इवान पावलव (Ivan Pavlov) के 'शास्त्रीय अनुबंधन सिद्धांत' (Classical Conditioning Theory) के अंतर्गत प्रतिपादित एक अत्यंत महत्वपूर्ण और केंद्रीय संप्रत्यय—'विलोपन और स्वतः पुनरावृत्ति' (Extinction and Spontaneous Recovery)—जिसे उस मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया के रूप में परिभाषित किया जाता है जिसके अंतर्गत जब किसी अनुबंधित उद्दीपक (Conditioned Stimulus) को बार-बार बिना अस्वाभाविक या अननुबंधित उद्दीपक (Unconditioned Stimulus) के प्रस्तुत किया जाता है, तो अनुबंधित अनुक्रिया धीरे-धीरे क्षीण होकर समाप्त हो जाती है (विलोपन), किंतु कुछ समय के अंतराल के बाद बिना किसी नए प्रशिक्षण के वह अनुक्रिया अचानक पुनः प्रकट हो जाती है (स्वतः पुनरावृत्ति)—के वास्तविक मनोवैज्ञानिक निहितार्थ एवं कक्षा-कक्षीय शिक्षण में विद्यार्थियों के अवांछित व्यवहार के संशोधन, आदत निर्माण और स्मृति संधारण के वैज्ञानिक संचालन के संबंध में निम्नलिखित में से कौन सा मनोवैज्ञानिक कथन सबसे अधिक प्रामाणिक और वैज्ञानिक रूप से मान्य है?
Detailed Explanation
📌 मुख्य संकल्पना / सिद्धांत:
इवान पावलव (Ivan Pavlov) द्वारा प्रतिपादित 'शास्त्रीय अनुबंधन सिद्धांत' (Classical Conditioning Theory) शिक्षा मनोविज्ञान और व्यवहारवाद (Behaviorism) की नींव का एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्तंभ है। इस सिद्धांत में 'विलोपन' (Extinction) और 'स्वतः पुनरावृत्ति' (Spontaneous Recovery) दो ऐसी केंद्रीय प्रक्रियाएं हैं जो यह समझाती हैं कि किस प्रकार उद्दीपक और अनुक्रिया के बीच बने संबंध समय के साथ कमजोर या पुनर्जीवित हो सकते हैं। विलोपन उस स्थिति को दर्शाता है जब अनुबंधित उद्दीपक (CS) को बार-बार बिना अननुबंधित उद्दीपक (UCS) के प्रस्तुत किया जाता है, जिससे अनुबंधित अनुक्रिया (CR) धीरे-धीरे लुप्त होने लगती है। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि अधिगम पूरी तरह मिट गया है, बल्कि यह केवल उस अनुक्रिया का अस्थायी दमन है। 'स्वतः पुनरावृत्ति' यह सिद्ध करती है कि विलोपन के बाद भी कुछ समय अंतराल के बाद वह पुरानी अनुक्रिया बिना किसी नए प्रशिक्षण के अचानक फिर से प्रकट हो सकती है। कक्षा-कक्षीय शिक्षण में यह इस बात का द्योतक है कि शिक्षक को अवांछित व्यवहारों के विलोपन (जैसे ध्यान आकर्षित करने वाले अनुचित व्यवहार को नजरअंदाज करना) के बाद भी निरंतरता और धैर्य बनाए रखना चाहिए क्योंकि पुराना व्यवहार पुनः उभर सकता है। अतः विकल्प (b) सबसे अधिक सटीक और वैज्ञानिक रूप से मान्य है।
📊 परीक्षा उपयोगी मुख्य बिंदु:
- शास्त्रीय अनुबंधन (Classical Conditioning): यह अनैच्छिक, स्वाभाविक और प्रत्यावर्ती व्यवहारों से संबंधित अधिगम का रूप है, जिसे पावलव ने कुत्तों पर प्रयोग करके समझाया था।
- विलोपन (Extinction): जब केवल CS बार-बार दिया जाता है और UCS अनुपस्थित रहता है, तो CR का क्षीण होना विलोपन कहलाता है।
- स्वतः पुनरावृत्ति (Spontaneous Recovery): विलोपन के पश्चात विश्राम काल के बाद CS प्रस्तुत करने पर CR का स्वतः वापस लौट आना।
- विकल्प (a) का खंडन: विलोपन तंत्रिका मार्गों को स्थायी रूप से नष्ट नहीं करता; संबंध केवल अव्यक्त (dormant) होते हैं, इसलिए भ्रम जैसी कोई बात नहीं है।
- विकल्प (c) का खंडन: शास्त्रीय अनुबंधन बच्चों, वयस्कों और यहाँ तक कि पशुओं में भी समान रूप से प्रभावी होता है।
- विकल्प (d) का खंडन: UCS को बार-बार बलपूर्वक प्रस्तुत करने से विलोपन नहीं बल्कि अनुबंधन और अधिक मजबूत हो जाएगा।
📖 सैद्धांतिक संदर्भ: शिक्षा मनोविज्ञान में व्यवहारवादी दृष्टिकोण के अंतर्गत इवान पावलव का शास्त्रीय अनुबंधन सिद्धांत अधिगम, आदत निर्माण और व्यवहार संशोधन की तकनीकों (जैसे डिसेन्सिटाइजेशन और विलोपन) को समझने के लिए केंद्रीय आधार प्रदान करता है।
🎯 परीक्षा दृष्टिकोण: CTET / UPTET / BPSC TRE हेतु महत्वपूर्ण विस्तृत हल ➔
गहन विश्लेषण एवं परीक्षा उपयोगी रणनीतियाँ:ः
सीटीईटी (CTET) और अन्य शिक्षक पात्रता परीक्षाओं में पावलव के सिद्धांतों से जुड़े प्रश्न अक्सर व्यावहारिक परिस्थितियों (Applied Questions) के रूप में पूछे जाते हैं। शिक्षकों के लिए यह समझना अनिवार्य है कि कक्षा में छात्रों के अवांछित व्यवहारों (जैसे चिल्लाना, कक्षा में व्यवधान डालना) को सुधारने के लिए यदि शिक्षक उस व्यवहार को मिलने वाले सकारात्मक सुदृढ़ीकरण (ध्यान या प्रतिक्रिया) को हटा लेते हैं, तो विलोपन होता है। परंतु 'स्वतः पुनरावृत्ति' का नियम यह चेतावनी देता है कि विद्यार्थी कुछ दिनों बाद फिर से वही पुराना व्यवहार दोहरा सकते हैं। इसलिए, शिक्षकों को एक बार विलोपन दिखने के बाद निश्चिंत नहीं होना चाहिए, बल्कि सतत और दीर्घकालिक सकारात्मक रणनीतियों का पालन करना चाहिए। इस प्रकार के विश्लेषणात्मक प्रश्न वैचारिक स्पष्टता को परखने के लिए डिज़ाइन किए जाते हैं।