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आत्म-प्रभावकारिता बनाम आत्म-सम्मान: अंतर और तुलना

आत्म-प्रभावकारिता किसी विशेष कार्य में सफल होने की अपनी क्षमता में विश्वास है, जबकि आत्म-सम्मान स्वयं के मूल्य का समग्र आकलन है। दोनों जुड़े हैं, पर एक जैसे नहीं।

आत्म-प्रभावकारिता और आत्म-सम्मान में मुख्य अंतर

आत्म-प्रभावकारिता बनाम आत्म-सम्मान — तुलना तालिका
आधारआत्म-प्रभावकारिताआत्म-सम्मान
अर्थअमुक कार्य मैं कर सकता हूँ, यह विश्वास।मैं एक मूल्यवान व्यक्ति हूँ, यह समग्र भावना।
दायराकार्य या क्षेत्र विशिष्ट।सामान्य और समग्र।
मुख्य विचारकअल्बर्ट बंडूरा।मास्लो की आवश्यकता सीढ़ी में सम्मान की आवश्यकता, और रोज़ेनबर्ग का पैमाना।
उदाहरणमैं गणित का यह सवाल हल कर सकती हूँ।मैं अपने आप को पसंद करती हूँ और योग्य मानती हूँ।
स्रोतपिछली सफलता, दूसरों को सफल देखना, प्रोत्साहन, शारीरिक-भावनात्मक अवस्था।परिवार और समाज से मिला मूल्यांकन, उपलब्धियाँ, स्वीकृति।
परिवर्तनसफलता के अनुभव से अपेक्षाकृत जल्दी बदल सकती है।अधिक स्थिर, धीरे-धीरे बदलता है।
शिक्षा में उपयोगसुलझाए जा सकने वाले कार्य देकर विश्वास बढ़ाना।सम्मानजनक, स्वीकार्य कक्षा-माहौल बनाना।

एक उदाहरण से अंतर

कोई छात्र गणित में अपनी क्षमता पर कम भरोसा रखता है (कम आत्म-प्रभावकारिता) फिर भी अपने आप को एक अच्छा और मूल्यवान व्यक्ति मान सकता है (ठीक आत्म-सम्मान)। इसलिए शिक्षक को दोनों पर अलग-अलग ध्यान देना चाहिए।

परीक्षा के लिए याद रखें

किसी कार्य में सफलता का विश्वास यानी आत्म-प्रभावकारिता (बंडूरा)। अपने समग्र मूल्य की भावना यानी आत्म-सम्मान। दोनों को आपस में न मिलाएँ।

अभ्यास प्रश्न

संदर्भ
  • अल्बर्ट बंडूरा, Self-efficacy: Toward a Unifying Theory of Behavioral Change (1977)
  • अब्राहम मास्लो, A Theory of Human Motivation (1943)