BaalVikas
Menu

त्वरित लिंक्स

Indian Polity
22 views

भारतीय संविधान के अंतर्गत राष्ट्रपति की विधायी, कार्यकारी तथा अध्यादेश निर्माण शक्तियों (अनुच्छेद 123) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 123 के अनुसार राष्ट्रपति द्वारा प्रख्यापित अध्यादेश की वही शक्ति और प्रभाव होता है जो संसद द्वारा पारित किसी अधिनियम का होता है, किंतु यह अध्यादेश संसद के दोनों सदनों के पुनः समवेत होने के ठीक छह सप्ताह बाद स्वतः निष्प्रभावी हो जाता है, बशर्ते इससे पूर्व ही इसे संसद के दोनों सदनों द्वारा अस्वीकृत न कर दिया गया हो।
  2. 2. राष्ट्रपति किसी अध्यादेश को केवल तभी प्रख्यापित कर सकता है जब संसद के दोनों सत्र चल रहे हों और किसी एक सदन द्वारा कानून बनाने में असमर्थता व्यक्त की गई हो, क्योंकि यदि संसद का कोई भी एक सदन सत्र में है, तो राष्ट्रपति अध्यादेश जारी नहीं कर सकता है।
  3. 3. राष्ट्रपति की अध्यादेश निर्माण की शक्ति उसकी स्वविवेकपूर्ण शक्ति नहीं है, बल्कि वह इस शक्ति का प्रयोग केवल केंद्रीय मंत्रिपरिषद की सलाह पर ही कर सकता है, जिसे 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा यह स्पष्ट किया गया कि राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद से अपनी सलाह पर पुनर्विचार करने के लिए केवल एक बार कह सकता है, किंतु पुनर्विचार के पश्चात भेजी गई सलाह को मानने के लिए राष्ट्रपति बाध्य होता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 123 के तहत राष्ट्रपति द्वारा जारी अध्यादेश का प्रभाव संसद के अधिनियम के समान होता है और यह संसद के पुनः समवेत होने के 6 सप्ताह बाद या उससे पूर्व दोनों सदनों द्वारा अस्वीकृत होने पर समाप्त हो जाता है। कथन 2 गलत है क्योंकि राष्ट्रपति अध्यादेश तभी जारी कर सकता है जब संसद के दोनों सदन सत्र में न हों (या उनमें से कोई एक सदन सत्र में न हो)। यदि संसद का कोई भी एक सदन सत्र में है, तो राष्ट्रपति अध्यादेश जारी नहीं कर सकता क्योंकि कानून निर्माण के लिए दोनों सदनों की सहमति आवश्यक होती है, अतः दोनों का सत्रावसान होना अनिवार्य शर्त है। कथन 3 सही है; राष्ट्रपति की अध्यादेश निर्माण की शक्ति उसकी स्वविवेक की शक्ति नहीं है बल्कि यह मंत्रिपरिषद की सलाह पर आधारित होती है, और 44वें संविधान संशोधन 1978 के तहत राष्ट्रपति को मंत्रिपरिषद की सलाह को एक बार पुनर्विचार के लिए भेजने की शक्ति दी गई है, किंतु पुनर्विचार के बाद दी गई सलाह मानने के लिए राष्ट्रपति पूरी तरह बाध्य हैं। विस्तृत अध्ययन के लिए आप भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था के पोर्टल पर जा सकते हैं।
Share:

Related Questions

→ भारतीय संविधान के भाग-I के अंतर्गत 'संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र' (अनुच्छेद 1-4) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 1 में भारत का वर्णन 'राज्यों का संघ' (Union of States) के रूप में किया गया है, न कि 'राज्यों का परिसंघ' (Federation of States), क्योंकि भारतीय संघ राज्यों के बीच किसी समझौते का परिणाम नहीं है और न ही किसी राज्य को संघ से अलग होने की स्वतंत्रता है। 2. अनुच्छेद 2 संसद को यह शक्ति देता है कि वह विधि द्वारा ऐसे नियमों और शर्तों पर, जो वह ठीक समझे, संघ में नए राज्यों का प्रवेश या उनकी स्थापना कर सकती है, तथा इसके अंतर्गत स्थापित किए जाने वाले नए राज्य वे भू-भाग हैं जो पहले से भारत संघ का आंतरिक हिस्सा नहीं थे। 3. अनुच्छेद 3 के तहत किसी राज्य के क्षेत्रफल को बढ़ाने, घटाने, उसके नाम या सीमा में परिवर्तन करने संबंधी विधेयक को संसद में प्रस्तुत करने से पूर्व राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश अनिवार्य है, तथा राष्ट्रपति को ऐसा विधेयक संसद में प्रस्तुत करने से पूर्व संबंधित राज्य के विधानमंडल के पास उसकी राय जानने के लिए भेजना अनिवार्य होता है, बशर्ते राज्य विधानमंडल द्वारा दी गई राय को मानना संसद के लिए संवैधानिक रूप से सर्वदा बाध्यकारी हो। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय संविधान के भाग IV के अंतर्गत उल्लिखित राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (DPSP) की न्यायसंगतता, प्रवर्तनीयता और विभिन्न अनुच्छेदों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 37 में यह स्पष्ट रूप से उपबंधित किया गया है कि नीति निर्देशक तत्व देश के शासन में मूलभूत हैं और यह राज्य का कर्तव्य होगा कि वह इन तत्वों को कानून बनाने में लागू करे, किंतु ये किसी भी न्यायालय द्वारा न्यायोचित (Non-justiciable) हैं, अर्थात् इन्हें किसी न्यायालय द्वारा प्रवर्तित नहीं कराया जा सकता है। 2. संविधान के अनुच्छेद 39(b) और 39(c) के क्रियान्वयन के लिए बनाई गई विधियों को अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर शून्य घोषित नहीं किया जा सकता, और यह सुरक्षात्मक प्रावधान मूल संविधान में ही अंतर्निहित था जिसे किसी भी संविधान संशोधन द्वारा नहीं जोड़ा गया था। 3. संविधान के अनुच्छेद 48A के अनुसार राज्य, देश के पर्यावरण के संरक्षण और संवर्धन तथा वन और वन्यजीवों की रक्षा करने का प्रयास करेगा, और इस निर्देशक तत्व को 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा संविधान में जोड़ा गया था। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और राज्य लोक सेवा आयोग (SPSC) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 316 के अनुसार संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, जबकि राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति संबंधित राज्य के राज्यपाल द्वारा की जाती है, तथा दोनों ही आयोगों के मामले में यह संवैधानिक अनिवार्यता है कि आयोग के आधे सदस्यों के पास केंद्र या राज्य सरकार के अधीन कम से कम दस वर्ष का प्रशासनिक सेवा का अनुभव होना अनिवार्य है। 2. संविधान के अनुच्छेद 317 के प्रावधानों के अंतर्गत संघ लोक सेवा आयोग या राज्य लोक सेवा आयोग के किसी सदस्य को केवल राष्ट्रपति के आदेश से ही उसके पद से हटाया जा सकता है, भले ही वह राज्य लोक सेवा आयोग का सदस्य क्यों न हो, और राष्ट्रपति ऐसा तब कर सकता है जब उच्चतम न्यायालय द्वारा (अनुच्छेद 145 के तहत राष्ट्रपति द्वारा निर्देशित जांच के पश्चात) दुराचार (Misbehaviour) के आधार पर उसे हटाए जाने की संस्तुति दी गई हो। 3. संविधान के अनुच्छेद 322 के अनुसार संघ लोक सेवा आयोग के व्यय, जिसमें आयोग के सदस्यों या कर्मचारियों को या उनके संबंध में देय कोई वेतन, भत्ते और पेंशन शामिल हैं, भारत की संचित निधि (Consolidated Fund of India) पर भारित (Charged) होते हैं, जबकि राज्य लोक सेवा आयोग के व्यय संबंधित राज्य की संचित निधि पर भारित होते हैं। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय संविधान के अंतर्गत अंतर-राज्यीय परिषद् (Inter-State Council) और केंद्र-राज्यीय प्रशासनिक व वित्तीय संबंधों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 263 के प्रावधानों के तहत राष्ट्रपति को यह शक्ति प्राप्त है कि वह जनहित में अंतर-राज्यीय परिषद् की स्थापना कर सकता है, और इस परिषद् के निर्णयों या सिफारिशों का देश के सभी राज्यों और केंद्र सरकार पर पूर्ण रूप से विधिक और बाध्यकारी (Legally Binding) प्रभाव होता है। 2. पुंछी आयोग (Punchhi Commission, 2007-2010) ने अपनी रिपोर्ट में यह सिफारिश की थी कि अंतर-राज्यीय परिषद् की बैठक वर्ष में कम से कम तीन बार अनिवार्य रूप से आयोजित की जानी चाहिए ताकि केंद्र और राज्यों के बीच प्रभावी समन्वय और नीतिगत संवाद सुनिश्चित हो सके। 3. अनुच्छेद 280 के तहत गठित वित्त आयोग (Finance Commission) भी एक प्रकार का सांविधिक निकाय है जो केंद्र और राज्यों के बीच करों के शुद्ध आगमों के वितरण तथा राज्यों को दी जाने वाली सहायता अनुदान के सिद्धांतों पर राष्ट्रपति को संस्तुतियां देता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → समान कार्य के लिए समान वेतन?
Log in to add to quiz, bookmark, or report issues.