में हुआ था जिसके तहत राजनीतिक बंदियों की रिहाई जैसे मुद्दे शामिल थे।
- अन्य विकल्प (b, c, d) गलत हैं क्योंकि कथन 3 तथ्यात्मक रूप से पूरी तरह गलत है।
📖 सैद्धांतिक संदर्भ: आधुनिक भारतीय इतिहास और राष्ट्रीय आंदोलन के शिक्षण में सामाजिक अध्ययन (सामाजिक अध्ययन शिक्षण) के अंतर्गत क्षेत्रीय इतिहास और राष्ट्रीय धाराओं का सहसंबंध समझना आवश्यक है। एनसीईआरटी पाठ्यक्रम के अनुसार, सविनय अवज्ञा आंदोलन केवल नमक कानून तोड़ने तक सीमित नहीं था, बल्कि इसने विभिन्न क्षेत्रों में किसान आंदोलनों, कर-बंदी और दलित उत्थान जैसे विविध आयामों को अपने भीतर समेटा था।
🎯 परीक्षा दृष्टिकोण: CTET / UPTET / BPSC TRE हेतु महत्वपूर्ण विस्तृत हल ➔
गहन विश्लेषण एवं परीक्षा उपयोगी रणनीतियाँ:
शिक्षक पात्रता परीक्षाओं (जैसे CTET पेपर-2 सामाजिक विज्ञान, UPTET और BPSC शिक्षक भर्ती) में आधुनिक भारतीय इतिहास से तथ्यात्मक और विश्लेषणात्मक दोनों प्रकार के प्रश्न पूछे जाते हैं। इस प्रश्न के माध्यम से परीक्षार्थी की इस समझ का परीक्षण किया जाता है कि राष्ट्रीय स्तर के आंदोलनों का स्थानीय स्तर (जैसे संयुक्त प्रांत का कर-बंदी आंदोलन) पर क्या प्रभाव पड़ा था। गोलमेज सम्मेलनों के क्रम (प्रथम-1930, द्वितीय-1931, तृतीय-1932) और गांधी-इरविन समझौते की शर्तों से जुड़े प्रश्न बार-बार दोहराए जाते हैं। इसलिए छात्रों को राष्ट्रीय घटनाओं के साथ-साथ उनके क्षेत्रीय नेतृत्व और कालक्रम का सूक्ष्म अध्ययन करना चाहिए। सही विकल्प (a) का चयन इस प्रकार विश्लेषणात्मक समझ और तथ्यात्मक सटीकता दोनों पर आधारित है।