लॉरेंस कोहलबर्ग के नैतिक विकास के सिद्धांत (Theory of Moral Development) के अंतर्गत, 'पारंपरिक नैतिकता का स्तर' (Conventional Level) और 'उत्तर-रूढ़िगत नैतिकता का स्तर' (Post-Conventional Level) के बीच के संक्रमण काल (Transition Period) का विश्लेषण करने पर, स्टेज 4 ('कानून और व्यवस्था अभिविन्यास') से स्टेज 5 ('सामाजिक अनुबंध अभिविन्यास') की ओर बढ़ने वाले व्यक्ति की वैचारिक सोच में कौन-सा मौलिक दार्शनिक परिवर्तन देखने को मिलता है?
Detailed Explanation
📌 मुख्य संकल्पना / सिद्धांत:
लॉरेंस कोहलबर्ग के नैतिक विकास के सिद्धांत में 'पारंपरिक नैतिकता' (Conventional Level) से 'उत्तर-रूढ़िगत नैतिकता' (Post-Conventional Level) की ओर संक्रमण काल अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। स्टेज 4 (कानून और व्यवस्था अभिविन्यास) में व्यक्ति यह मानता है कि सामाजिक नियमों, कानूनों और व्यवस्था बनाए रखने वाले प्राधिकरणों का पालन करना ही परम कर्तव्य है, क्योंकि इनसे समाज में स्थिरता बनी रहती है। इसके विपरीत, जब व्यक्ति स्टेज 5 (सामाजिक अनुबंध अभिविन्यास) में प्रवेश करता है, तो उसकी वैचारिक सोच में एक मौलिक दार्शनिक परिवर्तन आता है। वह यह समझने लगता है कि कानून कोई शाश्वत, ईश्वरीय या अकाट्य सत्य नहीं हैं, बल्कि ये मानव-निर्मित सामाजिक अनुबंध (Social Contracts) हैं। यदि कोई कानून समाज के अधिकांश कल्याण या मानवीय अधिकारों के विरुद्ध कार्य करता है, तो उसमें लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से संशोधन किया जा सकता है। विकल्प 'a' इस वैचारिक और दार्शनिक बदलाव का सटीक विश्लेषण करता है।
📊 परीक्षा उपयोगी मुख्य बिंदु:
- कोहलबर्ग के सिद्धांत में कुल 3 स्तर और प्रत्येक स्तर पर 2-2 उप-चरण (कुल 6 चरण) होते हैं।
- स्टेज 4 (कानून और व्यवस्था) रूढ़िगत नैतिकता (Conventional Level) के अंतर्गत आती है, जहाँ सामाजिक व्यवस्था सर्वोपरि होती है।
- स्टेज 5 (सामाजिक अनुबंध) उत्तर-रूढ़िगत नैतिकता (Post-Conventional Level) की शुरुआत है, जहाँ व्यक्ति समाज कल्याण और व्यक्तिगत अधिकारों में संतुलन स्थापित करता है।
- गलत विकल्पों का विश्लेषण: विकल्प 'b' पूर्व-पारंपरिक स्तर के प्रथम चरण (दण्ड और आज्ञाकारिता) से संबंधित है; विकल्प 'c' स्टेज 6 (सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांत अभिविन्यास) का वर्णन करता है; विकल्प 'd' स्टेज 3 (अच्छा लड़का/अच्छी लड़की अभिविन्यास) को दर्शाता है।
📖 सैद्धांतिक संदर्भ: लॉरेंस कोहलबर्ग का यह सिद्धांत जीन पियाजे के नैतिक निर्णय संबंधी विचारों पर आधारित है। इसमें नैतिक दुविधाओं (जैसे हाइंज की दुविधा) के माध्यम से यह अध्ययन किया जाता है कि व्यक्ति विभिन्न आयु वर्गों और संज्ञानात्मक परिपक्वता स्तरों पर कैसे नैतिक निर्णय लेता है। विस्तृत अध्ययन के लिए कोहलबर्ग का सिद्धांत पढ़ें।
🎯 परीक्षा दृष्टिकोण: CTET / UPTET / BPSC TRE हेतु महत्वपूर्ण विस्तृत हल ➔
गहन विश्लेषण एवं परीक्षा उपयोगी रणनीतियाँ:
अक्सर शिक्षक पात्रता परीक्षाओं (जैसे CTET, UPTET, BPSC TRE) में कोहलबर्ग के चरणों के बीच के सूक्ष्म अंतरों और संक्रमण काल (Transition Period) पर आधारित विश्लेषणात्मक प्रश्न पूछे जाते हैं। जब प्रश्न में स्टेज 4 से स्टेज 5 के बदलाव की बात की जाए, तो परीक्षार्थी को यह ध्यान रखना चाहिए कि यहाँ 'अंधानुकरण' या 'प्राधिकरण के प्रति पूर्ण निष्ठा' से हटकर 'लोकतांत्रिक सहभागिता', 'मानव अधिकार' और 'लचीले सामाजिक अनुबंध' की अवधारणा विकसित होती है। ऐसे प्रश्नों को हल करते समय विकल्पों में निहित दार्शनिक गहराई—जैसे नियमों को अपरिवर्तनीय मानने से लेकर उन्हें मानवीय कल्याण के साधन के रूप में देखने के बदलाव—को पहचानना आवश्यक है।