शिक्षा दर्शन एवं शिक्षा चिंतक
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प्राचीन भारतीय इतिहास के स्रोतों, साहित्यिक कृतियों और विभिन्न राजवंशों के प्रशासनिक तथा धार्मिक विकास के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. मौर्यकाल में कौटिल्य द्वारा रचित 'अर्थशास्त्र' में राज्य के 'सप्तांग सिद्धांत' (स्वामी, अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोष, सेना और मित्र) का विस्तृत प्रतिपादन किया गया है, तथा इसमें मंत्रिपरिषद के सदस्यों की नियुक्ति के पूर्व 'उपधा परीक्षण' (चरित्र परीक्षण) का विधान था।
- 2. गुप्तकाल में शूद्रक द्वारा रचित संस्कृत नाटक 'मच्छकटिकम्' (मिट्टी की गाड़ी) में राजाओं और महलों के जीवन के स्थान पर एक निर्धन ब्राह्मण चारुदत्त और एक गणिका वसंतसेना के प्रेम प्रसंग के माध्यम से तत्कालीन नगरीय समाज, न्याय प्रणाली और भ्रष्टाचार का सजीव एवं यथार्थवादी चित्रण मिलता है।
- 3. संगम साहित्य (जो प्राचीन दक्षिण भारत के इतिहास का प्रमुख स्रोत है) के अंतर्गत कुल तीन संगमों का आयोजन पाण्ड्य राजाओं के संरक्षण में मदुरै और कपाटपुरम में हुआ था, तथा 'तोलकाप्पियम' तमिल व्याकरण का एक प्राचीन ग्रंथ है जिसकी रचना तोलकाप्पियर द्वारा की गई थी।
- 4. हर्षवर्द्धन के शासनकाल में नालंदा विश्वविद्यालय अपनी चरम सीमा पर था, और चीनी यात्री ह्वेनसांग (Hiuen Tsang) ने यहाँ रहकर बौद्ध दर्शन का अध्ययन किया था, तथा उसने अपनी यात्रा वृत्तांत 'सी-यु-की' (Si-Yu-Ki) में हर्ष के समय की सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक स्थिति का विशद वर्णन किया है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन पूर्णतः सत्य है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
दिए गए चारों कथन पूर्णतः सत्य हैं। मौर्यकालीन 'अर्थशास्त्र' में सप्तांग सिद्धांत और उपधा परीक्षण का उल्लेख है; शूद्रक रचित 'मच्छकटिकम्' यथार्थवादी नाटक है; दक्षिण भारतीय इतिहास के लिए संगम साहित्य और तोलकाप्पियम अत्यंत महत्वपूर्ण हैं; तथा ह्वेनसांग के वृत्तांत 'सी-यु-की' में हर्षकालीन नालंदा और समाज का विस्तृत वर्णन मिलता है। इस प्रकार के उच्च स्तरीय और विश्लेषणात्मक प्रश्नों का अभ्यास करने के लिए बिहार शिक्षक भर्ती परीक्षा पोर्टल पर विजिट करें।
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भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना से पूर्व स्थापित 'कांग्रेस की पूर्ववर्ती…
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19वीं शताब्दी में भारत में हुए सामाजिक एवं सांस्कृतिक…
Related Questions
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19वीं शताब्दी के दौरान भारत में हुए सामाजिक एवं धार्मिक सुधार आंदोलनों तथा उनके संस्थापकों/नेतृत्वकर्ताओं के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राजा राममोहन राय द्वारा वर्ष 1828 में स्थापित 'ब्रह्म समाज' का मुख्य उद्देश्य मूर्तिपूजा, बहुदेववाद और सती प्रथा जैसी कुप्रथाओं का खंडन करते हुए उपनिषदों के अद्वैतवादी दर्शन पर आधारित एकेश्वरवाद की स्थापना करना था।
2. स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा वर्ष 1875 में स्थापित 'आर्य समाज' ने 'वेदों की ओर लौटो' का नारा दिया था, तथा उन्होंने पाखंड खंडिनी पताका फहराते हुए हिंदू समाज को शुद्ध करने के लिए 'शुद्धि आंदोलन' की शुरुआत की थी, ताकि धर्मांतरित हिंदुओं को पुनः हिंदू धर्म में वापस लाया जा सके।
3. ज्योतिराव फुले द्वारा वर्ष 1873 में स्थापित 'सत्यशोधक समाज' का मुख्य उद्देश्य निचली जातियों (शूद्रों और अतिशूद्रों) को ब्राह्मणवादी वर्चस्व और धार्मिक पाखंडों से मुक्त कराना तथा उन्हें सामाजिक न्याय दिलाना था।
4. आत्माराम पांडुरंग द्वारा वर्ष 1867 में केशव चंद्र सेन की प्रेरणा से स्थापित 'प्रार्थना समाज' ने मुख्य रूप से अंतर-जातीय विवाह, विधवा पुनर्विवाह, स्त्री शिक्षा और दलितोद्धार जैसे सामाजिक सुधारों पर विशेष बल दिया, तथा इसने रूढ़िवादी हिंदू धर्म से पूर्णतः अलग होने का कभी प्रयास नहीं किया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन पूर्णतः सत्य है/हैं?
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बिहार में 1974 के छात्र आंदोलन और जयप्रकाश नारायण (जेपी) की संपूर्ण क्रांति से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इस आंदोलन की शुरुआत मार्च 1974 में बिहार के छात्रों द्वारा बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी, खाद्यान्न संकट और प्रशासनिक भ्रष्टाचार के विरोध में की गई थी, जिसका नेतृत्व बाद में जयप्रकाश नारायण ने स्वीकार किया था।
2. जयप्रकाश नारायण ने गांधी मैदान, पटना में ऐतिहासिक भाषण के दौरान 'संपूर्ण क्रांति' (Total Revolution) का आह्वान किया था, जिसमें सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक और नैतिक परिवर्तन के कुल सात आयाम शामिल थे।
3. जेपी आंदोलन के दौरान ही जनता पार्टी की सरकार केंद्र में सत्ता में आई थी, और इस आंदोलन को भारतीय राजनीति में गैर-कांग्रेसवाद (Non-Congressism) की राजनीति का सबसे बड़ा और सफल प्रयोग माना जाता है, जिसने आपातकाल की पृष्ठभूमि तैयार की थी।
4. संपूर्ण क्रांति के कार्यक्रम के तहत बिहार विधानसभा के भंग करने की मांग को लेकर चलाए गए अभियान में छात्रों ने विधायकों और सांसदों से अपने त्यागपत्र देने की मांग की थी, और इस आंदोलन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के कार्यकर्ताओं ने भी सक्रिय रूप से भाग लिया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन पूर्णतः सत्य है/हैं?
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बिहार में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रारंभिक अधिवेशनों और स्वतंत्रता संग्राम में यहाँ के नेतृत्वकर्ताओं के योगदान के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. वर्ष 1912 में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 27वें बांकीपुर (पटना) अधिवेशन के स्वागत समिति के अध्यक्ष मजहरुल हक थे, जबकि इस अधिवेशन की अध्यक्षता आर. एन. मध्ोलकर द्वारा की गई थी।
2. चंपारण सत्याग्रह (1917) की सफलता के बाद महात्मा गांधी को 'महात्मा' की उपाधि से सम्मानित करने वाले प्रमुख व्यक्तियों में बिहार के स्थानीय नेता ब्रजकिशोर प्रसाद और राजकुमार शुक्ल शामिल थे।
3. असहयोग आंदोलन के दौरान बिहार में विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा के प्रसार के लिए पटना में 'बिहार नेशनल कॉलेज' की स्थापना की गई थी, जिसके प्राचार्य के रूप में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने अपनी सेवाएँ दी थीं।
4. वर्ष 1928 में साइमन कमीशन के पटना आगमन के दौरान विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व करने वाले प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों में अनुग्रह नारायण सिंह, अली इमाम और सचिंद्रनाथ सान्याल प्रमुख रूप से शामिल थे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन पूर्णतः सत्य है/हैं?
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19वीं शताब्दी में भारत में हुए सामाजिक एवं धार्मिक सुधार आंदोलनों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राजा राममोहन राय द्वारा स्थापित 'ब्रह्म समाज' ने मूर्तिपूजा, बहुदेववाद और पुरोहितवाद का कड़ा विरोध किया तथा वेदों की अचूकता और सर्वोच्चता को बिना किसी शर्त के स्वीकार किया था।
2. स्वामी दयानंद सरस्वती ने 'आर्य समाज' की स्थापना 1875 में की थी, जिनका मुख्य नारा 'वेदों की ओर लौटो' था, और उन्होंने पाखंड खंडिनी पताका फहराकर पौराणिक मान्यताओं और जाति-प्रथा की कठोरता का खंडन किया था।
3. ज्योतिराव फुले ने वर्ष 1873 में 'सत्यशोधक समाज' की स्थापना की, जिसका मुख्य उद्देश्य शूद्रों और अति-शूद्रों (बहुजन समाज) को ब्राह्मणवादी वर्चस्व और धार्मिक पाखंडों से मुक्त कराना तथा शिक्षा के माध्यम से उन्हें आत्म-सम्मान दिलाना था।
4. ईश्वर चंद्र विद्यासागर के अथक प्रयासों के परिणामस्वरूप ब्रिटिश सरकार द्वारा वर्ष 1856 में 'हिन्दू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम' (Act XV of 1856) पारित किया गया, जिसे लॉर्ड डलहौजी के शासनकाल में कानूनी रूप से मान्यता मिली थी।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन पूर्णतः सत्य है/हैं?
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19वीं शताब्दी के सामाजिक एवं सांस्कृतिक सुधार आंदोलनों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राजा राममोहन राय द्वारा 1815 में स्थापित 'आत्मीय सभा' और 1828 में स्थापित 'ब्रह्म समाज' का मुख्य उद्देश्य मूर्तिपूजा का खंडन, एकेश्वरवाद का प्रचार तथा हिंदू समाज में व्याप्त कुरीतियों (जैसे सती प्रथा और बहुविवाह) का विरोध करना था।
2. वर्ष 1867 में केशव चंद्र सेन की प्रेरणा से मुंबई में आत्माराम पांडुरंग द्वारा स्थापित 'प्रार्थना समाज' का मुख्य ध्यान अंतरजातीय विवाह, विधवा पुनर्विवाह और महिलाओं की शिक्षा पर था, तथा इसके प्रमुख विचारकों में महादेव गोविंद रानाडे भी शामिल थे।
3. स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा 1875 में स्थापित 'आर्य समाज' ने 'वेदों की ओर लौटो' का नारा दिया और इन्होंने रूढ़िवादी पौराणिक हिंदू धर्म की आलोचना करते हुए पाखंड खंडनी पताका फहराई तथा शुद्धि आंदोलन की शुरुआत की।
4. यंग बंगाल आंदोलन के प्रणेता हेनरी विवियन डेरोज़ियो ने पारंपरिक हिंदू कॉलेज की शिक्षा प्रणाली के अंतर्गत सामाजिक रूढ़ियों का समर्थन किया और ब्रिटिश शासन की नीतियों की खुली प्रशंसा करते हुए राजनीतिक सुधारों का पुरजोर विरोध किया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन पूर्णतः सत्य है/हैं?
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प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली और वैदिक काल के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. वैदिक काल में शिक्षा की शुरुआत 'उपनयन संस्कार' के साथ होती थी, जिसे 'बिना आँख वाला' या 'दूसरा जन्म' (द्विज) कहा जाता था, और इस संस्कार के पश्चात छात्र को 'ब्रह्मचारी' की उपाधि मिलती थी।
2. समापवर्दन संस्कार शिक्षा की समाप्ति या दीक्षांत समारोह के अवसर पर संपन्न होता था, जिसके बाद छात्र 'स्नातक' (गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करने वाला) कहलाता था।
3. वैदिक शिक्षा प्रणाली में छात्रों के लिए कठोर ब्रह्मचर्य का पालन करना अनिवार्य था, और शिक्षा का मुख्य माध्यम संस्कृत भाषा थी, जिसमें वेदों, वेड़ाङ्गों, दर्शन और आयुर्वेद की शिक्षा दी जाती थी।
4. वैदिक काल में महिलाओं को शिक्षा प्राप्त करने का बिल्कुल भी अधिकार नहीं था और गार्गी, मैत्रेयी जैसी विदुषी महिलाओं का उल्लेख केवल पौराणिक कथाओं में मिलता है, जिनका वास्तविक शिक्षा से कोई संबंध नहीं था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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