लॉरेंस कोहलबर्ग के नैतिक विकास के सिद्धांत (Theory of Moral Development) के संदर्भ में, 'रूढ़िगत नैतिकता का स्तर' (Conventional Morality) के अंतर्गत आने वाले दोनों चरणों—'अच्छा लड़का-अच्छी लड़की अभिमुखीकरण' (Stage 3) तथा 'कानून और व्यवस्था अभिमुखीकरण' (Stage 4)—के बीच के तात्विक और मनोवैज्ञानिक अंतर का गहन विश्लेषण करने पर, निम्नलिखित में से कौन-सा कथन इन दोनों चरणों की कार्यप्रणाली को सबसे सटीक रूप से परिभाषित करता है?
Detailed Explanation
📌 मुख्य संकल्पना / सिद्धांत:
लॉरेंस कोहलबर्ग के नैतिक विकास के सिद्धांत में 'रूढ़िगत नैतिकता का स्तर' (Conventional Level) लगभग 10 से 13 वर्ष की आयु (किशोरावस्था) के दौरान देखा जाता है। इस स्तर के अंतर्गत आने वाले दो चरण—चरण 3 ('अच्छा लड़का-अच्छी लड़की अभिमुखीकरण') और चरण 4 ('कानून और व्यवस्था अभिमुखीकरण')—समाज के नियमों और अंतःवैयक्तिक संबंधों पर आधारित होते हैं। चरण 3 में व्यक्ति का नैतिक निर्णय इस बात से निर्देशित होता है कि दूसरे लोग उसके बारे में क्या सोचते हैं; यहाँ सामाजिक स्वीकृति, प्रशंसा पाना और 'अच्छा' कहलाना सर्वोपरि होता है। इसके विपरीत, चरण 4 में नैतिकता का दायरा सूक्ष्म संबंधों से आगे बढ़कर वृहद समाज तक पहुँच जाता है। इस चरण में व्यक्ति सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने, नियमों का अक्षरशः पालन करने और कानूनी कर्तव्यों के निर्वहन को अपना सर्वोच्च नैतिक कर्तव्य मानता है। अतः विकल्प (b) इन दोनों चरणों के मध्य के तात्विक और मनोवैज्ञानिक अंतर को सबसे सटीक रूप से परिभाषित करता है।
📊 परीक्षा उपयोगी मुख्य बिंदु:
- चरण 3 (इंटरपर्सनल अकॉर्ड एंड कॉन्फ़ॉर्मिटी): इसे पारस्परिक समझौते का चरण भी कहते हैं जहाँ किशोर सामाजिक संबंधों और आपसी विश्वास को महत्व देते हैं।
- चरण 4 (ऑथॉरिटी एंड सोशल-ऑर्डर मेंटेनिंग): इसमें समाज के कानून, नियम और व्यवस्था सर्वोपरि होती है ताकि अराजकता से बचा जा सके।
- विकल्प (a) गलत है क्योंकि सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांत (Universal Ethical Principles) चरण 6 की विशेषता हैं।
- विकल्प (c) गलत है क्योंकि दंड से बचना पूर्व-रूढ़िगत स्तर (Stage 1) की विशेषता है और अनुबंधात्मक विनिमय चरण 5 से संबंधित है।
- विकल्प (d) गलत है क्योंकि चरण 3 और 4 रूढ़िगत स्तर (Conventional Level) के अंतर्गत आते हैं, उत्तर-रूढ़िगत के नहीं।
📖 सैद्धांतिक संदर्भ: लॉरेंस कोहलबर्ग ने जीन पियाजे के संज्ञानात्मक विकास के विचारों को आगे बढ़ाते हुए नैतिक विकास का त्रि-स्तरीय और छह-चरणों वाला मॉडल प्रतिपादित किया। कोहलबर्ग का सिद्धांत यह स्पष्ट करता है कि जैसे-जैसे बालक का संज्ञानात्मक विकास होता है, वैसे-वैसे उसके नैतिक तर्क का स्तर भी अधिक परिपक्व और समाज-केन्द्रित होता जाता है।
🎯 परीक्षा दृष्टिकोण: CTET / UPTET / BPSC TRE हेतु महत्वपूर्ण विस्तृत हल ➔
गहन विश्लेषण एवं परीक्षा उपयोगी रणनीतियाँ:
शिक्षक पात्रता परीक्षाओं (जैसे CTET, UPTET, DSSSB और BPSC TRE) में कोहलबर्ग के चरणों से जुड़े प्रश्न अक्सर व्यावहारिक परिदृश्यों (Case Studies) पर आधारित होते हैं। उदाहरण के लिए, यदि कोई छात्र कक्षा में इसलिए अनुशासन का पालन करता है ताकि शिक्षक उसकी प्रशंसा करें, तो वह चरण 3 में है। वहीं, यदि छात्र यह मानता है कि नियम तोड़ने से सामाजिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जाएगी इसलिए कानून का पालन करना आवश्यक है, तो वह चरण 4 में है। परीक्षार्थियों को यह ध्यान रखना चाहिए कि रूढ़िगत स्तर पूरी तरह से समाज की स्वीकृतियों और नियमों के इर्द-गिर्द घूमता है, जबकि पूर्व-रूढ़िगत स्तर स्व-हित और उत्तर-रूढ़िगत स्तर व्यक्तिगत अंतःकरण पर आधारित होता है। इन सूक्ष्म अंतःसंबंधों को समझकर ही परीक्षार्थी भ्रमित करने वाले विकल्पों से बच सकते हैं।