एरिक्सन बनाम फ्रायड: अंतर और तुलना
फ्रायड विकास को यौन ऊर्जा के केंद्र बदलने की पाँच अवस्थाओं में बाँटते हैं, जो मुख्यतः किशोरावस्था तक चलती हैं। एरिक्सन ने इसे सामाजिक संदर्भ में बढ़ाकर पूरे जीवन की आठ अवस्थाएँ बताईं।
एरिक्सन का मनोसामाजिक सिद्धांत और फ्रायड का मनोलैंगिक सिद्धांत में मुख्य अंतर
| आधार | एरिक्सन का मनोसामाजिक सिद्धांत | फ्रायड का मनोलैंगिक सिद्धांत |
|---|---|---|
| सिद्धांत का नाम | मनोसामाजिक विकास। | मनोलैंगिक विकास। |
| अवस्थाओं की संख्या | आठ। | पाँच। |
| विकास की अवधि | पूरा जीवन, वृद्धावस्था तक। | मुख्यतः किशोरावस्था तक। |
| प्रेरक शक्ति | सामाजिक अंतःक्रिया और सामाजिक अपेक्षाएँ। | यौन ऊर्जा और सहज प्रवृत्तियाँ। |
| अवस्था का आधार | हर अवस्था में एक मनोसामाजिक संकट। | शरीर का वह भाग जहाँ आनंद केंद्रित होता है। |
| अहं की भूमिका | अहं स्वतंत्र और सक्षम, पहचान बनाता है। | अहं इड और पराहं के बीच संतुलन बनाता है। |
| किशोरावस्था | पहचान बनाम भूमिका-भ्रम का संकट। | जननेंद्रिय अवस्था की शुरुआत। |
संबंध और भेद
एरिक्सन मनोविश्लेषण की परंपरा से आए, पर उन्होंने मनुष्य के विकास को सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ में देखा। इसलिए उनका सिद्धांत शिक्षा के लिए अधिक उपयोगी माना जाता है, जहाँ बच्चों की उपलब्धि का अनुभव उनकी पहचान और आत्मविश्वास गढ़ता है।
परीक्षा के लिए याद रखें
आठ अवस्थाएँ और पूरा जीवन एरिक्सन के लिए, पाँच अवस्थाएँ और यौन ऊर्जा फ्रायड के लिए। विद्यालय आयु में परिश्रम बनाम हीनता एरिक्सन का संकट है।
अभ्यास प्रश्न
संदर्भ
- एरिक एरिक्सन, Childhood and Society (1950)
- सिगमंड फ्रायड, Three Essays on the Theory of Sexuality (1905)