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History of India
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तालिकोटा के युद्ध (1565) के बाद विजयनगर साम्राज्य का केंद्र हम्पी से बदलकर कहाँ चला गया?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
तालिकोटा के युद्ध में हार के बाद विजयनगर की राजधानी पेनुकोण्डा स्थानांतरित हो गई थी।
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भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना से लेकर सूरत विभाजन (1907) तक के कालखंड के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. कांग्रेस के प्रारंभिक वर्षों (1885-1905) में नरम दल के नेताओं का यह दृढ़ विश्वास था कि ब्रिटिश शासन न्यायप्रिय है और वे ब्रिटिश संसद के प्रति 'राजभक्ति' रखते हुए प्रार्थना, याचिका और शिष्टमंडल (प्रार्थना और विरोध की राजनीति) के माध्यम से प्रशासनिक सुधार चाहते थे।
2. वर्ष 1905 के बंगाल विभाजन के पश्चात उत्पन्न स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन के दौरान गरम दल के नेताओं (लाल-बाल-पाल और अरबिंदो घोष) ने इस आंदोलन के दायरे को केवल बंगाल तक सीमित रखने और विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार को कलकत्ता तक ही प्रतिबंधित करने का समर्थन किया था।
3. वर्ष 1906 के कलकत्ता अधिवेशन में दादाभाई नौरोजी की अध्यक्षता में कांग्रेस ने पहली बार 'स्वराज' (Self-Government) के प्रस्ताव को अपने मुख्य लक्ष्य के रूप में स्वीकार किया, जिससे नरम और गरम दल के बीच वैचारिक तनाव कुछ समय के लिए टल गया।
4. वर्ष 1907 के सूरत अधिवेशन में कांग्रेस के अध्यक्ष पद के निर्वाचन को लेकर नरम दल और गरम दल के बीच हुए तीव्र मतभेद के कारण पार्टी में औपचारिक विभाजन हो गया, और रासबिहारी घोष को कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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मुगल काल में "चारबाग" (Charbagh) शैली के उद्यानों की परंपरा किसने शुरू की थी?
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चंपारण सत्याग्रह (1917) और असहयोग आंदोलन (1920-22) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. चंपारण सत्याग्रह के दौरान राजकुमार शुक्ल के विशेष आग्रह पर महात्मा गांधी वहाँ पहुँचे थे, जहाँ उन्होंने यूरोपीय नील बागान मालिकों द्वारा किसानों पर थोपी गई 'तीनकठिया' प्रथा के विरुद्ध आवाज उठाई, जिसके तहत किसानों को अपनी कुल भूमि के 3/20 वें हिस्से पर अनिवार्य रूप से नील की खेती करनी होती थी।
2. सरकार द्वारा गठित 'चंपारण कृषि समिति' (Champaran Agrarian Committee) के समक्ष महात्मा गांधी ने यह कड़ा रुख अपनाया कि बागान मालिकों द्वारा किसानों से अवैध रूप से वसूले गए धन का 100 प्रतिशत हिस्सा तत्काल वापस किया जाए, और समिति ने पूर्ण शत-प्रतिशत वापसी की उनकी इस मांग को स्वीकार करते हुए एक भी पैसा कम नहीं किया।
3. वर्ष 1920 में प्रारंभ हुए असहयोग आंदोलन के दौरान नागपुर अधिवेशन में कांग्रेस ने 'शांतिपूर्ण और वैध तरीकों से स्वराज की प्राप्ति' को अपना मुख्य लक्ष्य घोषित किया तथा आंदोलन के सकारात्मक कार्यक्रमों के तहत राष्ट्रीय विद्यालयों और पंचायतों की स्थापना को प्रमुखता दी।
4. चौरी-चौरा कांड (फरवरी 1922) की हिंसक घटना से आहत होकर महात्मा गांधी ने कांग्रेस की कार्य समिति की बैठक में असहयोग आंदोलन को तत्काल प्रभाव से समाप्त करने की घोषणा की, जिससे सुभाष चंद्र बोस और चित्तरंजन दास जैसे युवा नेताओं ने इस निर्णय का पुरजोर समर्थन किया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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वर्ष 1857 के महान विद्रोह की प्रकृति और उसके वैचारिक स्वरूप के संबंध में विभिन्न ब्रिटिश एवं भारतीय इतिहासकारों द्वारा दिए गए प्रसिद्ध मतों तथा कथनों पर विचार कीजिए:
1. इतिहासकार जॉन लॉरेंस और सी. आर. सीले (John Lawrence & Seeley) के अनुसार 1857 का विद्रोह पूर्णतः एक 'सिपाही विद्रोह' (Sepoy Mutiny) मात्र था, जिसका उद्देश्य किसी राष्ट्रीय स्वतंत्रता या जन-आंदोलन का रूप लेना नहीं था, बल्कि यह केवल अनुशासित सैनिकों का अपनी सेना और सरकार के खिलाफ किया गया असंतोष था।
2. ब्रिटिश इतिहासकार टी. आर. होम्स (T. R. Holmes) का मानना था कि 1857 का विद्रोह 'सभ्यता और बर्बरता के बीच का संघर्ष' (Conflict between Civilization and Barbarism) था, जिसमें अंग्रेजों ने आधुनिक सभ्यता और कानून के शासन को बनाए रखने के लिए इस क्रूर विद्रोह का दमन किया था।
3. स्वतंत्रता सेनानी और इतिहासकार विनायक दामोदर सावरकर (V. D. Savarkar) ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'द इंडियन वॉर ऑफ़ इंडिपेंडेंस 1857' में इसे सुनियोजित ढंग से लड़ा गया भारत का 'प्रथम स्वतंत्रता संग्राम' (First War of Indian Independence) घोषित किया था।
4. प्रसिद्ध मार्क्सवादी इतिहासकार एस. एन. सेन (S. N. Sen) ने अपनी आधिकारिक पुस्तक '1857' में यह निष्कर्ष निकाला था कि यह महान विद्रोह राष्ट्रीय स्तर पर अंग्रेजों के विरुद्ध एक सुनियोजित और पूर्व-नियोजित षड्यंत्र था, जिसकी शुरुआत एक धर्मयुद्ध के रूप में हुई और अंततः इसका समापन स्वतंत्रता प्राप्ति के रूप में हुआ।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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मुगलकालीन प्रशासनिक संस्थाओं, राजस्व प्रणालियों और सैन्य संगठनों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अकबर के शासनकाल में राजा टोडरमल द्वारा लागू की गई 'दहसाला' (जब्ती) प्रणाली के अंतर्गत पिछले दस वर्षों के उत्पादन और मूल्यों का औसत निकालकर राजस्व का निर्धारण किया जाता था, तथा इसमें भूमि को पोलज, परती, चाचर और बंजर श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया था।
2. जहाँगाड़ी काल में मनसबदारी व्यवस्था के अंतर्गत 'दुअस्पा-सिंहअस्पा' प्रणाली की शुरुआत की गई थी, जिसके माध्यम से बिना मनसबदार के जात पद (zat rank) में वृद्धि किए उसके सवार पद (sawar rank) को बढ़ाया जा सकता था और सैनिकों की संख्या दोगुनी की जा सकती थी।
3. शाहजहां के शासनकाल में साम्राज्य की आर्थिक स्थिति के आकलन के लिए 'महीना-वेतन' (Month-scale) प्रणाली को और अधिक जटिल बनाया गया, जिसके तहत यदि जागीर से प्राप्त होने वाली आय अनुमानित आय (जमा) का केवल आधी प्राप्त होती थी, तो उसे 'شش ماهہ' (छः माही) या तदनुरूप श्रेणियों में रखा जाता था।
4. औरंगजेब के शासनकाल में मराठों और दक्षिण भारत के राज्यों के विरुद्ध सैन्य अभियानों की अत्यधिक व्यस्तता के कारण जागीरों की भारी कमी ('पैवस्ती' या जागीर संकट) उत्पन्न हो गई थी, जिसके कारण खाली पड़ी खालसा भूमि को मनसबदारों को जागीर के रूप में आवंटित करने की प्रथा को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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