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आत्म-प्रभावकारिता (Self-efficacy) क्या है?

आत्म-प्रभावकारिता किसी कार्य को सफलतापूर्वक कर पाने की अपनी क्षमता में विश्वास है। अल्बर्ट बंडूरा के अनुसार यह विश्वास तय करता है कि व्यक्ति कितना प्रयास करेगा और कठिनाई में कितना टिकेगा।

आत्म-प्रभावकारिता: विस्तृत व्याख्या

आत्म-प्रभावकारिता को समझें

बंडूरा ने इसके चार स्रोत बताए: पहले की सफलताओं के अनुभव, दूसरों को सफल होते देखना, दूसरों से मिला प्रोत्साहन और अपनी शारीरिक-भावनात्मक स्थिति। सबसे असरदार स्रोत पहले की सफलता है। इसलिए शिक्षक को ऐसे कार्य देने चाहिए जिन्हें बच्चा थोड़े प्रयास से पूरा कर सके।

याद रखने योग्य बिंदु

  • क्षमता का वास्तविक स्तर नहीं, उसमें विश्वास
  • सबसे बड़ा स्रोत: स्वयं की सफलता के अनुभव
  • उच्च आत्म-प्रभावकारिता से चुनौती स्वीकारने की प्रवृत्ति बढ़ती है

उदाहरण

गणित में कमज़ोर समझी जाने वाली छात्रा को शिक्षिका छोटे, सुलझ सकने वाले सवाल देती हैं। लगातार सही हल करने से उसका भरोसा बढ़ता है और वह कठिन सवाल भी आज़माने लगती है।

परीक्षा में कैसे पूछा जाता है

अपनी क्षमता में विश्वास यानी आत्म-प्रभावकारिता, और इसका संबंध बंडूरा से। इसे आत्म-सम्मान से अलग रखें, जो अपने मूल्य का समग्र आकलन है।

आत्म-प्रभावकारिता पर अभ्यास प्रश्न (MCQ)

बंडूरा के सभी प्रश्न देखें →

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संदर्भ
  • अल्बर्ट बंडूरा, Self-efficacy: Toward a Unifying Theory of Behavioral Change (1977)
  • NCERT, मनोविज्ञान की पाठ्यपुस्तकें