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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, 'न्यायिक सक्रियता' (Judicial Activism), 'जनहित याचिका' (PIL) तथा न्यायालयों द्वारा अपनाई जाने वाली 'निरंतर mandamus' (Continuing Mandamus) की अवधारणा के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. जनहित याचिका (PIL) की अवधारणा ने पारंपरिक 'पीड़ित पक्ष' (Locus Standi) के नियम को लचीला बनाया, जिसके तहत अब समाज के किसी भी जिम्मेदार नागरिक या सामाजिक संगठन द्वारा गरीबों, अशिक्षितों या मौलिक अधिकारों से वंचित वर्गों की ओर से सीधे सर्वोच्च न्यायालय (अनुच्छेद 32) या उच्च न्यायालयों (अनुच्छेद 226) में न्याय की गुहार लगाई जा सकती है।
  2. 2. 'निरंतर mandamus' (Continuing Mandamus) की न्यायिक युक्ति के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय पर्यावरण प्रदूषण, बंधुआ मजदूरी या मानवाधिकारों के हनन जैसे मामलों में केवल एक बार फैसला सुनाकर अपनी ज़िम्मेदारी पूरी नहीं करता, बल्कि मामले की जटिलता और प्रशासनिक सुस्ती को देखते हुए कार्यकारी एजेंसियों को समय-समय पर प्रगति रिपोर्ट पेश करने का निर्देश देता है और मामले की सुनवाई तब तक जारी रखता है जब तक पूर्ण न्याय सुनिश्चित नहीं हो जाता।
  3. 3. 'विनीत नारायण बनाम भारत संघ (1998)' मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि यद्यपि न्यायालयों को कार्यकारी कार्यों में हस्तक्षेप करने का व्यापक अधिकार प्राप्त है, किंतु 'निरंतर mandamus' जैसी पद्धतियों का उपयोग केवल नीतिगत मामलों और विधायी कानून निर्माण के क्षेत्रों में किया जा सकता है, तथा प्रशासनिक जाँच एजेंसियों (जैसे CBI) के दैनिक कामकाज की निगरानी के लिए इसका प्रयोग पूरी तरह से असंवैधानिक है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: जनहित याचिका (PIL) ने 'लोकस स्टैंडी' (Locus Standi - पीड़ित व्यक्ति द्वारा ही मुकदमा दायर करने का नियम) के पारंपरिक अमेरिकी और अंग्रेजी सिद्धांत को शिथिल किया। न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती और वी.आर. कृष्ण अय्यर के दौर में यह विकसित हुआ, जिससे समाज के उपेक्षित वर्गों की ओर से कोई भी लोकहितैषी व्यक्ति या संस्था अदालत का दरवाजा खटखटा सकती है। कथन 2 सही है: 'निरंतर mandamus' (Continuing Mandamus) भारतीय न्यायपालिका द्वारा गढ़ी गई एक अनूठी शक्ति है, जिसका उपयोग विशेषकर पर्यावरण (जैसे एमसी मेहता मामले), मानवाधिकार और संस्थागत सुधारों से जुड़े मामलों में किया जाता है। इसमें न्यायालय तुरंत केस बंद नहीं करता, बल्कि कार्यपालिका के कार्यों की निगरानी करता है और समय-समय पर रिपोर्ट मांगता है ताकि अनुपालन सुनिश्चित हो सके। कथन 3 गलत है: 'विनीत नारायण बनाम भारत संघ (1998)' मामले में न्यायालय ने भ्रष्टाचार और CBI/CVC की जांच में कार्यकारी निष्क्रियता से निपटने के लिए ही 'निरंतर mandamus' का प्रभावी उपयोग किया था। न्यायालय ने यह कभी नहीं कहा कि इसका प्रयोग नीतिगत मामलों या कानून निर्माण के क्षेत्रों में किया जा सकता है (क्योंकि कानून बनाना विधायिका का काम है)। इसके विपरीत, न्यायालय नीतिगत और विधायी क्षेत्रों में सीधे हस्तक्षेप करने से बचता है, जबकि प्रशासनिक जवाबदेही तय करने के लिए इसका प्रयोग करता है।
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