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History of India
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19वीं शताब्दी के सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. राजा राममोहन राय द्वारा स्थापित 'आत्मीय सभा' (1815) ने एकेश्वरवाद के प्रचार और मूर्तिपूजा के विरोध का समर्थन किया, जबकि उनके द्वारा 1828 में स्थापित 'ब्रह्म समाज' ने वेदों की अचूकता और उनके दिव्य होने के सिद्धांत को पूरी तरह स्वीकार किया था।
  2. 2. स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा स्थापित 'आर्य समाज' ने 'वेदों की ओर लौटो' का नारा दिया और पाखंड खंडनी पताका फहराते हुए मूर्तिपूजा, बहुदेववाद, अवतारवाद तथा जन्मजात जाति व्यवस्था का कड़ा विरोध किया था।
  3. 3. प्रार्थना समाज की स्थापना आत्माराम पांडुरंग द्वारा महादेव गोविंद रानाडे और आर.जी. भंडारकर के सहयोग से बंबई में की गई थी, जिसका मुख्य उद्देश्य अंतर-जातीय विवाह, विधवा पुनर्विवाह और महिलाओं की शिक्षा को बढ़ावा देना था।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 गलत है क्योंकि राजा राममोहन राय और ब्रह्म समाज ने वेदों की अचूकता या उनके दिव्य होने के सिद्धांत को कभी स्वीकार नहीं किया था, बल्कि ब्रह्म समाज ने किसी भी धर्म ग्रंथ को स्वतः प्रमाण (Infallible) नहीं माना। इसके विपरीत, दयानंद सरस्वती और आर्य समाज ने वेदों को अपौरुषेय और ज्ञान का एकमात्र स्रोत माना है। कथन 2 और 3 बिल्कुल सही हैं; स्वामी दयानंद सरस्वती ने मूर्तिपूजा और पाखंड का विरोध करते हुए 'वेदों की ओर लौटो' का आह्वान किया था, तथा प्रार्थना समाज ने महाराष्ट्र में सामाजिक सुधारों, विधवा पुनर्विवाह और महिला शिक्षा के क्षेत्र में अभूतपूर्व कार्य किया था। अधिक जानकारी के लिए विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
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