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Indian Polity
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भारतीय संविधान के प्रथम भाग के अंतर्गत 'संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र' (अनुच्छेद 1-4) तथा राज्यों के पुनर्गठन से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 2 के अंतर्गत संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह विधि द्वारा ऐसे निबंधनों और शर्तों पर, जो वह ठीक समझे, संघ में नए राज्यों का प्रवेश या उनकी स्थापना कर सकती है, और यह शक्ति मुख्य रूप से उन क्षेत्रों पर लागू होती है जो पहले से भारतीय संघ का हिस्सा नहीं हैं (बाहरी राज्यों का प्रवेश)।
  2. 2. अनुच्छेद 3 के तहत संसद किसी भी राज्य के क्षेत्रफल में वृद्धि, कमी या उसकी सीमाओं में परिवर्तन कर सकती है, और इसके लिए प्रस्तुत किए जाने वाले विधेयक को संसद में पुनःस्थापित करने से पूर्व संबंधित राज्य के विधानमंडल की पूर्व सहमति प्राप्त करना अनिवार्य होता है, और राज्य विधानमंडल का नकारात्मक मत संसद के लिए पूर्णतः बाध्यकारी होता है।
  3. 3. 'संविधान (सौवां संशोधन) अधिनियम, 2015' के माध्यम से भारत और बांग्लादेश के बीच कुछ भू-भागों के अंतरण (Exchange of Enclaves) को प्रभावी बनाया गया था, जिसके लिए यह स्पष्ट किया गया कि विदेशी राज्य को भारतीय भू-भाग सौंपने के लिए संविधान संशोधन की आवश्यकता होती है, जबकि देश के भीतर राज्यों की सीमाओं के निर्धारण के लिए साधारण बहुमत पर्याप्त होता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है क्योंकि संविधान का अनुच्छेद 2 संसद को नए राज्यों के प्रवेश या उनकी स्थापना की शक्ति देता है जो बाहरी क्षेत्रों से संबंधित है। कथन 2 गलत है क्योंकि अनुच्छेद 3 के तहत राज्य विधानमंडल का विचार जानना अनिवार्य तो है, किंतु उनका मत संसद के लिए बाध्यकारी नहीं होता है। कथन 3 सही है, 100वें संविधान संशोधन (2015) द्वारा भारत-बांग्लादेश भू-भाग अंतरण किया गया था। इस विषय पर विस्तृत अध्ययन के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था के पोर्टल पर विजिट करें।
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भारतीय संविधान के अंतर्गत नागरिकता के प्रावधानों (अनुच्छेद 5-11) और संसद की विधायी शक्ति के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 11 के अनुसार संसद को नागरिकता के अर्जन और समाप्ति तथा नागरिकता से संबंधित अन्य सभी विषयों के संबंध में उपबंध करने की संपूर्ण शक्ति प्रदान की गई है, और यह शक्ति संसद को संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत संविधान संशोधन करने की विशेष प्रक्रिया अपनाए बिना साधारण बहुमत से कानून बनाने का अधिकार देती है। 2. अनुच्छेद 9 के अंतर्गत यह स्पष्ट किया गया है कि यदि कोई भारतीय नागरिक स्वेच्छा से किसी विदेशी राज्य की नागरिकता प्राप्त कर लेता है, तो उसकी भारतीय नागरिकता अनुच्छेद 5, 6, 7 या 8 के उपबंधों के बावजूद स्वतः समाप्त नहीं होगी, जब तक कि संसद इस संबंध में कोई विशेष दंडात्मक कानून पारित न करे। 3. अनुच्छेद 10 के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति, जो इस भाग के पूर्वगामी उपबंधों में से किसी के अधीन भारत का नागरिक है या समझा जाता है, संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि के उपबंधों के अधीन रहते हुए, भारत का नागरिक बना रहेगा, जिसका तात्पर्य यह है कि संसद किसी भी नागरिक की नागरिकता को बिना किसी विधिक प्रक्रिया के कार्यपालिका के साधारण आदेश से छीन सकती है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? मूँगफली के टिक्का रोग का कारण कौन सा कवक है? भारतीय संविधान के अंतर्गत भारत के राष्ट्रपति की विधायी, कार्यकारी और वीटो शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 111 के तहत जब संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित कोई विधेयक राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है, तो राष्ट्रपति को यह शक्ति प्राप्त है कि वह अपनी अनुमति रोक सकता है (अत्यंतिक वीटो), किंतु यदि संसद उस विधेयक को (धन विधेयक को छोड़कर) संशोधन के बिना या सहित पुनः साधारण बहुमत से पारित कर देती है, तो राष्ट्रपति के लिए उस पर अपनी अनुमति देना संवैधानिक रूप से अनिवार्य हो जाता है। 2. राष्ट्रपति द्वारा प्रख्यापित अध्यादेश (Ordinance) की शक्ति अनुच्छेद 123 के अंतर्गत उसकी विधायी शक्ति का हिस्सा है, और सर्वोच्च न्यायालय के 'डेको वासुदेव रेड्डी वाद' या अन्य स्थापित निर्णयों के अनुसार, अध्यादेश निर्माण की संतुष्टि न्यायिक समीक्षा के दायरे से पूरी तरह बाहर है और इसे किसी भी न्यायालय में दुर्भावना के आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती। 3. राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्ति (अनुच्छेद 72) के अंतर्गत राज्यपाल की तुलना में दो अतिरिक्त शक्तियां प्राप्त हैं - पहली यह कि वह सेना के न्यायालय (Court Martial) द्वारा दिए गए दंड या डंडादेश को क्षमा कर सकता है, और दूसरी यह कि वह मृत्युदंड (Death Sentence) के मामलों में भी संपूर्ण क्षमादान दे सकता है, जबकि राज्य का राज्यपाल मृत्युदंड को क्षमा नहीं कर सकता। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय संविधान के अंतर्गत केंद्र-राज्य विधायी एवं प्रशासनिक संबंधों तथा 'अंतर-राज्यीय परिषद्' (Inter-State Council) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 263 के अंतर्गत राष्ट्रपति को लोक हित में एक अंतर-राज्यीय परिषद् की स्थापना करने की शक्ति प्राप्त है, और इस परिषद् का मुख्य कार्य राज्यों के बीच उत्पन्न होने वाले विवादों की जाँच करना, उन पर सलाह देना तथा राज्यों और संघ के सामान्य हितों से संबंधित विषयों पर चर्चा करना है। 2. अंतर-राज्यीय परिषद् के गठन की संस्तुति सर्वप्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग (ARC) द्वारा की गई थी, जिसके पश्चात वर्ष 1990 में सरकारी आयोग (Sarkaria Commission) की सिफारिश पर राष्ट्रपति के आदेश द्वारा इसका स्थायी रूप से गठन किया गया। 3. अंतर-राज्यीय परिषद् की बैठकों की अध्यक्षता भारत के प्रधानमंत्री द्वारा की जाती है, और इसके सदस्यों में सभी राज्यों के मुख्यमंत्री, संघ राज्य क्षेत्रों (जहाँ विधानसभाएँ हैं) के मुख्यमंत्री तथा राष्ट्रपति शासन वाले राज्यों के राज्यपाल (या प्रशासक) शामिल होते हैं, इसके अतिरिक्त प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्रिमंडल के छह कैबिनेट मंत्री भी इसके सदस्य होते हैं। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय संविधान सभा के गठन और उसकी निर्माण प्रक्रिया के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान सभा के सदस्यों का निर्वाचन प्रांतीय विधानसभाओं के सदस्यों द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत प्रणाली द्वारा किया गया था, तथा इसमें ब्रिटिश प्रांतों के साथ-साथ देशी रियासतों को भी प्रतिनिधित्व दिया गया था जहाँ रियासतों के प्रतिनिधियों को संबंधित शासकों द्वारा मनोनीत किया जाना था। 2. संविधान सभा द्वारा संविधान के प्रारूप पर विचार करने और उसे अंतिम रूप देने के लिए कुल 22 मुख्य समितियों का गठन किया गया था, जिनमें कार्य संचालन समिति के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद तथा प्रांतीय संविधान समिति के अध्यक्ष सरदार वल्लभभाई पटेल थे। 3. संविधान सभा की अंतिम बैठक 24 जनवरी 1950 को आयोजित की गई थी, और उसी दिन संविधान सभा ने औपचारिक रूप से भंग होकर भारत की 'अंतरिम संसद' (Provisional Parliament) के रूप में तब तक कार्य जारी रखा जब तक कि वर्ष 1951-52 के आम चुनावों के पश्चात भारत की पहली निर्वाचित संसद का गठन नहीं हो गया।
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