BaalVikas
Menu

मनोसामाजिक विकास (Psychosocial Development) क्या है?

मनोसामाजिक विकास एरिक एरिक्सन का सिद्धांत है, जिसमें जीवन को आठ अवस्थाओं में बाँटा गया है। हर अवस्था में एक मनोसामाजिक संकट होता है, जिसका सफल समाधान व्यक्तित्व को स्वस्थ दिशा देता है।

मनोसामाजिक विकास: विस्तृत व्याख्या

मनोसामाजिक विकास को समझें

अवस्थाएँ क्रम से हैं: विश्वास बनाम अविश्वास (शैशव), स्वायत्तता बनाम शर्म-संदेह, पहल बनाम अपराध-बोध, परिश्रम बनाम हीनता (विद्यालय आयु), पहचान बनाम भूमिका-भ्रम (किशोरावस्था), घनिष्ठता बनाम अलगाव, उत्पादकता बनाम ठहराव और अंत में सत्यनिष्ठा बनाम निराशा। फ्रायड के विपरीत एरिक्सन समाज की भूमिका पर ज़ोर देते हैं।

याद रखने योग्य बिंदु

  • आठ अवस्थाएँ, पूरा जीवनकाल
  • हर अवस्था में एक संकट और उसका समाधान
  • विद्यालय आयु का संकट: परिश्रम बनाम हीनता

उदाहरण

छठी कक्षा में जिस बच्चे के प्रयासों की शिक्षक सराहना करते हैं, उसमें परिश्रम की भावना बनती है। लगातार आलोचना से उसमें हीनता घर कर सकती है।

परीक्षा में कैसे पूछा जाता है

अवस्था का नाम और उसका संकट जोड़ी में याद रखें। किशोरावस्था के लिए पहचान बनाम भूमिका-भ्रम और विद्यालय आयु के लिए परिश्रम बनाम हीनता बार-बार पूछे जाते हैं।

मनोसामाजिक विकास पर अभ्यास प्रश्न (MCQ)

एरिक्सन के सभी प्रश्न देखें →

तुलना पढ़ें

संबंधित अवधारणाएँ

संदर्भ
  • एरिक एरिक्सन, Childhood and Society (1950)
  • NCERT, मनोविज्ञान की पाठ्यपुस्तकें