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औपचारिक संक्रियात्मक अवस्था (Formal Operational Stage) क्या है?

औपचारिक संक्रियात्मक अवस्था पियाजे की अंतिम अवस्था है, जो लगभग ग्यारह-बारह वर्ष से शुरू होती है। इसमें किशोर अमूर्त और काल्पनिक बातों पर तर्क कर पाता है, परिकल्पना बनाकर जाँचता है और केवल ठोस चीज़ों पर निर्भर नहीं रहता।

औपचारिक संक्रियात्मक अवस्था: विस्तृत व्याख्या

औपचारिक संक्रियात्मक अवस्था को समझें

मूर्त अवस्था का बच्चा तर्क तभी कर पाता है जब सामने ठोस उदाहरण हो। औपचारिक अवस्था में किशोर अगर-तो जैसे कथनों पर सोच सकता है, जैसे अगर सबको एक जैसे अधिकार होते तो समाज कैसा होता। वह समस्या के कई संभावित कारणों को क्रम से जाँचता है, जिसे परिकल्पनात्मक-निगमनात्मक चिंतन कहते हैं।

याद रखने योग्य बिंदु

  • अमूर्त और प्रतीकात्मक चिंतन संभव होता है
  • परिकल्पना बनाकर क्रमबद्ध ढंग से जाँचना इसकी पहचान है
  • आदर्शवाद और भविष्य पर सोच इसी अवस्था में बढ़ते हैं

उदाहरण

नौवीं कक्षा की छात्रा विज्ञान प्रयोग में पहले तय करती है कि पौधे के बढ़ने पर धूप, पानी और मिट्टी में से किसका असर देखना है, फिर एक बार में केवल एक कारक बदलकर परिणाम जाँचती है।

परीक्षा में कैसे पूछा जाता है

अमूर्त चिंतन, परिकल्पना और काल्पनिक स्थितियों पर तर्क जैसे शब्द औपचारिक संक्रियात्मक अवस्था की ओर इशारा करते हैं। मूर्त अवस्था के साथ इसकी तुलना अक्सर पूछी जाती है।

औपचारिक संक्रियात्मक अवस्था पर अभ्यास प्रश्न (MCQ)

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संबंधित अवधारणाएँ

संदर्भ
  • बार्बेल इनहेल्डर और जीन पियाजे, The Growth of Logical Thinking from Childhood to Adolescence (1958)
  • NCERT, मनोविज्ञान की पाठ्यपुस्तकें