लॉरेंस कोहलबर्ग के नैतिक विकास के सिद्धांत (Moral Development Theory) के अंतर्गत, 'पूर्व-रूढ़िगत नैतिकता के स्तर' (Pre-conventional Level) के प्रथम चरण—'सज़ा और आज्ञाकारिता का अभिमुखीकरण' (Obedience and Punishment Orientation)—और द्वितीय चरण—'सापेक्षवादी-साधन उन्मुखता या व्यक्तिगत लाभ का अभिमुखीकरण' (Instrumental Relativist Orientation)—का सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करने पर, निम्नलिखित में से कौन-सा कथन इन दोनों चरणों के मध्य पाए जाने वाले सबसे मौलिक और तात्विक अंतर को सर्वाधिक प्रामाणिक रूप से स्पष्ट करता है?
Detailed Explanation
📌 मुख्य संकल्पना / सिद्धांत:
लॉरेंस कोहलबर्ग ने नैतिक विकास के सिद्धांत में 'पूर्व-रूढ़िगत नैतिकता' (Pre-conventional Level: जन्म से लगभग 9 वर्ष की आयु) को सबसे शुरुआती चरण माना है। इस स्तर पर बालक के नैतिक निर्णय बाहरी कारकों, परिणामों और वयस्कों के नियंत्रण से संचालित होते हैं। इसके प्रथम चरण 'सज़ा और आज्ञाकारिता का अभिमुखीकरण' में बच्चा किसी भी कार्य को केवल इसलिए सही या गलत मानता है क्योंकि उसे बड़ों या शक्ति संपन्न व्यक्ति द्वारा दंड मिलने का भय होता है। इसके विपरीत, द्वितीय चरण 'सापेक्षवादी-साधन उन्मुखता या व्यक्तिगत लाभ का अभिमुखीकरण' (Instrumental Relativist Orientation / Tit-for-tat) में बालक का दृष्टिकोण अधिक स्वार्थी और विनिमय-आधारित हो जाता है। यहाँ वह अपनी व्यक्तिगत आवश्यकताओं को पूरा करने और 'जैसी करनी वैसी भरनी' या आपसी आदान-प्रदान के लाभ-हानि के गणित के आधार पर नैतिक निर्णय लेता है। अतः विकल्प (b) इन दोनों चरणों के मध्य के मूल अंतर को सटीक रूप से परिभाषित करता है।
📊 परीक्षा उपयोगी मुख्य बिंदु:
- पूर्व-रूढ़िगत स्तर (Pre-conventional): इसमें बालक बाहरी नियमों को अपने लाभ या दंड से बचने के लिए मानता है, न कि सामाजिक मूल्यों के रूप में।
- प्रथम चरण (Punishment-Obedience): नियंत्रण पूरी तरह से दंड से बचने की मजबूरी पर आधारित होता है।
- द्वितीय चरण (Exchange/Instrumental): 'तू मेरी पीठ खुजा, मैं तेरी खुजाऊँगा' (Quid Pro Quo) की भावना और व्यक्तिगत संतुष्टि प्रधान होती है।
- विकल्प विश्लेषण: अन्य विकल्प (a), (c), और (d) गलत हैं क्योंकि वे रूढ़िगत या उत्तर-रूढ़िगत स्तर की विशेषताओं का मिश्रण करते हैं।
📖 सैद्धांतिक संदर्भ: लॉरेंस कोहलबर्ग ने जीन पियाजे के संज्ञानात्मक विकास के विचारों से प्रेरित होकर नैतिक विकास के 3 स्तर और 6 चरणों का प्रतिपादन किया। बाल मनोविज्ञान और शिक्षाशास्त्र में यह सिद्धांत अध्यापन और मूल्य-शिक्षण हेतु अत्यंत महत्वपूर्ण है। अधिक जानकारी के लिए कोहलबर्ग का सिद्धांत पढ़ें।
🎯 परीक्षा दृष्टिकोण: CTET / UPTET / BPSC TRE हेतु महत्वपूर्ण विस्तृत हल ➔
गहन विश्लेषण एवं परीक्षा उपयोगी रणनीतियाँ:
शिक्षक पात्रता परीक्षाओं (CTET, UPTET, DSSSB, BPSC TRE) में कोहलबर्ग के चरणों से जुड़े प्रश्न प्रायः व्यावहारिक परिस्थितियों (Case Studies) या Dilemma के रूप में पूछे जाते हैं। पूर्व-रूढ़िगत स्तर के दोनों चरणों में यह समझना आवश्यक है कि पहला चरण 'दमन और भय' (Fear of punishment) पर टिका है, जबकि दूसरा चरण 'परस्पर आदान-प्रदान' (Reciprocity/Exchange) पर आधारित है। परीक्षा में जब भी 'जैसे को तैसा' या अपने निजी हित की बात आए, तो वह हमेशा दूसरे चरण (Instrumental Purpose Orientation) को इंगित करेगा। ऐसे तार्किक प्रश्नों को हल करते समय बालकों की आयु और उनके संज्ञान की सीमाओं का विशेष ध्यान रखना चाहिए।