'बाल विकास एवं शिक्षाशास्त्र' के अंतर्गत 'लॉरेंस कोहलबर्ग के नैतिक विकास का सिद्धांत' (Theory of Moral Development) के संदर्भ में, कोहलबर्ग द्वारा प्रतिपादित नैतिक विकास के तीन प्रमुख स्तरों और उनके अंतर्गत छह अवस्थाओं में से 'उत्तर-रूढ़िगत स्तर' (Post-Conventional Morality) के अंतर्गत आने वाली दोनों अवस्थाओं—अर्थात 'सामाजिक अनुबंध और व्यक्तिगत अधिकार' (Social Contract and Individual Rights) तथा 'सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांत' (Universal Ethical Principles)—की दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक एवं तार्किक विशेषताओं के संबंध में निम्नलिखित में से कौन सा कथन सर्वाधिक उपयुक्त एवं सत्य है?
Detailed Explanation
📌 मुख्य संकल्पना / सिद्धांत:
लॉरेंस कोहलबर्ग का नैतिक विकास का सिद्धांत बाल विकास और शिक्षाशास्त्र का एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्तंभ है। कोहलबर्ग ने नैतिक विकास को तीन प्रमुख स्तरों—पूर्व-रूढ़िगत, रूढ़िगत और उत्तर-रूढ़िगत स्तर—में विभाजित किया है, और प्रत्येक स्तर पर दो-दो अवस्थाएँ दी हैं। इस प्रकार कुल छह अवस्थाएँ होती हैं। 'उत्तर-रूढ़िगत स्तर' (Post-Conventional Morality) इस सिद्धांत का सर्वोच्च स्तर है, जिसमें व्यक्ति बाह्य सामाजिक दबावों, नियमों या परंपराओं से ऊपर उठकर अपने स्वयं के आंतरिक विवेक और सार्वभौमिक मानवीय मूल्यों के आधार पर नैतिक निर्णय लेता है। इस स्तर के अंतर्गत आने वाली पाँचवीं अवस्था 'सामाजिक अनुबंध और व्यक्तिगत अधिकार' (Social Contract and Individual Rights) है, जहाँ व्यक्ति यह समझता है कि कानून सामाजिक कल्याण के लिए आपसी सहमति से बनाए गए एक लचीले समझौते हैं, जिन्हें जनहित में बदला भी जा सकता है। इसके विपरीत, छठी और अंतिम अवस्था 'सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांत' (Universal Ethical Principles) है, जिसमें व्यक्ति कानून या सामाजिक नियमों से परे जाकर अपने व्यक्तिगत विवेक, न्याय, मानवाधिकारों और सार्वभौमिक अंतरात्मा के आंतरिक सिद्धांतों के अनुसार कार्य करता है, भले ही इसके लिए उसे कानून का विरोध क्यों न करना पड़े। अतः विकल्प (b) इन दोनों अवस्थाओं की मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक विशेषताओं का बिल्कुल सही और सटीक वर्णन करता है।
📊 परीक्षा उपयोगी मुख्य बिंदु:
- पाँचवीं अवस्था (Social Contract): कानून को अपरिवर्तनीय नहीं बल्कि लोकतांत्रिक सहमति और सामाजिक कल्याण का साधन माना जाता है।
- छठी अवस्था (Universal Principles): व्यक्ति सार्वभौमिक न्याय, आत्म-विवेक और उच्च नैतिक सिद्धांतों से निर्देशित होता है (उदा. महात्मा गांधी, मार्टिन लूथर किंग जूनियर)।
- विकल्प (a) का खंडन: कानून को अटल और अपरिवर्तनीय मानना चौथी अवस्था (कानून और व्यवस्था) की विशेषता है, न कि पाँचवीं अवस्था की।
- विकल्प (c) का खंडन: बाह्य पुरस्कार, दंड और 'अच्छा लड़का/अच्छी लड़की' अभिविन्यास पूर्व-रूढ़िगत और रूढ़िगत स्तरों के लक्षण हैं, जो उत्तर-रूढ़िगत स्तर से संबंधित नहीं हैं।
- विकल्प (d) का खंडन: 'कानून और व्यवस्था अभिविन्यास' कोहलबर्ग के रूढ़िगत स्तर की चौथी अवस्था है, न कि उत्तर-रूढ़िगत स्तर की छठी अवस्था।
📖 सैद्धांतिक संदर्भ: लॉरेंस कोहलबर्ग ने जीन पियाजे के संज्ञानात्मक विकास के विचारों से प्रेरणा लेते हुए 'हेंज की दुविधा' (Heinz's Dilemma) के माध्यम से नैतिक विकास के चरणों का प्रतिपादन किया। यह सिद्धांत बाल मनोविज्ञान में बच्चों के नैतिक तर्क (Moral Reasoning) को समझने के लिए केंद्रीय भूमिका निभाता है। अधिक जानकारी के लिए कोहलबर्ग का सिद्धांत पढ़ सकते हैं।
🎯 परीक्षा दृष्टिकोण: CTET / UPTET / BPSC TRE हेतु महत्वपूर्ण विस्तृत हल ➔
गहन विश्लेषण एवं परीक्षा उपयोगी रणनीतियाँ:
शिक्षक पात्रता परीक्षाओं (जैसे CTET, UPTET, KVS, और BPSC TRE) में कोहलबर्ग के चरणों से अक्सर अनुप्रयोग-आधारित प्रश्न पूछे जाते हैं। परीक्षार्थियों को यह ध्यान रखना चाहिए कि उत्तर-रूढ़िगत स्तर में नैतिकता का आधार बाह्य कारक (जैसे समाज, पुरस्कार, या पुलिस का डर) न होकर आंतरिक स्वायत्तता (Autonomous Morality) होता है। जब भी प्रश्न में सामाजिक अनुबंध या सार्वभौमिक न्याय की बात आए, तो हमेशा उत्तर-रूढ़िगत स्तर (Post-Conventional Level) को ही सही उत्तर के रूप में चुनें। इसके अलावा, डिस्ट्रेक्टर (Distractors) को पहचानना सीखें—जैसे 'कानून और व्यवस्था' हमेशा रूढ़िगत स्तर (Conventional Level) का हिस्सा होती है, जबकि 'अच्छा लड़का/लड़की' तीसरी अवस्था होती है। ऐसे तार्किक अंतरों को समझकर ही परीक्षार्थी परीक्षा में नकारात्मक अंकों से बच सकते हैं और शत-प्रतिशत सही उत्तर प्राप्त कर सकते हैं।