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कोहलबर्ग बनाम पियाजे: नैतिक विकास: अंतर और तुलना

पियाजे ने बच्चों के नैतिक निर्णय को दो अवस्थाओं में समझाया, जबकि कोहलबर्ग ने उसे आगे बढ़ाकर तीन स्तरों और छह चरणों का सिद्धांत दिया, जो किशोरावस्था और वयस्कता तक जाता है।

पियाजे का नैतिक विकास और कोहलबर्ग का नैतिक विकास में मुख्य अंतर

पियाजे का नैतिक विकास बनाम कोहलबर्ग का नैतिक विकास — तुलना तालिका
आधारपियाजे का नैतिक विकासकोहलबर्ग का नैतिक विकास
संरचनादो अवस्थाएँ: बाह्य नियमों पर आधारित और स्वायत्त नैतिकता।तीन स्तर और छह चरण।
मुख्य पुस्तकThe Moral Judgment of the Child (1932)।Essays on Moral Development (1981) और उनके शोध।
आयु-विस्तारमुख्यतः बाल्यावस्था।बाल्यावस्था से वयस्कता तक।
अध्ययन की विधिदो पात्रों वाली छोटी कहानियाँ सुनाकर बच्चों से निर्णय पूछना।नैतिक दुविधा वाली कहानियाँ, जैसे हाइन्ज़ की दुविधा।
निर्णय का आधारपरिणाम देखना या इरादा देखना।सही-ग़लत के पीछे का तर्क, केवल उत्तर नहीं।
संबंधकोहलबर्ग के काम की नींव।पियाजे के विचारों का विस्तार।
आलोचनानिर्णय की सीमित आयु-सीमा।कैरोल गिलिगन ने इसे न्याय-केंद्रित बताकर देखभाल की नैतिकता की उपेक्षा का आरोप लगाया।

कैसे जुड़ते हैं

पियाजे ने पहली बार दिखाया कि बच्चे नैतिकता को वयस्कों की तरह नहीं समझते और उम्र के साथ उनकी समझ बदलती है। कोहलबर्ग ने इस बदलाव को कहीं अधिक बारीकी से क्रमबद्ध किया।

परीक्षा के लिए याद रखें

दो अवस्थाएँ (बाहरी नियम से स्वायत्तता) पियाजे की, तीन स्तर और छह चरण कोहलबर्ग के। कोहलबर्ग का सिद्धांत पियाजे के नैतिक विकास का विस्तार माना जाता है।

अभ्यास प्रश्न

संदर्भ
  • जीन पियाजे, The Moral Judgment of the Child (1932)
  • लॉरेंस कोहलबर्ग, Essays on Moral Development, खंड 1 (1981)