शिक्षण में 'विद्यार्थी-केंद्रित' (Student-Centered) दृष्टिकोण क्या है?
विद्यार्थी-केंद्रित दृष्टिकोण में शिक्षण को छात्र की व्यक्तिगत आवश्यकताओं, क्षमताओं और रुचियों के अनुरूप तैयार किया जाता है।
कोहलबर्ग के 'नैतिक विकास' (Moral Development) सिद्धांत के अनुसार, 'दंड-आज्ञाकारिता' (Punishment-Obedience) किस स्तर की विशेषता है?
पूर्व-परंपरागत स्तर (प्रथम चरण) पर बच्चा नैतिकता का पालन केवल दंड से बचने के लिए करता है।
अधिगम के किस सिद्धांत में 'अंतर्दृष्टि' (Insight) का वर्णन गेस्टाल्ट मनोवैज्ञानिकों द्वारा किया गया है?
वोल्फगैंग कोहलर ने गेस्टाल्ट सिद्धांत में यह स्पष्ट किया कि सीखना अचानक सूझ या अंतर्दृष्टि (Insight) द्वारा होता है।
पियाजे के अनुसार, 'मूर्त-संक्रियात्मक अवस्था' (Concrete Operational Stage) में बच्चे की मुख्य तार्किक क्षमता क्या है?
मूर्त-संक्रियात्मक अवस्था (7-11 वर्ष) में बच्चा वस्तुओं को उनके आकार या भार के आधार पर क्रमबद्ध (Seriation) करने में सक्षम हो जाता है।
कक्षा में 'सक्रिय अधिगम' (Active Learning) को बढ़ावा देने के लिए सबसे अच्छी विधि कौन सी है?
समस्या-समाधान विधि में छात्र स्वयं सक्रिय होकर तर्क करते हैं और समाधान निकालते हैं, जो सक्रिय अधिगम का मुख्य आधार है।
शिक्षण में 'निदानात्मक परीक्षण' (Diagnostic Test) का सबसे बड़ा लाभ क्या है?
निदानात्मक परीक्षण का मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना है कि छात्र कहाँ गलती कर रहे हैं ताकि उन्हें सही शैक्षिक सहायता दी जा सके।
वाइगोत्सकी के अनुसार, 'निजी वाक' (Private Speech) का अधिगम में क्या कार्य है?
वाइगोत्सकी के अनुसार, बच्चा अपने कार्यों को निर्देशित और विनियमित करने के लिए निजी वाक (स्वयं से बात करना) का सहारा लेता है।
अधिगम के 'क्षेत्र सिद्धांत' (Field Theory) के प्रतिपादक कौन हैं?
कुर्ट लेविन का 'क्षेत्र सिद्धांत' यह बताता है कि अधिगम व्यक्ति के 'जीवन क्षेत्र' (Life Space) और उसके पर्यावरण के बीच की अंतःक्रिया का परिणाम है।
कोहलबर्ग के अनुसार, 'उत्तर-परंपरागत स्तर' (Post-Conventional Level) की मुख्य विशेषता क्या है?
उत्तर-परंपरागत स्तर पर व्यक्ति सामाजिक नियमों से ऊपर उठकर अपने स्वयं के नैतिक सिद्धांतों (विवेक) के आधार पर निर्णय लेता है।
शिक्षण प्रक्रिया में 'आंतरिक अभिप्रेरणा' (Intrinsic Motivation) का क्या अर्थ है?
आंतरिक अभिप्रेरणा का अर्थ है किसी कार्य को केवल इसलिए करना क्योंकि वह स्वयं में संतोषजनक और रुचिपूर्ण है।