History of India
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सिंधु घाटी सभ्यता (Harappan Civilization) की सामाजिक संरचना, धार्मिक विश्वासों और अर्थव्यवस्था के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. सिंधु सभ्यता की मुहरों (Seals) पर सबसे अधिक बार एक काल्पनिक एकसिंगी पशु (Unicorn) का अंकन मिलता है, जिसके बाद कुबड़ वाले सांड (Humped Bull) का स्थान आता है।
- 2. लोथल और कालीबंगा दोनों ही सैंधव स्थलों से अग्नि वेदियाँ (Fire Altars) या हवन कुंड के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं, जो यहाँ के लोगों द्वारा किसी प्रकार के अनुष्ठान या सार्वजनिक यज्ञ किए जाने का संकेत देते हैं।
- 3. सिंधु घाटी सभ्यता के लोग लोहे की विभिन्न तकनीकों और शस्त्र निर्माण से पूरी तरह परिचित थे, जिसका प्रमाण कालीबंगा और हड़प्पा से प्राप्त बड़े पैमाने पर लोहे के अस्त्र-शस्त्रों से मिलता है।
- 4. इस सभ्यता में मातृसत्तात्मक समाज के संकेत मिलते हैं क्योंकि यहाँ से बड़ी संख्या में पकी हुई मिट्टी (Terracotta) की बनी मातृदेवी की मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: सिंधु घाटी सभ्यता की मुहरों पर सबसे अधिक बार एकसिंगी पशु (Unicorn) का अंकन मिलता है, और उसके पश्चात कुबड़ वाले सांड (Humped Bull) का चित्रांकन सर्वाधिक है। कथन 2 सही है: लोथल और कालीबंगा दोनों ही प्रमुख पुरास्थलों से अग्निकुंड या अग्नि वेदियाँ (Fire Altars) मिली हैं, जो संभवतः धार्मिक अनुष्ठानों या यज्ञ से जुड़ी थीं। कथन 3 गलत है: सिंधु घाटी सभ्यता के लोग ताँबे और काँसे (Bronze) के प्रयोग से परिचित थे, किंतु वे **लोहे** के उत्पादन और उसके उपयोग से पूर्णतः अनभिज्ञ थे। भारत में लोहे का प्रारंभिक साक्ष्य उत्तर-वैदिक काल (लगभग 1000 ईसा पूर्व) के आसपास अतरंजीखेड़ा से मिलता है। कथन 4 सही है: बड़ी संख्या में टेराकोटा की मातृदेवी की मूर्तियाँ मिलने के कारण इतिहासकारों का मानना है कि सैंधव समाज में मातृदेवी की पूजा प्रमुख थी और संभवतः समाज मातृसत्तात्मक प्रकृति का था। अधिक जानकारी के लिए आप विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
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ब्रिटिश भारत में लागू की गई विभिन्न भू-राजस्व प्रणालियों — स्थाई बंदोबस्त, रयतवारी और महालवारी — के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. बंगाल, बिहार और उड़ीसा में लॉर्ड कॉर्नवालिस द्वारा 1793 में लागू 'स्थाई बंदोबस्त' के तहत जमींदारों को भूमि का स्थायी स्वामी मान लिया गया, किंतु राजस्व की मांग इतनी कठोर थी कि यदि निर्धारित सूर्यास्त तक भू-राजस्व जमा नहीं किया जाता था, तो जमींदारी का एक हिस्सा नीलाम कर दिया जाता था, जिसे 'सूर्यास्त कानून' (Sunset Law) कहा जाता था।
2. थॉमस मुनरो और कैप्टन रीड द्वारा मद्रास और बंबई प्रेसीडेंसी के कुछ हिस्सों में विकसित 'रयतवारी व्यवस्था' में सरकार और किसान (रयत) के बीच सीधा समझौता होता था, जिसमें राजस्व निर्धारण भूमि की उर्वरता के आधार पर 20 से 30 वर्षों के लिए निश्चित किया जाता था, और सरकार को सीधे कर भुगतान करने के कारण किसान भूमि के वास्तविक स्वामी बन गए जिन्हें कभी बेदखल नहीं किया जा सकता था।
3. हॉल्ट मैकेंजी द्वारा प्रतिपादित और उत्तर-पश्चिम प्रांत, मध्य भारत तथा पंजाब में लागू 'महालवारी व्यवस्था' के अंतर्गत भू-राजस्व का निर्धारण व्यक्तिगत किसान के स्तर पर न करके संपूर्ण ग्राम (महाल) या ग्राम समुदाय के साथ सामूहिक रूप से किया जाता था, और लगान अदायगी की सामूहिक जिम्मेदारी पूरे ग्राम समुदाय की होती थी।
4. इन तीनों भू-राजस्व प्रणालियों के लागू होने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में मुद्रा अर्थव्यवस्था (Monetization) का विस्तार हुआ, जिसके फलस्वरूप कृषि का बड़े पैमाने पर व्यावसायीकरण हुआ और किसानों को खाद्यान्न फसलों के स्थान पर कपास, नील और जूट जैसी नकदी फसलों के उत्पादन के लिए बाध्य होना पड़ा।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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बौद्ध धर्म और जैन धर्म के दार्शनिक सिद्धांतों तथा उनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. जैन धर्म के 'स्यादवाद' (अनेकांतवाद) के विपरीत, महात्मा बुद्ध ने संसार की वास्तविक प्रकृति को समझाने के लिए 'प्रतीत्यसमुत्पाद' (कारण-कार्य का सिद्धांत) का प्रतिपादन किया, जिसके अनुसार प्रत्येक घटना का कोई न कोई कारण अवश्य होता है।
2. प्रारंभिक बौद्ध धर्म और जैन धर्म दोनों ने ही वेदों की सर्वोच्चता और प्रामाणिकता को स्पष्ट रूप से अस्वीकार किया था, किंतु दोनों ने ही वैदिक यज्ञों और पशुबलि की प्रथा का पुरजोर समर्थन किया था।
3. जैन धर्म में मोक्ष प्राप्ति के लिए शरीर को अत्यंत कष्ट देने (संलेखना या कायाक्लेश) पर विशेष बल दिया गया है, जबकि महात्मा बुद्ध ने कठोर तपस्या और विलासिता के बीच का मार्ग चुनते हुए 'मध्यम मार्ग' (मज्झिमा प्रतिपदा) का उपदेश दिया था।
4. जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी ने अहिंसा के सिद्धांत को इतना कठोर बनाया कि कृषि कार्य को भी पाप माना गया, जबकि बुद्ध ने अपनी संघ व्यवस्था में कभी भी कृषि या व्यापार को वर्जित नहीं किया और भिक्षुओं को साधारण जीवन जीने की सलाह दी।
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पल्लव राजवंश और चालुक्य राजवंश के संघर्ष, प्रशासनिक व्यवस्था तथा सांस्कृतिक उपलब्धियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. पल्लव शासक महेंद्रवर्मन प्रथम ने अपने प्रारंभिक जीवन में जैन धर्म का आश्रय लिया था, किंतु प्रसिद्ध तमिल संत अप्पर (तिरुनावुक्करासर) के प्रभाव में आकर उसने शैव धर्म स्वीकार कर लिया और महाबलीपुरम में प्रसिद्ध एकश्म (Monolithic) 'रथ मंदिरों' का निर्माण प्रारंभ करवाया।
2. बादामी के चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय ने नर्मदा नदी के तट पर हर्षवर्धन को निर्णायक रूप से पराजित किया था, जिसका सजीव और विस्तृत वर्णन रवि कीर्ति द्वारा रचित 'ऐहोले प्रशस्ति' में मिलता है।
3. पल्लव काल में ग्राम प्रशासन की देखरेख के लिए 'सभा' और 'उर' जैसी स्वायत्त संस्थाएँ थीं, जिनमें 'सभा' मुख्य रूप से ब्राह्मणों को दान में दिए जाने वाले 'ब्रह्मदेय' गाँवों की सभा होती थी, और इसके सदस्यों के चयन के लिए 'कुडुवोलै' (घड़ा प्रणाली) नामक गुप्त मतदान पद्धति का प्रयोग किया जाता था।
4. बादामी के चालुक्यों की प्रशासनिक व्यवस्था में शासन का विकेंद्रीकरण देखा जाता है जहाँ प्रांतों को 'विषय' और 'राष्ट्र' कहा जाता था, तथा प्रशासन के संचालन में महिलाओं को भी उच्च प्रशासनिक पदों और राज्यपाल के दायित्वों का निर्वहन करने का अवसर दिया जाता था।
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सिंधु घाटी सभ्यता (Harappan Civilization) की परिपक्व अवस्था और उसकी विशिष्ट नगर योजना (Town Planning), आर्थिक गतिविधियों तथा शिल्प-विशेषज्ञता के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. सिंधु सभ्यता के नगरों में आमतौर पर 'ग्रिड पद्धति' (Grid System) पर आधारित सड़क विन्यास देखा जाता है, जहाँ मुख्य सड़कें एक-दूसरे को समकोण (Right Angles) पर काटती थीं और शहर को आयताकार या वर्गाकार खंडों में विभाजित करती थीं।
2. मोहनजोदड़ो से प्राप्त 'विशाल स्नानागार' (Great Bath) का उपयोग संभवतः किसी विशेष अनुष्ठानिक या धार्मिक स्नान के लिए किया जाता था, जिसके उत्तर और दक्षिण दोनों सिरों पर सीढ़ियाँ बनी हुई थीं और इसके जल को रिसने से रोकने के लिए बिटुमिन (Bitumen) की परत का उपयोग किया गया था।
3. लोथल और चान्हूदड़ो जैसे स्थलों पर मनके बनाने (Bead Making) के कारखाने मिले हैं, जहाँ तांबे और काँसे के औजारों के अलावा अकीक (Carnelian), जैस्पर, शंख और सेलखड़ी (Steatite) जैसे कीमती पत्थरों का उपयोग करके आभूषणों का निर्माण किया जाता था।
4. सिंधु घाटी सभ्यता के लोग लोहे के उत्पादन और उसके सामरिक उपयोग से भली-भांति परिचित थे, यही कारण है कि यहाँ के पुरास्थलों से बड़े पैमाने पर लोहे के अस्त्र-शस्त्र और कृषि उपकरण प्राप्त हुए हैं।
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मुगल काल में "खुलासत-उत-तवारीख" के लेखक कौन हैं?
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महाभारत का फारसी अनुवाद "रज़्मनामा" किसके निर्देशन में किया गया था?
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