पियाजे के अनुसार, 'पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था' (Pre-Operational Stage) में 'जीववाद' (Animism) का क्या अर्थ है?
Detailed Explanation
📌 मुख्य संकल्पना / सिद्धांत:
जीन पियाजे के संज्ञानात्मक विकास के सिद्धांत के अनुसार, 'पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था' (लगभग 2 से 7 वर्ष) में बच्चों की सोच में कुछ विशेष सीमाएं होती हैं। इनमें से एक प्रमुख विशेषता 'जीववाद' (Animism) है। जीववाद का शाब्दिक अर्थ है निर्जीव वस्तुओं (जैसे खिलौने, गुड़िया, पत्थर, बादल या कार) में सजीवता या चेतना का आरोपण करना। इस अवस्था में बच्चा यह मानता है कि निर्जीव वस्तुएं भी इंसानों की तरह सोच सकती हैं, महसूस कर सकती हैं और जीवित हैं। उदाहरण के लिए, यदि बच्चा गिर जाता है, तो वह फर्श को मारने लगता है क्योंकि उसे लगता है कि फर्श को भी दर्द हुआ होगा। यह बच्चों की अहंप्रतिभा (Egocentrism) और कल्पनाशीलता का एक स्वाभाविक परिणाम है, जहाँ वे अपनी भावनाओं को बाहरी दुनिया की हर वस्तु पर आरोपित करते हैं। अतः विकल्प (ए) इस प्रश्न के लिए सबसे सही और सटीक उत्तर है।
📊 परीक्षा उपयोगी मुख्य बिंदु:
- पियाजे की पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था में प्रतीकात्मक विचार (Symbolic Thought) और भाषा का तेजी से विकास होता है।
- जीववाद (Animism) के कारण बच्चे निर्जीव वस्तुओं को सजीव मानकर उनसे बात करते हैं और उनके साथ मानवीय व्यवहार करते हैं।
- विकल्प (बी) और (डी) गलत हैं क्योंकि जीववाद का जानवरों से डरने या भाषा के विकास न होने से कोई संबंध नहीं है।
- विकल्प (सी) गलत है क्योंकि तार्किक सोच (Logical Thinking) मूर्त संक्रियात्मक अवस्था (7-11 वर्ष) की विशेषता है, न कि पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था की।
📖 सैद्धांतिक संदर्भ: जीन पियाजे ने बाल विकास को चार चरणों में विभाजित किया है, जिसमें पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था अपनी अनूठी विशेषताओं जैसे सेंट्रेशन, अहंप्रतिभा और जीववाद के लिए जानी जाती है। अधिक जानने के लिए पढ़ें: जीन पियाजे का संज्ञानात्मक विकास सिद्धांत।
🎯 परीक्षा दृष्टिकोण: CTET / UPTET / BPSC TRE हेतु महत्वपूर्ण विस्तृत हल ➔
गहन विश्लेषण एवं परीक्षा उपयोगी रणनीतियाँ:
शिक्षक पात्रता परीक्षाओं (जैसे CTET और राज्य TET) में पियाजे के संज्ञानात्मक चरणों से हर साल प्रश्न पूछे जाते हैं। 'जीववाद' से जुड़े प्रश्नों में अक्सर परीक्षार्थियों को भ्रमित करने के लिए इसे डर या भाषा विकास से जोड़ा जाता है, लेकिन इसकी मूल परिभाषा निर्जीव वस्तुओं को सजीव मानना ही है। कक्षा कक्ष में अध्यापन करते समय शिक्षकों को यह समझना चाहिए कि बच्चे की यह सोच त्रुटिपूर्ण नहीं बल्कि उनके संज्ञानात्मक विकास की एक प्राकृतिक अवस्था है। शिक्षकों को बच्चों की कल्पनाशीलता का सम्मान करते हुए उनके साथ संवेदनशील संवाद स्थापित करना चाहिए ताकि बच्चों का अधिगम स्तर और अधिक प्रभावी व सुदृढ़ बन सके।