History of India
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सत्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भारत में यूरोपीय कंपनियों के व्यापारिक विस्तार और पुर्तगाली-ब्रिटिश संघर्ष के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. वर्ष 1661 में पुर्तगाल की राजकुमारी कैथरीन ऑफ ब्रैगांज़ा का विवाह ब्रिटेन के राजा चार्ल्स द्वितीय के साथ होने पर, पुर्तगालियों ने बॉम्बे (मुंबई) द्वीप को दहेज के रूप में ब्रिटिश ताज को सौंप दिया था, जिसे बाद में ब्रिटिश सम्राट ने ईस्ट इंडिया कंपनी को मात्र 10 पाउंड के वार्षिक किराए पर दे दिया था।
- 2. ब्रिटिश ईस्ट India कंपनी ने बंगाल में अपनी प्रथम व्यावसायिक कोठी की स्थापना वर्ष 1651 में शाहशुजा की अनुमति से हुगली में की थी, और वर्ष 1690 में जॉब चारनाक द्वारा कलकत्ता (सुतानाती, कालिकाट और गोविंदपुर) की नींव रखे जाने से पहले ही अंग्रेजों ने बॉम्बे को अपनी मुख्य प्रेसीडेंसी बना लिया था।
- 3. पुर्तगालियों द्वारा भारतीय समुद्रों में लागू की जाने वाली 'कार्टाज' (Cartaz) व्यवस्था के अंतर्गत एशियाई जहाजों को पुर्तगाली बंदरगाहों से अनुज्ञा पत्र लेना अनिवार्य था, और अफीम, मसालों तथा गोला-बारूद जैसे चुनिंदा सामानों के व्यापार पर पुर्तगाली क्राउन का एकाधिकार था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है क्योंकि 1661 के विवाह समझौते के तहत बॉम्बे अंग्रेजों को दहेज में मिला और 1668 में चार्ल्स द्वितीय ने इसे ईस्ट इंडिया कंपनी को 10 पाउंड वार्षिक किराए पर दे दिया था। कथन 2 गलत है क्योंकि 1651 में हुगली में कोठी अवश्य बनी थी, किंतु बॉम्बे को सूरत के स्थान पर पश्चिमी प्रेसीडेंसी का मुख्यालय वर्ष 1687 में बनाया गया था, न कि कलकत्ता की स्थापना से पहले बॉम्बे मुख्य प्रेसीडेंसी बन गया था (बॉम्बे को सूरत के बाद स्थानांतरित किया गया)। कथन 3 सही है; पुर्तगाली भारत में 'कार्टाज' प्रणाली के तहत नौवहन लाइसेंस जारी करते थे और कुछ विशेष वस्तुओं (जैसे अफीम और गोला-बारूद) का व्यापार पूरी तरह अपने नियंत्रण में रखते थे। अधिक जानकारी के लिए विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
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बौद्ध धर्म और जैन धर्म के दार्शनिक सिद्धांतों तथा उनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. जैन धर्म के 'स्यादवाद' (अनेकांतवाद) के विपरीत, महात्मा बुद्ध ने संसार की वास्तविक प्रकृति को समझाने के लिए 'प्रतीत्यसमुत्पाद' (कारण-कार्य का सिद्धांत) का प्रतिपादन किया, जिसके अनुसार प्रत्येक घटना का कोई न कोई कारण अवश्य होता है।
2. प्रारंभिक बौद्ध धर्म और जैन धर्म दोनों ने ही वेदों की सर्वोच्चता और प्रामाणिकता को स्पष्ट रूप से अस्वीकार किया था, किंतु दोनों ने ही वैदिक यज्ञों और पशुबलि की प्रथा का पुरजोर समर्थन किया था।
3. जैन धर्म में मोक्ष प्राप्ति के लिए शरीर को अत्यंत कष्ट देने (संलेखना या कायाक्लेश) पर विशेष बल दिया गया है, जबकि महात्मा बुद्ध ने कठोर तपस्या और विलासिता के बीच का मार्ग चुनते हुए 'मध्यम मार्ग' (मज्झिमा प्रतिपदा) का उपदेश दिया था।
4. जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी ने अहिंसा के सिद्धांत को इतना कठोर बनाया कि कृषि कार्य को भी पाप माना गया, जबकि बुद्ध ने अपनी संघ व्यवस्था में कभी भी कृषि या व्यापार को वर्जित नहीं किया और भिक्षुओं को साधारण जीवन जीने की सलाह दी।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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वर्ष 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान दिल्ली में विद्रोह के नेतृत्व और मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर की स्थिति के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मेरठ से आए विद्रोही सैनिकों ने 11 मई 1857 को दिल्ली पहुंचकर मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर को भारत का 'शहनशाह-ए-हिंद' (सम्राट) घोषित किया, जिससे इस विद्रोह को एक अखिल भारतीय वैधता और प्रतीकात्मक नेतृत्व प्राप्त हुआ।
2. यद्यपि बहादुर शाह जफर को विद्रोह का औपचारिक और सर्वोच्च नेता बनाया गया था, किंतु उनकी आयु अधिक होने के कारण वास्तविक सैन्य कमान और निर्णय लेने की शक्ति उनके मुख्य सेनापति जनरल बख्त खान के नेतृत्व में बनी 'सैन्य अदालत' (Court of Administrators) के हाथों में थी।
3. दिल्ली पर पुन: अधिकार करने के लिए ब्रिटिश सेना का नेतृत्व करने वाले जनरल निकोलसन और हडसन थे, जिन्होंने कश्मीरी गेट पर भीषण संघर्ष के बाद शहर को जीता और सम्राट के बेटों (मिर्जा मुगल और खिज्र सुल्तान) को गिरफ्तार कर हडसन द्वारा सरेआम गोली मार दी गई।
4. दिल्ली के पतन के उपरांत बहादुर शाह जफर को हुमायं के मकबरे से गिरफ्तार कर रंगून (बर्मा) निर्वासित कर दिया गया, जहाँ वर्ष 1862 में उनका निधन हो गया, और उनके साथ ही भारत में लगभग तीन शताब्दियों से अधिक समय से चले आ रहे मुगल साम्राज्य का औपचारिक अंत हो गया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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वर्ष 1857 के महान विद्रोह की असफलता और इसके नेतृत्व की कमियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इस महान विद्रोह के पास कोई अखिल भारतीय स्तर पर सुनियोजित योजना, केंद्रीय उच्च कमान, आधुनिक सैन्य तकनीक और एक स्पष्ट वैकल्पिक राजनीतिक दृष्टिकोण का पूर्ण अभाव था।
2. देश के अधिकांश बड़े, मध्यम और प्रभावशाली भारतीय शासकों तथा रियासतों (जैसे हैदराबाद के निजाम, ग्वालियर के सिंधिया, भोपाल की बेगम, नेपाल के जंगबहादुर और इंदौर के होलकर) ने विद्रोही ताकतों का समर्थन करने के बजाय अंग्रेजों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सैन्य और कूटनीतिक सहायता प्रदान की।
3. आधुनिक पश्चिमी शिक्षा प्राप्त भारतीय मध्यम वर्ग, बुद्धिजीवियों और व्यापारियों ने 1857 के विद्रोह का सक्रिय रूप से समर्थन किया क्योंकि वे ब्रिटिश राज के आर्थिक और सामाजिक सुधारों से पूरी तरह संतुष्ट थे।
4. मुगल सम्राट बहादुर शाह द्वितीय को विद्रोह का प्रतीकात्मक नेता घोषित तो किया गया था, किंतु उनके पास न तो वास्तविक सैन्य अधिकार थे और न ही उम्र व अनुभव के अनुकूल दूरदर्शी नेतृत्व क्षमता, जिसके कारण विद्रोही सैनिकों में आवश्यक अनुशासन और सामंजस्य का अभाव रहा।
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पल्लव राजवंश और चालुक्य राजवंश के संघर्ष, प्रशासनिक व्यवस्था तथा सांस्कृतिक उपलब्धियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. पल्लव शासक महेंद्रवर्मन प्रथम ने अपने प्रारंभिक जीवन में जैन धर्म का आश्रय लिया था, किंतु प्रसिद्ध तमिल संत अप्पर (तिरुनावुक्करासर) के प्रभाव में आकर उसने शैव धर्म स्वीकार कर लिया और महाबलीपुरम में प्रसिद्ध एकश्म (Monolithic) 'रथ मंदिरों' का निर्माण प्रारंभ करवाया।
2. बादामी के चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय ने नर्मदा नदी के तट पर हर्षवर्धन को निर्णायक रूप से पराजित किया था, जिसका सजीव और विस्तृत वर्णन रवि कीर्ति द्वारा रचित 'ऐहोले प्रशस्ति' में मिलता है।
3. पल्लव काल में ग्राम प्रशासन की देखरेख के लिए 'सभा' और 'उर' जैसी स्वायत्त संस्थाएँ थीं, जिनमें 'सभा' मुख्य रूप से ब्राह्मणों को दान में दिए जाने वाले 'ब्रह्मदेय' गाँवों की सभा होती थी, और इसके सदस्यों के चयन के लिए 'कुडुवोलै' (घड़ा प्रणाली) नामक गुप्त मतदान पद्धति का प्रयोग किया जाता था।
4. बादामी के चालुक्यों की प्रशासनिक व्यवस्था में शासन का विकेंद्रीकरण देखा जाता है जहाँ प्रांतों को 'विषय' और 'राष्ट्र' कहा जाता था, तथा प्रशासन के संचालन में महिलाओं को भी उच्च प्रशासनिक पदों और राज्यपाल के दायित्वों का निर्वहन करने का अवसर दिया जाता था।
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मुगल काल में "खुलासत-उत-तवारीख" के लेखक कौन हैं?
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महाभारत का फारसी अनुवाद "रज़्मनामा" किसके निर्देशन में किया गया था?
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