संज्ञानात्मक विकास
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जेरोम ब्रूनर (Jerome Bruner) के 'संज्ञानात्मक विकास और खोजपूर्ण अधिगम सिद्धांत' (Theory of Cognitive Development and Discovery Learning) के अंतर्गत प्रतिपादित एक अत्यंत महत्वपूर्ण और केंद्रीय संप्रत्यय—'सर्पिलाकार पाठ्यक्रम' (Spiral Curriculum)—जिसे उस शैक्षिक डिज़ाइन और पाठ्यक्रम रूपरेखा के रूप में परिभाषित किया जाता है जिसके अंतर्गत किसी कठिन या जटिल विषय-वस्तु या संप्रत्यय को विद्यार्थियों के सामने उनके प्रारंभिक विकास चरणों में सरल और मूर्त रूप में प्रस्तुत किया जाता है, और फिर जैसे-जैसे शिक्षार्थी की आयु, परिपक्वता और संज्ञानात्मक स्तर में वृद्धि होती है, उसी विषय को क्रमिक रूप से अधिक अमूर्त, विस्तृत और उच्च स्तर पर बार-बार पुनरावृत्ति के साथ प्रस्तुत किया जाता है—के वास्तविक मनोवैज्ञानिक निहितार्थ एवं कक्षा-कक्षीय शिक्षण में विद्यार्थियों के पूर्व-ज्ञान के सुदृढ़ीकरण, संचित स्कीमा के विकास और अमूर्त चिंतन के वैज्ञानिक संचालन के संबंध में निम्नलिखित में से कौन सा मनोवैज्ञानिक कथन सबसे अधिक प्रामाणिक और वैज्ञानिक रूप से मान्य है?
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Detailed Explanation
जेरोम ब्रूनर (Jerome Bruner) के 'सर्पिलाकार पाठ्यक्रम' (Spiral Curriculum) का मुख्य आधार यह है कि एक ही विषय या संप्रत्यय को विद्यार्थी के शैक्षिक जीवन के विभिन्न चरणों में उसकी बदलती हुई संज्ञानात्मक क्षमताओं (क्रियात्मक, प्रतीकात्मक और संकेतात्मक अवस्थाओं) के अनुसार क्रमिक रूप से अधिक जटिल और अमूर्त रूप में पढ़ाया जाना चाहिए। ब्रूनर का यह प्रसिद्ध कथन है कि 'किसी भी विषय को किसी भी बच्चे को बौद्धिक रूप से ईमानदार रूप में किसी भी विकास चरण में प्रभावी ढंग से सिखाया जा सकता है।' यह विधि बच्चों के पूर्व-ज्ञान को आधार बनाकर नए ज्ञान के साथ उसके संयोजन (Integration) और स्कीमा के सुदृढ़ीकरण में सहायक होती है। अतः विकल्प (b) इस संप्रत्यय के मनोवैज्ञानिक निहितार्थ को सबसे अधिक प्रामाणिक रूप से स्पष्ट करता है।
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जेरोम ब्रूनर (Jerome Bruner) के 'संज्ञानात्मक विकास और खोजपूर्ण अधिगम सिद्धांत' (Theory of Cognitive Development and Discovery Learning) के अंतर्गत प्रतिपादित एक अत्यंत महत्वपूर्ण और केंद्रीय संप्रत्यय—'स्पिरल करिकुलम या चक्राकार पाठ्यक्रम' (Spiral Curriculum)—जिसे उस शैक्षणिक और पाठ्यक्रम डिजाइन उपागम के रूप में परिभाषित किया जाता है जिसके अंतर्गत किसी भी कठिन या जटिल विषय-वस्तु को बालक के प्रारंभिक विकास स्तर पर बहुत सरल, सहज और मूर्त रूप (प्रतीकात्मक या क्रियात्मक रूप में) में प्रस्तुत किया जाता है और जैसे-जैसे बालक की आयु, परिपक्वता और संज्ञानात्मक स्तर बढ़ता जाता है, उसी विषय-वस्तु को बार-बार अधिक गहराई, व्यापकता, अमूर्तता और उच्च तार्किक जटिलता के साथ पुनरावृत्त (Revisited) किया जाता है—के वास्तविक मनोवैज्ञानिक निहितार्थ एवं कक्षा-कक्षीय शिक्षण में विद्यार्थियों के संचयी ज्ञान निर्माण, अमूर्त चिंतन और अवधारणात्मक स्थिरता के वैज्ञानिक संचालन के संबंध में निम्नलिखित में से कौन सा मनोवैज्ञानिक कथन सबसे अधिक प्रामाणिक और वैज्ञानिक रूप से मान्य है?
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